जाने-अनजाने प्रदूषित होते खाद्य पदार्थ

जाने-अनजाने प्रदूषित होते खाद्य पदार्थ

अभी कुछ ही दिनों पहले आपने अखबारों व ब्लॉग जगत में पढ़ा होगा कि एक वृद्ध जोड़ा लोकी का रस पीने के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गया | आखिर ऐसे कौनसे कारण है कि हमें आज प्रदूषित खाद्य पदार्थ सेवन करने को बाध्य होना पड़ रहा है |
पिछले वर्ष फरीदाबाद में पैदा होने वाले अनाज,फल व सब्जियों के बारे में हरियाणा के एक कृषि विश्वविध्यालय द्वारा किया गया सर्वेक्षण अख़बारों में पढने को मिला था उस सर्वेक्षण के अनुसार फरीदाबाद में पैदा होनी वाली सब्जियां ,फल व अनाज 30 से 70 % तक प्रदूषित थे और इसका सबसे बड़ा कारण सिंचाई नहर के पानी का प्रदूषित होना बताया गया था | उसी खबर में सिंचाई विभाग के अधिकारीयों के हवाले से भी छपा था कि नहर का पानी अब सिंचाई योग्य ही नहीं रहा गया | अब बेचारा किसान करे भी तो क्या करे वह यूरिया व अन्य रासायनिकों का कृषि में इस्तेमाल तो बंद कर सकता है पर इस प्रदूषित पानी को कैसे शुद्ध करे |
उपभोक्ता भी क्या करे ? सब जानने के बाद कि बाज़ार में सब्जियां,फल,दूध व अनाज विषैले मिल रहे है पर वह कहाँ जाये ? वह इन विषैले तत्वों से प्रदूषित सामग्री का उपभोग करने को बाध्य है |
कई बार सोचता हूँ कि इस प्रदूषित खाद्य सामग्री से बचने के लिए नौकरी आदि छोड़कर क्यों न गांव चला जाये ताकि वहां तो इससे छुटकारा मिल जायेगा पर इस बार जब गांव जाना हुआ तो यह विचार भी काफूर हो गया | मैं अपने एक चचेरे भाई हनुमान सिंह से बात कर रहा था वह मुझे बता रहा था कि इस बार उसमे शराब पीना एकदम छोड़ दिया है और अब नित्य लोकी का जूस पीता है उसने अपने यहाँ उगाई गयी लोकी कि बेल भी मुझे दिखाई और बताने लगा कि वह पहले आस-पास के किसानों से लोकी खरीदकर लाता था पर एक दिन एक किसान घर आया और मैंने उससे अपने पपीते के फल कम व छोटे आने की बात कही इस पर किसान ने बताया कि इसको इंजेक्शन लगाना पड़ेगा फिर खूब फल आयेंगे लेकिन मैंने उसे दवा का इंजेक्शन लगाने को मना कर दिया तब किसान ने उस पपीते के पेड़ के तने में रम(शराब)का एक इंजेक्शन लगा दिया उसके बाद उस पेड़ पर ढेरों बड़े-बड़े पपीता के फल लगे | तबसे मुझे पता चला कि यहाँ गांव के किसान भी ज्यादा मुनाफे के लिए फलों व सब्जियों के पौधों में दवा का इजेक्शन लगाते है और तब से लोकी अपने यहाँ ही उगाकर सेवन करता हूँ |
हनुमान सिंह की बात सुनकर मैं भी दंग रह गया और गांव में शुद्ध सब्जियां व दूध मिल सकता है वाला मेरा विचार भी काफूर हो गया | गांव में भी अब शुद्ध खाद्य पदार्थ चाहिए तो खुद ही अपने खेतों में पैदा करो वरना बाज़ार में वहां भी अब उम्मीद नहीं रही | गांवों में किसान यूरिया व कुछ कीटनाशक रसायन इस्तेमाल करते है पर यह नहीं पता था कि सब्जियों व फलो की उपज बढ़ाने के लिए अक्सर उन पौधों के तनों में उस प्रतिबंधित इंजेक्शन का उपयोग करते है जिसे ज्यादा दूध पाने के लिए पशुओं के लगाया जाता था | सरकार ने हालाँकि वह इंजेक्शन प्रतिबंधित कर दिया पर दवा की दुकानों पर यह इंजेक्शन अभी भी धडल्ले से उपलब्ध है |
कभी ये इजेक्शन गांवों में लोग अपने पशुओं से ज्यादा मात्रा में दूध प्राप्त करने के चक्कर में अनजाने में लगाते थे उन्हें इसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले विपरीत परिणामों का पता ही नहीं था पर आज यह बात किसी से छुपी नहीं है फिर भी लोग ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में इस तरह के हथकंडों का धडल्ले से इतेमाल कर मानव स्वास्थ्य को गंभीर संकट में डाल रहे है |
ऐसी ही एक पुरानी घटना आज मुझे याद आ रही है –
आज से कोई 18 वर्ष पुरानी घटना है मैं जोधपुर के औधोगिक क्षेत्र में छगन लाल टेक्सटाइल मिल्स में बैठा था कि जोधपुर कपड़ा उद्योग में एक जाने माने रसायन विशेषज्ञ श्री लोढ़ा जी का वहां आना हुआ | लोढ़ा जी उस दिन जोधपुर के बाहर बहने वाली बरसाती नदी जोजरी नदी पर सर्वेक्षण करके आये थे | जोजरी नदी में जोधपुर के कपडा उद्योग से निकलने वाला प्रदूषित पानी प्रवाहित किया जाता था जिसके खिलाफ स्थानीय किसान यदा-कदा आंदोलित होते रहते थे पर एक दिन लोढ़ा जी को जानकारी मिली कि अब उस प्रदूषित पानी को अपने अपने खेतों में ले जाने के लिए किसानों में अक्सर झगडे होते है और इस प्रदूषित पानी से जोजरी नदी के आस-पास खेतों वाले किसान गेहूँ की खेती करने लगे है | बस इसी बात को जानने के लिए लोढ़ा जी कुछ साथियों के साथ वहां गए थे |
वहां से आकर उस दिन लोढ़ा जी बताने लगे कि जब से औधोगिक क्षेत्र में स्टील की कई सारी इकाइयाँ लगी है उस दिन से यहाँ से जोजरी नदी में डाले जाने वाले पानी से किसान गेहूँ की खेती कर रहे है पर उन्हें मालूम है कि ये प्रदूषित पानी से उपजा गेहूँ उनका स्वास्थ्य ख़राब कर सकता है इसलिए किसान अपने यहाँ उपजा गेहूँ अनाज मण्डी में बेच आते है और अपने खाने के लिए वहां से दूसरा गेहूँ खरीद लाते है और वह प्रदूषित पानी से उपजा गेहूँ कोई बेचारा अनजाने में खा कर अपना स्वास्थ्य ख़राब कर बैठता है |
लोढ़ा जी ने बताया था कि कपडा इकाइयों से निकलने वाले पानी में ज्यादा मात्रा सोडियम सिलिकेट की होती है जिससे पानी का पीएच एल्कलाइन हो जाता उससे खेती नहीं की जा सकती पर चूँकि अब उसमे स्टील इकाइयों से निकलने वाला पानी भी मिल जाता है जिसमे एसिड की मात्रा का घनत्व होता है जब एल्कलाइन पानी में एसिड मिलता है तो वह उस पानी का पीएच न्यूटल कर देता है | और पीएच न्यूटल होने के बाद वह पानी कृषि कार्य में इस्तेमाल हो जाता है पर चूँकि पानी सिर्फ इस तरह न्यूटल ही होता है उसमे मिले रासायनिक तत्व तो उसमे मौजूद रहते ही है जो उससे पैदा किये जाने वाले अनाज को दूषित तो करेगा ही साथ ही कुछ सालों में वह भूमि भी ख़राब हो जाएगी जहाँ इस प्रदूषित पानी से खेती हो रही है |

