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Monday, May 23, 2022

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हाड़ी रानी और उसकी सैनाणी ( निशानी )

अपने पिछले लेख ” बीच युद्ध से लौटे राजा को रानी की फटकार ” के आख़िर में मैंने एक ऐसी रानी का जिक्र किया था जिसने युद्ध में जाते अपने पति को निशानी मांगने पर अपना सिर काट कर भिजवा दिया था | यह रानी बूंदी के हाडा शासक की बेटी थी और उदयपुर (मेवाड़) के सलुम्बर ठिकाने के रावत चुण्डावत की रानी थी | जिनकी शादी का गठ्जोडा खुलने से पहले ही उसके पति रावत चुण्डावत को मेवाड़ के महाराणा राज सिंह (1653-1681) का औरंगजेब के खिलाफ मेवाड़ की रक्षार्थ युद्ध का फरमान मिला | नई-नई शादी होने और अपनी रूपवती पत्नी को छोड़ कर रावत चुण्डावत का तुंरत युद्ध में जाने का मन नही हो रहा था यह बात रानी को पता लगते ही उसने तुंरत रावत जी को मेवाड़ की रक्षार्थ जाने व वीरता पूर्वक युद्ध करने का आग्रह किया | युद्ध में जाते रावत चुण्डावत पत्नी मोह नही त्याग पा रहे थे सो युद्ध में जाते समय उन्होंने अपने सेवक को रानी के रणवास में भेज रानी की कोई निशानी लाने को कहा | सेवक के निशानी मांगने पर रानी ने यह सोच कर कि कहीं उसके पति पत्नीमोह में युद्ध से विमुख न हो जाए या वीरता नही प्रदर्शित कर पाए इसी आशंका के चलते इस वीर रानी ने अपना शीश काट कर ही निशानी के तौर पर भेज दिया ताकि उसका पति अब उसका मोह त्याग निर्भय होकर अपनी मातृभूमि के लिए युद्ध कर सके | और रावत चुण्डावत ने अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया और वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृभूमि के लिए शहीद हो गया |
इस घटना पर कवि मेघराज “मुकुल” की एक रचना मुझे मिली जो मै यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ |

सैनांण पड्यो हथलेवे रो,हिन्लू माथै में दमकै ही |
रखडी फैरा री आण लियां गमगमाट करती गमकै ही |
कांगण-डोरों पूंछे माही, चुडलो सुहाग ले सुघडाई |
चुन्दडी रो रंग न छुट्यो हो, था बंध्या रह्या बिछिया थांई |

अरमान सुहाग-रात रा ले, छत्राणी महलां में आई |
ठमकै सूं ठुमक-ठुमक छम-छम चढ़गी महलां में सरमाई |
पोढ़ण री अमर लियां आसां,प्यासा नैणा में लियां हेत |
चुण्डावत गठजोड़ो खोल्यो, तन-मन री सुध-बुध अमित मेट |

पण बाज रही थी सहनाई ,महलां में गुंज्यो शंखनाद |
अधरां पर अधर झुक्या रह गया , सरदार भूल गयो आलिंगन |
राजपूती मुख पीलो पड्ग्यो, बोल्यो , रण में नही जवुलां |
राणी ! थारी पलकां सहला , हूँ गीत हेत रा गाऊंला |
आ बात उचित है कीं हद तक , ब्या” में भी चैन न ले पाऊ ?
मेवाड़ भलां क्यों न दास, हूं रण में लड़ण नही ञाऊ |
बोली छात्रणी, “नाथ ! आज थे मती पधारो रण माहीं |
तलवार बताधो , हूं जासूं , थे चुडो पैर रैवो घर माहीं |

कह, कूद पड़ी झट सेज त्याग, नैणा मै अग्नि झमक उठी |
चंडी रूप बण्यो छिण में , बिकराल भवानी भभक उठी |
बोली आ बात जचे कोनी,पति नै चाहूँ मै मरवाणो |
पति म्हारो कोमल कुम्पल सो, फुलां सो छिण में मुरझाणो |
पैल्याँ कीं समझ नही आई, पागल सो बैठ्यो रह्यो मुर्ख |
पण बात समझ में जद आई , हो गया नैन इक्दम्म सुर्ख |
बिजली सी चाली रग-रग में, वो धार कवच उतरयो पोडी |
हुँकार “बम-बम महादेव” , ” ठक-ठक-ठक ठपक” बढ़ी घोड़ी |

पैल्याँ राणी ने हरख हुयो,पण फेर ज्यान सी निकल गई |
कालजो मुंह कानी आयो, डब-डब आँखङियां पथर गई |
उन्मत सी भाजी महलां में, फ़िर बीच झरोखा टिका नैण |
बारे दरवाजे चुण्डावत, उच्चार रह्यो थो वीर बैण |
आँख्या सूं आँख मिली छिण में , सरदार वीरता बरसाई |
सेवक ने भेज रावले में, अन्तिम सैनाणी मंगवाई |
सेवक पहुँच्यो अन्तःपुर में, राणी सूं मांगी सैनाणी |
राणी सहमी फ़िर गरज उठी, बोली कह दे मरगी राणी |

