बिलखती नार..

धोळी-धोळी  चांदनी, ठंडी -ठंडी रात ।
सेजां बैठी गोरड़ी,कर री  मन री  बात ।।

बाट जोवतां -जोवतां,  मैं कागां रोज उडाऊं ।
जै म्हारा  पिया रो आवै संदेशो  सोने री चांच मंढाऊं ।।

धोरा ऊपर झुपड़ी,गोरी उडिके बाट !
चांदनी और चकोर को, छुट गयो छ साथ।।

आप बसों परदेस में, बिलखु थां बिन राज १
सूख गयी रागनी, सुना पड्या महारा साज।।

गरम  जेठ रो बायरो,बरसाव है ताप !
ठंडी रात री  चांदनी,देव घणो संताप !!

देस दिशावर जाय कर धन  है खूब कमाया !
घर आँगन  ने भूलगया  ,वापिस घर ना आया।।

पापी पेट रै कारन छुट्या घर और बार ।
कद आवोगा थे पिया,बिलख रही घर री नार ।।

बिलख रही घर री नार, जाव रतन सियालो ।
न चिठ्ठी- न सन्देश  मत म्हारो हियो बालो ।।

लेखक : गजेन्द्र सिंह शेखावत

10 Responses to "बिलखती नार.."

  1. प्रवीण पाण्डेय   July 31, 2012 at 2:36 am

    विरह का सुन्दर विवरण..

    Reply
  2. नवज्योत कुमार   July 31, 2012 at 5:42 am

    विरह वेदना को प्रगट करती सुंदर रचना….

    मेरी नयी पोस्ट:- वाई-फाई तकनीक के लाभ……navjyotkumar1.blogspot.com

    Reply
  3. Sitaram Prajapati   July 31, 2012 at 8:42 am

    बहुत सुन्दर रचना …….

    Reply
  4. .

    धोळी धोळी चांदणी , ठंडी ठंडी रात !
    सेजां बैठी गोरड़ी , कर रइ मन री बात !!

    वाऽऽसाऽऽऽ… वाऽऽह !
    घणी फूठरी रचना है … मोकळो आभार आपरौ …
    अर लखदाद आदरजोग गजेन्द्र सिंह जी शेखावत नैं !

    घणी घणी मंगळकामनावां !

    Reply
  5. .

    धोळी धोळी चांदणी , ठंडी ठंडी रात !
    सेजां बैठी गोरड़ी , कर रइ मन री बात !!

    वाऽऽसाऽऽऽ… वाऽऽह !
    घणी फूठरी रचना है … मोकळो आभार आपरौ …
    अर लखदाद आदरजोग गजेन्द्र सिंह जी शेखावत नैं !

    घणी घणी मंगळकामनावां !

    Reply
  6. विष्णु बैरागी   August 1, 2012 at 2:40 am

    विरह वेदना की जो व्‍यंजना 'लोक' में होती है वह 'साहित्‍य' में नहीं।

    Reply
  7. विष्णु बैरागी   August 1, 2012 at 2:42 am

    विरह वेदना की व्‍यंजना की जो अनुभूति 'लोक' में होती है वह साहित्‍य में नहीं होती।

    Reply
    • bkaskar bhumi   August 1, 2012 at 12:22 pm

      शेखावत जी नमस्कार
      आपके ब्लॉग 'ज्ञान दर्पण' से कविता भास्कर भूमि में प्रकाशित किया जा रहा है। आज 1 अगस्त को 'बिलखती नार…' शीर्षक के कविता को प्रकाशित किया गया है, इसे पढऩे के लिए bhaskarbhumi.com में जा कर ई पेपर में पेज नं. 8 ब्लॉगरी में देख सकते है।
      धन्यवाद,
      फीचर प्रभारी
      नीति श्रीवास्तव

      Reply
  8. सुंदर गीत है, विरह प्रेम की गहराई को प्रदर्शित करता है।

    Reply
  9. dr.mahendrag   August 3, 2012 at 8:20 am

    वाह,शेखावतजी,बहोत ही आछी विरह रचना लिखी,राजस्थानी में लिखन और पढ़न रो एक अलग ही मजो है,आपरो आभार,ओरुं उडीक रहसी.

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published.