औरंगजेब की धर्मान्धता, क्रूरता का प्रत्यक्ष सबूत

औरंगजेब की धर्मान्धता, क्रूरता का प्रत्यक्ष सबूत

जब से दिल्ली की औरंगजेब रोड़ का नाम बदल कर पूर्व राष्ट्रपति स्व.अब्दुल कलाम के नाम कर दिया गया, तब से सरकार के इस निर्णय के खिलाफ तथाकथित सेकुलर स्यापा जारी है| वामपंथियों सहित कई सेकुलर लेखक उस धर्मांध शासक औरंगजेब का महिमामंडन करते हुए अचानक लिखने लगे है| अख़बारों की वेब साइट्स व अन्य ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्मस पर अचानक धर्माध औरंगजेब की अच्छाईयों भरी पोस्ट की बाढ़ सी आ गई है| औरंगजेब की अच्छाइयों वाली, मंदिरों को अनुदान देने वाली कई कहानियां विभिन्न इतिहासकारों के नाम का हवाला देकर लिखी जा रही है और औरंगजेब को एक बहुत अच्छा, आज की सेकुलर भाषा में कहूँ तो सेकुलर बादशाह घोषित करने की कवायद चल रही है|

मुझे नहीं पता कि उस धर्मांध, क्रूर, अत्याचारी शासक का महिमामंडन करने से इन लोगों को क्या मिलेगा, लेकिन इतना तय है कि सिर्फ अपने राजनीतिक विरोध के चलते ये गैंग (जो महिमामंडन में लगी है) देश के इतिहास से जरुर खिलवाड़ कर रही है| इस गैंग के तथाकथित लेखक, इतिहासकार भले ही कितनी भी, किसी भी इतिहास किताब का हवाला दे, लेकिन जिन लोगों ने उस क्रूर शासक की क्रूरता, धर्मान्धता के चिन्ह देखें है, उन्हें किसी संदर्भ की जरुरत नहीं| ना ही कोई ऐतिहासिक संदर्भ उनकी भ्रान्ति दूर कर सकता है| मैंने खुद इस क्रूर शासक की क्रूरता के चिन्ह देखें है जो आज भी सबूत के तौर पर उसकी क्रूरता, धर्मान्धता की कहानी पर्यटकों को सुनाते है, तब औरंगजेब के बारे में राय बनाने को उन प्रत्यक्षदर्शी पर्यटकों को किसी इतिहास पुस्तक के संदर्भ की कोई जरुरत नहीं पड़ती और कथित सेकुलर दलों द्वारा औरंगजेब का किया जाने वाला महिमामंडन उन्हें स्यापा से ज्यादा कुछ नहीं लगता|

मैं यहाँ औरंगजेब के एक प्रकरण व उसकी क्रूरता के मौजूद चिन्हों की चर्चा करने जा रहा हूँ, जो आज भी प्रत्यक्ष है, कोई भी व्यक्ति उस नज़ारे को आज भी जाकर साफ़ देख सकता है और इतिहास की किताबों से भी उसका अनुमोदन कर सकता है| यह तो एक मात्र उदाहरण है ऐसे ना जाने कितने मंदिरों के उदाहरण होंगे, जो औरंगजेब की क्रूरता, धर्मान्धता की भेंट चढ़े|

“8 मार्च सन 1679 को बादशाह औरंगजेब की आज्ञा से एक विशाल मुग़लवाहिनी जिसमें तोपखाना तथा हस्ती सेना भी शामिल थी- सेनापति दराबखां के नेतृत्व में खंडेला के राजपूतों को सजा देने और उनके पूजा-स्थलों को तोड़-फोड़कर धराशाही कर देने हेतु भेजी गई| नबाब कारतलबखां मेवाती और सिद्दी बिरहामखां जैसे अनुभवी सेनानी, जो खंडेले के पहले युद्ध में पराजित होकर भाग गये थे- इस अभियान में शामिल थे|” (खंडेला का वृहद इतिहास; पृष्ठ- 98,99)

डा.जदुनाथ सरकार ने “महासिरे-आलमगिरी” के अंग्रेजी अनुवाद में इस युद्ध को उद्धृत किया -“Darabkhan, who had been sent with a strong force to punish the Rajputs of Khandela and to demolish the great temples of the place, attacked Khandela on the 9th March, 1679 A.D and slew the three hundred odd Rajputs, who had made a bold defence. Not one of them escaping alive. The temples of Khandela and samula and other temples in the neighbourhood of Khandela.”(Masihr-e-Alamgiri; p.107)

