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Monday, November 28, 2022

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एक दरगाह जहाँ इबादत की जाती है एक क्षत्रिय योद्धा की

आज हम आपको एक ऐसे साम्प्रदायिक सौहार्द के स्थल की जानकारी देंगे, जहाँ एक झुझार क्षत्रिय योद्धा की मुस्लिम फ़क़ीर के नाम पर दरगाह बनी है और सभी जाति धर्मों के लोग वहां श्रद्धा व्यक्त करने आते हैं| यह दरगाह हमारी गंगा जमुनी संस्कृति की एक शानदार मिशाल है|  जी हाँ हम बार कर रहे है चौमूं स्थित बाबा दौलतशाह की दरगाह की| यह दरगाह जयपुर से चौमूं में घुसते ही सड़क के दाहिनी तरफ बनी है| इस दरगाह में हिन्दू, मुस्लिम बाबा दौलतशाह की मजार पर मत्था टेक कर मन्नत मांगते देखे जा सकते हैं| दरगाह काफी बड़ी है, बाबा की मजार के साथ दरगाह में खुला प्रांगण व आगंतुकों की सुविधा के लिए बड़े बड़े कमरे बने है, जो विशेष अवसरों पर आने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ को ध्यान में रखकर बनाये गए है| बाबा दौलतशाह के बारे में स्थानीय निवासियों का मानना है कि बाबा दौलतशाह का असली नाम ठाकुर दौलतसिंह है|

हमने बाबा दौलतशाह का इतिहास जानने के लिए दरगाह के सदर से फोन पर बात की, उन्होंने कहा कि दरगाह पर उपस्थित बाबा आपको सब कुछ बता देंगे| हमने हमने दरगाह के सेवादार बाबा से दौलतशाह का इतिहास पूछा, बाबा ने बताया कि वे पीर फ़क़ीर थे और यहाँ के ठाकुर साहब की रक्षा करते हुए शहीद हुए थे| बाबा का जबाब हमें संतोषजनक नहीं लगा, उनकी बातों में भी हमें विरोधाभास लगा| बाबा के जबाब में हमें चौमूं कस्बे में कुछ समय पूर्व एक भूखंड को लेकर हुए हिन्दू-मुस्लिम विवाद का असर भी नजर आया, शायद बाबा को लगा होगा कि दौलतशाह को दौलतसिंह बताने पर कल कोई यहाँ दावा करने आ जाए, हालाँकि हमारा मकसद किसी विवाद को जन्म देना नहीं, बल्कि दौलतशाह उर्फ़ दौलतसिंह का सही इतिहास खोजना था| दरगाह के सामने चाय की थड़ी पर बैठे स्थानीय निवासी राजकुमार जी यादव व अंकित शर्मा से हमने बात की |

राजकुमार जी यादव ने हमें बताया कि ठाकुर दौलतसिंह जी का किसी युद्ध में सिर कट गया था और उनकी धड़ घोड़े पर आ रही थी जो वर्तमान दरगाह के पीछे खेत में गिरी थी| राजकुमार जी ने यह भी बताया कि वर्तमान में वह खेत जहाँ ठाकुर साहब की धड़ गिरी थी, उनके ताऊ जी के हिस्से में आया हुआ है और जहाँ धड़ गिरी थी उस जगह पर आज भी खेती नहीं की जाती| राजकुमार यादव जी के अनुसार उनके पूर्वज पीढ़ियों से झुझार हुए ठाकुर दौलतसिंह जी के उस स्थान पर एक क्यारी जितनी भूमि खाली छोड़ने की परम्परा निभाते आ रहे है.  उस पर हल नहीं चलाते यह परम्परा शहीद ठाकुर साहब को सम्मान देने के लिए सदियों से निभाई जा रही है| राजकुमार जी यादव व अंकित शर्मा ठाकुर साहब का नाम दौलतसिंह बतलाते है पर वे यह नहीं जानते कि ठाकुर दौलतसिंह जी किस गांव के थे, कौनसे युद्ध में वे झुझार हुए|

