बिलखती नार..

धोळी-धोळी  चांदनी, ठंडी -ठंडी रात ।
सेजां बैठी गोरड़ी,कर री  मन री  बात ।।

बाट जोवतां -जोवतां,  मैं कागां रोज उडाऊं ।
जै म्हारा  पिया रो आवै संदेशो  सोने री चांच मंढाऊं ।।

धोरा ऊपर झुपड़ी,गोरी उडिके बाट !
चांदनी और चकोर को, छुट गयो छ साथ।।

आप बसों परदेस में, बिलखु थां बिन राज १
सूख गयी रागनी, सुना पड्या महारा साज।।

गरम  जेठ रो बायरो,बरसाव है ताप !
ठंडी रात री  चांदनी,देव घणो संताप !!

देस दिशावर जाय कर धन  है खूब कमाया !
घर आँगन  ने भूलगया  ,वापिस घर ना आया।।

पापी पेट रै कारन छुट्या घर और बार ।
कद आवोगा थे पिया,बिलख रही घर री नार ।।

बिलख रही घर री नार, जाव रतन सियालो ।
न चिठ्ठी- न सन्देश  मत म्हारो हियो बालो ।।

लेखक : गजेन्द्र सिंह शेखावत

10 Responses to "बिलखती नार.."

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