यह युद्ध बेशक औरंगजेब खंडेला के राजा से नाराज था, उसे सजा देना चाहता था जिसे आप राजनैतिक मान सकते है, पर मंदिरों का ध्वंस? क्या मंदिर तोड़कर ही राजा को सजा दी जा सकती थी? क्या मंदिर तोड़ना धर्मान्धता का नमूना नहीं? जबकि इन मंदिरों में उसके खिलाफ ऐसी कोई गतिविधियाँ नहीं चलती थी, उन मंदिरों से उसकी बादशाहत पर कोई आंच नहीं आने वाली थी कि उनको तोड़ा जाना जरुरी होता| लेकिन उस धर्मांध ने उन मंदिरों को सिर्फ इसलिए तोड़ा क्योंकि वे हिन्दुओं की जन-आस्था के केंद्र थे और उस कट्टरपंथी को उनकी आस्था पर चोट करनी थी| यदि कथित सेकुलर लेखकों द्वारा औरंगजेब द्वारा कुछ मंदिरों को अनुदान देने की बात पर भी चर्चा की जाय तो उसके इसी अभियान में जीणमाता मंदिर को दिये अनुदान की चर्चा भी कर ली जाये|

शेखावाटी के इन मंदिरों का ध्वंस करने पहुंची औरंगजेब की सेना खंडेला, खाटू-श्याम जी, हर्षनाथ आदि मंदिरों को तोड़ने के बाद जीणमाता (देवी मंदिर) मंदिर को भी तोड़ने के उद्देश्य से जीणमाता मंदिर की पहाड़ियों में जैसी ही पहुंची| पहाड़ियों में मौजूद बड़ी संख्या में “बड़ी मधुमक्खियाँ” जिन्हें स्थानीय लोग “भंवरा मोह” कहते है, छिड़ गई और औरंगजेब की सेना का काट-काट कर बुरा हाल कर दिया, तब उनसे बचने को औरंग के सेनापति मंदिर के पुजारियों की शरण में गये और बचाव का उपाय पूछा| पुजारियों द्वारा बताये जाने के बाद सेनापतियों ने देवी मंदिर में तेल चढ़ाया, तब जाकर मधुमक्खियों ने सेना का पीछा छोड़ा (आज भी किसी के घर में लगे पेड़ पर ये बड़ी मधुमक्खियाँ छाता बना लेती है तो उन्हें वहां से हटाने के लिए लोग जीणमाता के तेल की कड़ाही का भोग लगाने को बोलते है, ऐसा करते ही कुछ घंटों में ही मधुमक्खियाँ वहां से उड़ जाती है, यह प्रयोग मैंने स्वयं अपनी आँखों से एक बार देखा है)| और तब से देवी माँ के मंदिर में दिया जलाने हेतु तेल का खर्च औरंगजेब के खजाने से आने लगा, जिसे बाद में दिल्ली द्वारा जयपुर रियासत के जिम्मे लगाया गया, जो आजादी से पूर्व तक मंदिर में आता था| इस मामले को लेकर भी सेकुलर लेखक औरंगजेब को धर्मनिरपेक्ष की संज्ञा दे सकते है, वे दावा कर सकते है कि देखो- जीणमाता मंदिर में औरंगजेब ने दीपक जलाने हेतु तेल खर्च का अनुदान दिया था| पर क्यों दिया, इस पर सेकुलर लेखक मौन साध लेंगे, जबकि स्थानीय जनता आज भी जानती है कि यह अनुदान नहीं, फटी का सौदा था, औरंगजेब ने अपनी सेना की भलाई के लिए ये चढ़ावा बोला था| हो सकता है जिन मंदिरों को अनुदान देने का उदाहरण सेकुलर लेखक दे रहे है वहां भी चमत्कार की आस या फिर अपनी फटी में औरंगजेब ने वह कार्य किया हो|

उस वक्त हर्षनाथ पहाड़ी पर बना प्राचीन मंदिर जिसे औरंगजेब की सेना ने उसके आदेश पर तोड़ा, की टूटी हुई मूर्तियाँ आज भी उस धर्मांध बादशाह की धर्मान्धता, क्रूरता, कट्टरता, अत्याचार की प्रत्यक्ष गवाह है| जिन्होंने उस मंदिर की स्थिति अपनी आँखों से देखी है, उन्हें सेकुलर लेखकों के लिखे लम्बे-चौड़े लेख औरंगजेब की नीति को लेकर बरगला नहीं सकते, भले वे कितनी ही कलम घिसे|

नीचे उसी हर्षनाथ पर बने प्राचीन के खंडित मंदिर की तस्वीरें है जो एक धर्मांध शासक की कट्टर धार्मिक नीति का निशाना बने-

औरंगजेब की क्रूरता के निशान

औरंगजेब की क्रूरता के निशान

Aurangzeb ki krurta, dhramandhta,

 

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