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Monday, September 26, 2022

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धाड़ौ (डाका)

राजस्थानी भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार श्री सौभाग्यसिंह जी की कलम से………

चौकड़ी (सेखावाटी) रा ठाकुर गोपालसिंघ आपरा जमाना रा अखडै़त सिरदार हूंता। अंग्रेजां रौ राज हौ पण बै कदेई किंणी रौ डर भी नीं मानियौ। साचा, खरा, टणका अर अडर सिरदार। घोड़ां रजपूतां रौ घणौ चाव। चौकड़ी रजवाड़ां मानीजतौ ठिकाणौ। चौकड़ी रा तबेला में लाछी ओध रा सौ सवा सौ घोड़ा सासता ऊभा खूद चरता अर ठरड़का करता। ठाकुर गोपालसिंघ ठाकुर मंगलसिंघ रा पाटवी बेटा हा। ठाकुर गोपालसिंघ रै दुमात रा भाई ठाकुर भूसिंघ हा। ठाकुर गोपालसिंघ अर भूरसिंघ रै ठिकाणा रा बंट बारा नै लेय नै अणबण चालती। आपस में आण जाण, बोलीचाली अर उठ बैठ भी कमती इज ही। ठाकर गोपालसिंघ चौकड़ी रा गढ़ में रैवता अर भूरसिंघ भड़ेही चौकड़ी सूं छेटी आपरै बंट रा गढ़ में रैवता।

राजस्थान में संवत उगणीस सै छप्पन में महादुरभक पड़ियौ। अन्न दांतां आंतरौ पड़गयौ हौ। लाखा मिनख डुलग्या। धणी लुगाई नै, मां बेटा नै गांवों में सूना छोड माळवौ जाय लियौ। न धान, न चारौ, न घास, न पाणी। प्राणी काया राखै तौ कींकर राखै। लोग खेजड़ाँ रा छोडा पीस-पीस नै पेट नै भाडौ दियौ। पळियौ भाटौ खाय-खाय नै आंतड़ा दाब्या। गांव-गांव में गायां, भैसियां, ऊटां नै रेवड़ खाजरुवां रा हाड़का रा झूळा चींणजग्या। धान, घास, चारौ सोना-रूपा रै भाव बिकग्यौ। फेर रोकड़ पीसा भी कठै। अैडै़ अबखै बखत मांय ठाकर गोपालसिंघ कनै सौ सवा सौ बछेरा बछेरियां ठाणां में बंधिया। पीसा टक्कां रौ भी तोड़ौ। घोड़ा नै पोखबां री ऊधेड़ बुण में ठाकुर गोपालसिंघ चार पांच आदमी साथै ले अर ठाकर भूरसिंघजी रै कोट में गया। ठाकुर भूरसिंघ उठै नीं हा, किणी काम सूं जैपुर कांनी गयोड़ा हा। ठाकर गोपालसिंघ दडै-दडै गढ़ में गया। घोड़ा सूं उतरिया अर रावळा में ठाकरां भूरसिंघ री ठकुराणी नै कैवायौ- बीनणी नै कहज्यौ- गौपालौ आयौ है। मरदाना महल नै खुलवा दिरावौ। डावड़ी रै सागै फरास चाबियां ले आयौ। महल रा किंवाड़ खोलतां ही गोपालसिंघ भीतर गया अर तिजोरी रौ ताळौ तुड़वा अर बीस हजार रिपिया काढ़ अर बां ही पगां पाछा चौकड़ी बावड़ आया।

ठाकुर भूरसिंघ रा कामेती, जनाना सिरदार डाक चौकी बैठाय जैपुर सूं भूरसिंघ नै बुलवाया। भूरसिंघ गढ़ में आया तौ सगळी हकीगत सांभळ अर चौकड़ पर धावौ बोलबा री त्यारी करी। आपरा आदमी, बीजा हेतु हेताळु ठिकाणा रा मिनख घोड़ा मंगवाया। सिलैखानां सूं ढ़ालां तरवारां, भाला, सांग, धनस-बाण, गोपणां, बंदूकां, रेखला, जुजरबा, रामचंग्यां, नाळां लेय अर मरबा मारबानै सजधज चौकड़ी कानी बहीर हुवा। दिनूगै ही चौकड़ी गढ़ रा फाटक माथै हजार आठ सौ मिनख आय लागा।

गोपालसिंघ नै ठा पड़तां ही ऊभाणां पगां, निसस्तरां भूरसिंघ रै सांमै हाथ जोड़िया आंतरां सूं ही पधारौ, पधारौ ठाकुरां पधारौ कैवता आगै आया। दरीखानां में ले गया। गोठ री त्यारी री अरज करी। पछै पूछियौ-आज आ क्रिपा कींकर व्ही। धन घड़ी धन भाग सौ रावळौ पधारणौ हुवौ। भूरसिंघ रौ आधौ जोस अर रोस भी गोपालसिंघ रा मीठा सबदां अर नरमाई सूं मिट ग्यौ। भूरसिंघ केयौ-राज म्हांरौ खजानूं लूट ल्याया। इण भांत तौ किंणी री टपरी भी नीं लूटीजै।

ठाकुर गोपालसिंघ कैयौ-गोपालौ किंण नै लूटै अर धन रौ कांई करै। अै ठाणां में बंधिया टौरड़ा भूखा मरै हा। अै आप रा ही टौरड़ा है। इणां रै घास दाणां खातर गोपालौ तौ ल्यायौ है। आप आं घोड़ा नै ले पथारौ। आप रा इज है।

ठाकुर गोपालसिंघ रै इण बरताव सूं भूरसिंघ रौ क्रोध ठण्डौ हुवौ। दोनूं भाई अेक ही पांतिये थाल जीमियौ अर भूरसिंघ पाछा आपरै गढ़ में पधारिया। जद ही कैयौ है- जबान में इम्रत बसै। बोली सूं वैर बधै अर बोली सूं विरोध मिटै। मेळ हुवै है।

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