अब आप भी सोचिये जिस देश के वासी अपनी नैतिकता , संस्कारों व संस्कृति की दुहाई देते नहीं थकते वे अपने थोड़े से स्वार्थ पूर्ति के लिए खाद्य पदार्थों को जहरीले कर अपने ही देशवासियों का स्वास्थ्य खतरे में डाल रहे है | एक दुधिया अपनी भैस के ज्यादा दूध के लिए प्रतिबंधित इंजेक्शन लगा दूध दूसरों को बेचता है और दूसरा उसे ही कोई प्रदूषित सब्जी,अनाज,खाद्य तेल बेच देता है इस तरह सब जानबूझकर एक दुसरे का स्वास्थ्य ख़राब करने में लगे और यह विडम्बना बढती ही जा रही है |

हालाँकि आज जोधपुर में औद्योगिक इकाइयों व सरकार द्वारा सांझे प्रयासों से प्रदूषित जल को उपचारित करने के लिए एक जलशोधन संयत्र लग चूका और पुरे औद्योगिक क्षेत्र का दूषित पानी उस जल शोधन संयत्र में उपचार हेतु जाने लगा है |

आज प्रदूषित खाद्य पदार्थों के मकड़जाल में हम इतना जकड़ चुके है कि अब आँख बंद कर इसके उपभोग के अलावा कोई चारा नहीं रह गया है |

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