फ़िर कह्यो, ठहर ! लै सैनाणी, कह झपट खडग खिंच्यो भारी |
सिर काट्यो हाथ में उछल पड्यो, सेवक ले भाग्यो सैनाणी |
सरदार उछ्ल्यो घोड़ी पर, बोल्यो, ” ल्या-ल्या-ल्या सैनाणी |
फ़िर देख्यो कटयो सीस हंसतो, बोल्यो, राणी ! राणी ! मेरी राणी !

तूं भली सैनाणी दी है राणी ! है धन्य- धन्य तू छत्राणी |
हूं भूल चुक्यो हो रण पथ ने, तू भलो पाठ दीन्यो राणी |
कह ऐड लगायी घोड़ी कै, रण बीच भयंकर हुयो नाद |
के हरी करी गर्जन भारी, अरि-गण रै ऊपर पड़ी गाज |

फ़िर कटयो सीस गळ में धारयो, बेणी री दो लाट बाँट बळी |
उन्मत बण्यो फ़िर करद धार, असपत फौज नै खूब दळी |
सरदार विजय पाई रण में , सारी जगती बोली, जय हो |
रण-देवी हाड़ी राणी री, माँ भारत री जय हो ! जय हो !
हाड़ी रानी पर अंग्रेजी में जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

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23 COMMENTS

  1. बहुत धन्यवाद इस ऐतिहासिक घटना का जिक्र करने के लिये. ऐसा लग रहा है कि राजपूताना का इतिहास ही आपने खोल कर दिया है.

    रामराम.

  2. आपके द्वारा प्रस्तुत किए गए कहानियो में यह पहली है जिसे हम जानते हैं. सालों के बाद पुनः पढने का मौका मिला. आभार.

  3. धीरू सिंह जी ने सही कहा.. हाड़ी रानी के बारे में ्बहुत ्कम लोग जानते है.. आपका ये प्रयास कुछ तो मदद करेगा..

  4. आपकी पोस्‍ट पढ कर खुद पर मान हो आया। मुझे यह कविता मुकुमलजी के श्रीमुख से सुनने का सुख-सौभाग्‍य मिला है। उस सबका वर्णन मेरे बस में नहीं। उसे तो बस अनुभव ही किया जा सकता है।

  5. thank you very much Mr Shekhawat. i was actually in its search for a long time. it’s such a wonderful writing……
    did anyone hear the song from a 1965 movie “nai umar ki nai fasal” by manna dey…
    it resembles this poem unexpectedly, but a really good singing by this legendry singer.

  6. रतन सा.
    राजस्थान के मेवाड़ प्रांत में "निशानी " को सैदाणी कहा जाता है पर पता नहीं क्यों फिल्म के गीत के अलावा मेघराजजी "मुकुल" की कविता में भी "सेनाणी" शब्द का उल्लेख किया गया है, और फिल्म के गीत में तो चुण्डावत को भी चूड़ावत बोला गया है।

  7. आज हमारे देश के टी बी चेनलो पर कहा दीखते ए़शी महानता के नाटक अब छिरोरा पण हाबी हे इक छोड़ा दूसरा किया हद ही गयी नीचता की इस रानी बूंदी के चरणों में मेरा कोटि -२ प्रणाम
    पंडित के.के.शंखधार

    • In 1950's Mukulji came to our college in a Kavi Sammelan and was thriled to listen to this veer-ras sanchit poem. Then I moved to USA in 1959. I came back India few yeaars back. Now watching anti national activities and self above nation, religion above Nation my heart cries. I had been searching for this poem and finally my niece Vasundhara found it on internet. I have the same emotion that I had the first time upon listening it from Mukulji. Hopefully, after listening or reading this poem the blood of Indian National will start churning.

  8. शेखावत साहेब, आपका यह काम अत्यंत सराहनीय है | आपने इस कविता के बोल भी उपलब्ध कराए हैं – जिस वजह से कविता सुनते समय पूरी बात सबके समझ में आ जाती है | मैं तो बचपन से ही यह कविता सुनते बड़ा हुआ हूँ | तब ग्रामोफोन पर सुनते थे !! कविता के टेक्स्ट में कुछ सुधार आवश्यक हैं अन्यथा यह समझा जाएगा कि ठाकर के मूँछ ही मूँछ होती है लिखने-पढ़ने में बेकार होता है | मैंने इसको सही रूप में सम्पादित करने का प्रयास किया है | अंत के कुछ उच्चारण अस्पष्ट हैं इसलिए समझ में नहीं आ रहे हैं उस के लिए क्षमा चाहता हूँ | निवेदन है कि, यदि सही लगे तो, सही संस्करण अपलोड करेंगे तो सन्देश और भी ज्यादा सही जाएगा | निवेदक – नरेंद्र सिंह हाड़ा | परिष्कृत संस्करण :

