ऐसे बनाया, बिगाड़ा जाता है इतिहास

ऐसे बनाया, बिगाड़ा जाता है इतिहास
भारतीय इतिहास के प्रमाणिक लेखन में कई तरह के बाधक तत्वों की इस वेब साईट पर कई बार चर्चा होती रहती है कि कैसे लोगों ने हमारे इतिहास, संस्कृति को बिगाड़ कर हमें पतनोन्मुख किया और इतिहास में भ्रम फैलाया| इन तत्वों द्वारा फैलाई भ्रांतियों पर अक्सर इस वेब साईट के कई लेखों में चर्चा होती रहती है, कि कैसे ये तत्व अपने-अपने मिशन को अंजाम देने के लिए इतिहास के तथ्यों का अपने मन माफिक अर्थ निकाल कर झूठा इतिहास लिखकर प्रमाणिक इतिहास में बाधक बनते है|

ऐसे बाधक तत्वों के इतिहास बिगाड़ने के लिए अपने अपने हित होते है, अपनी अपनी मानसिकता होती है, आज ऐसा ही एक ऐतिहासिक तथ्यों का गलत अर्थ कर अनर्थ पूर्ण लेखन कर प्रमाणित इतिहास के साथ छेड़छाड़ कर उसे विकृत करने का उदाहरण प्रस्तुत है, जिस पर प्रकाश डाला है इतिहासकार, प्रोफ़ेसर रघुनाथ सिंह शेखावत, काली-पहाड़ी ने अपने “शेखावाटी प्रदेश का राजनीतिक इतिहास” नामक वृहद इतिहास ग्रन्थ में –

रघुनाथ सिंह शेखावत अपने उक्त ग्रन्थ के पृष्ट संख्या-408 पर ठा.देशराज द्वारा लिखित पुस्तक “जाट इतिहास” में पृ.611 पर लिखे एक दोहे का गलत मतलब निकालकर झुंझनु के प्रमाणिक इतिहास को विकृत करने का उदाहरण दिया कि कैसे प्रमाणिक इतिहास के इस बाधक तत्व ने अपना झूठा जातीय इतिहास बनाने के मंतव्य से इतिहास को विकृत कर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ी ऐतिहासिक भ्रान्ति फैला दी व दो जातियों के बीच इस विषय को लेकर भविष्य में होने वाले किसी विवाद के बीज बो दिये-

रघुनाथ सिंह अपने ग्रन्थ में लिखते है कि ठा.देशराज ने अपनी पुस्तक “जाट इतिहास” में पृ.611 पर लिखा है
सादै लीन्यो झुंझणु लीनो अमर पटै|
बेटे पोते पडौते पीढ़ी सात लटै||
अर्थात- सादुल्लेखां से इस राज्य को झुझा (झुझार सिंह) ने ले लिया, वह तो अमर हो गया| अब इसमें तेरे वंशज सात पीढ़ी तक राज करेंगे|
झुंझनु का मुसलमान सरदार जिसे सरदार झुझार सिंह ने परास्त किया था, सादुल्ला नाम से मशहूर था| झुंझनु किस समय सादुल्ला खां से जुझार सिंह ने छिनवाया था| इस बात का पता निम्न काव्य से चलता है-
“सत्रह सौ सत्यासी, आगन उदार|
सादै लन्हो झुझनु सुदि आठें शनिवार||

इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए रघुनाथ सिंह लिखते है अपने ग्रन्थ में आगे लिखते है- “मालूम नहीं लेखक ने ऐसी अनर्गल और उटपटांग बातें कैसे लिख दी| लेखक को दोहों का अर्थ भी ज्ञात नहीं| प्रथम दोहे का अर्थ कितना गलत लिखा है “सादुलेखां ने झुझा के इस राज्य को ले लिया|” “सादै का अर्थ शार्दुलसिंह शेखावत है न कि सादूलेखां मुसलमान| यह दोहा शार्दूलसिंह द्वारा झुंझनु लेने के उपरांत किसी चारण ने कहा था, सही अर्थ यह होगा-“सादै लीन्यो झुंझणु” अर्थात् शार्दूलसिंह ने झुंझनु लिया| “लीनो अमर पटै” अर्थात् राज्य अमर पट्टे (हमेशा के लिए, उनसे कोई छीन नहीं सकता), “बेटे पोते पडौते पीढ़ी सात लटै” अर्थात् इनके पुत्र, पोत्र सात पीढ़ी राज करेंगे| इसी प्रकार दोहा शार्दूलसिंह द्वारा झुंझनु लेने का सूचक है| जुझारसिंह की विजय का नहीं| सादूलेखां नाम का ना कोई मुसलमान था और न जूझारसिंह ने इसे परास्त किया|
ये सब मनगढ़ंत बातें है| इतिहास के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को ऐसे गलत प्रसंग पढ़कर गलत धारणाएँ नहीं बना लेनी चाहिये|”

इतिहासकार रघुनाथसिंह शेखावत ने प्रमाणिक इतिहास को तोड़मरोड़ कर पेश करने वाले तत्व को उजागर करते हुए, उसके द्वारा फैलाई गई भ्रांति का जबाब देकर बहुत ही सराहनीय कार्य किया है| देशराज जैसे लेखक ने जिस तरह इन दोहों का अपने मनमाफिक अर्थ निकाल कर अपना झूठा जातीय इतिहास रचने का जो कृत्य किया है वह भर्त्सनीय है| इस तरह बनाये किसी इतिहास की इतिहास के विद्वानों के मध्य कोई मान्यता नहीं होती लेकिन इस तरह के झूठे तथ्य ऐतिहासिक भ्रांतियाँ फैलाकर प्रमाणिक इतिहास में बाधक अवश्य बनते है|

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