राजकुमार जी यादव व अंकित शर्मा की बात सुनने के बाद दौलत सिंह जी के बारे में हमारी जिज्ञासा बढ़ गई और हमने इतिहास के कई जानकारों से बात की| इसी कड़ी में हमारी मुलाकात महरौली गांव के बुजुर्ग पूर्व अध्यापक सोहन सिंह जी शेखावत से हुई| सोहन सिंह जी ने बताया कि ठाकुर दौलतसिंह जी शेखावत राजपूत थे और महरौली यानी उनके गांव के ही थे| सोहन सिंह जी को यह जानकारी अपने दादोसा व पिताजी से मिली थी| उस वक्त सोहन सिंह जी ने भी इस सम्बन्ध में ज्यादा जानकारी सहेजने की आवश्यकता नहीं समझी अत: उन्होंने भी अपने दादोसा व पिताजी से नहीं पूछा कि ये कब, किस युद्ध में शहीद हुए थे| सोहन सिंह जी से हमें यह जानकारी तो मिली कि वर्तमान में दौलतशाह के नाम से मशहूर बाबा मुस्लिम फ़क़ीर नहीं, ठाकुर दौलतसिंह शेखावत थे जिनका गांव महरौली था| पर महरौली के बडवा की बही नष्ट होने के कारण हम ना उनकी वंशावली का पता लगा पाए, ना उनके वर्तमान वारिस को खोज पाए|

फिर भी हमने बाबा दौलतशाह उर्फ़ ठाकुर दौलत सिंह जी को इतिहास में खोजने की भरसक कोशिश की| चौमूं के नाथावत शासकों का इतिहास खंगालने पर हमें ककोड़ के युद्ध में घायल, शहीद व वीरता प्रदर्शित करने वालों के नामों की सूची मिली| जिसमें दौलतसिंह जी का नाम लिखा मिला| आपको बता दें ककोड़ युद्ध संवत 1819 में मल्हारराव होल्कर व जयपुर की सेना के मध्य हुआ था| जयपुर की और से चौमूं के ठाकुर जोधसिंह जी एक हजार घुड़सवार, एक हजार पैदल सैनिक, बीस छोटी तोपें, दस बड़ी तोप, हाथी, घोड़ों, ऊँटों आदि को लेकर ककोड़ के मैदान में मल्हारराव होल्कर से मुकाबले को गए थे| इस युद्ध में चौमूं ठाकुर जोधसिंह जी अपने पुत्र सहित शहीद हुए थे, लेकिन कड़े मुकाबले के चलते मल्हारराव होल्कर को मैदान छोड़ना पड़ा था|

युद्ध में सफलता के बाद जयपुर महाराजा माधवसिंह जी प्रथम ने युद्ध में शहीद होने, घायल होने, उदभट वीरता प्रदर्शित करने वालों को पुरष्कृत किया गया इस सूची में  दौलतजी मोहबतजी का नाम भी पाया जाता है| यही नहीं इस सूची में कोई आठ मुस्लिम योद्धाओं का नाम भी शामिल है जिन्होंने जयपुर के पक्ष में अपने प्राणों का उत्सर्ग किया था| नाथावतों के इतिहास की इस सूची में उल्लिखित दौलतजी मोहबतजी का को यदि हम ठाकुर दौलत सिंह माने तो इतिहास की यह कड़ी जुड़ जाती है कि बाबा दौलतशाह मुस्लिम फ़क़ीर नहीं, महरौली गांव के ठाकुर दौलतसिंह शेखावत थे, जिन्होंने चौमूं ठाकुर जोधसिंह जी के साथ ककोड़ के युद्ध में जयपुर राज्य के पक्ष में मल्हारराव होलकर का मुकाबला किया था और युद्ध में सिर कटने पर उनका घोड़ा उनकी धड़ चौमूं तक लाने में सफल रहा|

इतिहास की यह कड़ी जुड़ने के बाद भी ज्ञान दर्पण टीम यह पुष्टि नहीं करती कि ककोड़ के युद्ध में मारे गए ठाकुर दौलतसिंह जी ये ही हैं| स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इतना तय है कि ठाकुर दौलतसिंह शेखावत, महरौली ही बाबा दौलतशाह के नाम से पूजित है पर वे कौनसे युद्ध में काम आये ये अभी भी शोध का विषय है| आज बेशक ठाकुर दौलतसिंह जी बाबा दौलतशाह के नाम से पूजित है पर हमें ख़ुशी है कि उनका यह स्थान साम्प्रदायिक सौहार्द का एक बहुत बड़ा स्थान है और यहाँ हर जाति – धर्म के लोग उन्हें पूजने, उनसे मन्नतें मांगने आते है| बाबा दौलतशाह उर्फ़ ठाकुर दौलतसिंह जी के बारे में आपके पास सही ऐतिहासिक जानकारी हो तो हमें अवश्य बताएं|    history of baba daulatshah dargah chomu in hindi, real story of baba daulatshah chomu

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