    सैनांण पड्यो हथलेवे रो,हिन्लू माथै में दमकै ही |
    रखडी फेरां री आण लियां गमगमाट करती गमकै ही |
    कांगण-डोरों पहुँचे माही, चुडलो सुहाग ले सुघडाई |
    चुन्दडी रो रंग न छूट्यो हो, था बंध्या रह्या बिछिया थांई |

    अरमान सुहाग-रात रा ले, रजपूतण महलां में आई |
    ठमकै सूं ठुमक-ठुमक छम-छम चढ़गी महलां में सरमाई |
    पोढ़ण री अमर लियां आसां,प्यासा नैणा में लियां हेत |
    चूण्डावत गठजोड़ो खोल्यो, तन-मन री सुध-बुध अमिट मेट |

    पण बाज रही थी सहनाई ,महलां में गूंज्यो शँखनाद |
    अधरां पर अधर झुक्या रह गया, सरदार भूल ग्यो आलिंगन |
    रजपूती मुख पीलो पड्ग्यो, बोल्यो, रण में नही जाउँला |
    राणी ! थारी पलकां सहला, हूँ गीत हेत रा गाउँला |
    आ बात उचित है कीं हद तक, ब्या” में भी चैन न ले पाऊँ ?
    मेवाड़ भलेई क्यों हो न दास, मैं रण में लड़-न नही जाऊँ |
    बोली, बोली रजपूतण, “नाथ ! आज थे मती पधारो रण माहीं |
    तलवार बतावो, मैं जास्यूँ, थे चुड़ी पैर रेओ घर माहीं |

    कह, कूद पड़ी झट सेज त्याग, नैणा में अगणी भभक उठी |
    चंडी को रूप बण्यो छिण में, बिकराल भवानी भभक उठी |
    बोली, बोली, आ बात जचे कोनी,पति नै चाहूँ मैं मरवाणो |
    पति मेरो कोमळ कूंपळ सो, फूलाँ सो छिण में मुरझाणो |
    पहलां कीं समझ नही आई, पागल सो बैठ्यो रह्यो मूर्ख |
    पण बात समझ में जद आई, हो गया नैण इक्दम्म सुर्ख |
    बिजळी सी चाली रग-रग में, तौव्वत बांध्या उतरयो पौड़ी |
    हुँकार “बम्ब-बम महादेव”, ठक-ठक-ठक ठपक बढ़ी घोड़ी |

    पहलां राणी ने हरख हुयो,पण फेर ज्यान सी निकळ गई |
    काळजो मुंह कानी आयो, डब-डब आँखङियां पथर गई |
    उनमत सी भागी महलां में, फ़िर बीच झरोखा टिक्या नैण |
    बारे दरवाजे चूण्डावत, उच्चार रह्यो थो वीर बैण |
    आँख्या सूं , आँख्या सूं ,आँख मिली छिण में, सरदार वीरता बिसराई |
    सेवक ने भेज रावले में, अन्तिम सैनाणी मंगवाई |
    सेवक पहुँच्यो अन्तःपुर में, राणी सूँ मांगी सैनाणी |
    राणी सहमी फ़िर गरज उठी, बोली कह दे मरगी राणी |

    फ़िर कह्यो, फ़िर कह्यो, ठहर ! लै सैनाणी, कह झपट खंग सूंती भारी |
    सिर कटयो हाथ में उछल पड्यो, सेवक भाज्यो ले सैनाणी |
    सरदार ऊछल्यो घोड़ी पर, बोल्यो, “ल्या-ल्या-ल्या सैनाणी” |
    फ़िर देख्यो, फ़िर देख्यो, कट्यो सीस हंसतो, बोल्यो, राणी ! मेरी राणी !

    तूं भली सैनाणी दी राणी ! है धन्य- धन्य तू क्षत्राणी |
    हूं भूल चुक्यो थो रण पत ने, तू भलो पाठ दीन्यो राणी |
    कह ऐड लगायी घोड़ी कै, रण बीच भयंकर हुयो नाद |
    के हरि उठ्यो चिंघाड़, अरि-गण रै ऊपर पड़ी गाज |

    फ़िर सीस कटयो गळ में धारयो, बेणी री दो लट बाँट बळी |
    उणमत्त बण्यो फ़िर करद धार, असपत फौज नै खूब दळी |
    सरदार विजय पाई रण में, सारी जगती बोली, जय हो |
    रण-देवी हाड़ी राणी की, माँ भारत की जय हो ! जय हो !!!!!

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