धरती को भूल कर

धरती को भूल कर

धरती को भूल कर
आसमां को निहारने लगा है मानव …
ऊंची उड़ान कि चाहत में
कहीं भटक गया है मानव …

बहुत अफ़सोस,
भूल गया है
अपने साथी संगी को साथ लेना मानव …
टूटने लगे है रिश्ते नाते

कांच के आशियानों में जो रहने लगा है मानव …

अपनों से कुछ बुझा बुझा सा
अब दीवारों से बातें करने लगा है मानव …
खुद में ही कैद रहता है
जैसे खुद को ही सजा सुना रहा है मानव ..

दुनियां की इस दौड़ में
सबको पीछे और खुद को आगे समझने लगा है मानव ..
ऐसा भी क्या गुरूर ?
कि एक दिन खुद से खुद ही दूर हो जायेगा मानव ..

सुश्री राजुल शेखावत

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5 Responses to "धरती को भूल कर"

  1. Pagdandi   September 28, 2012 at 4:48 pm

    ak ak line sacchai ko byan kar rahi h aaj ke parivesh ki baisa // bhut sach likha h aapne … keep it up

    Reply
  2. Gajendra singh shekhawat   September 30, 2012 at 2:51 am

    सच लिखा आपने…इस अंधी आपाधापी में फिर से सोचने की आवश्यकता है।

    Reply
  3. प्रवीण पाण्डेय   September 30, 2012 at 4:49 am

    बहुत ही अच्छा,
    पैर धरती पर, दृष्टि आसमान पर।

    Reply
  4. SULTAN RATHORE " JASRASAR"   October 3, 2012 at 12:04 pm

    bahut khub rajul baisa….

    Reply

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