कर्नल नाथू सिंह शेखावत : शख्सियत परिचय

कर्नल नाथूसिंह शेखावत का जन्म 7 मार्च सन 1946 में राजस्थान के शेखावाटी आँचल में झुंझुनू जिले के गांव “ढाणी-बाढान” के ठाकुर श्री शाहजादसिंह के घर हुआ| ठाकुर शाहजादसिंह जी पंजाब रेजिमेंट के बहादुर सैनिक थे वे द्वितीय विश्व युद्ध में फ़्रांस, इटली व यूरोपीय क्षेत्र में बहादुरी के लिए अलंकरित किये गए थे| सन 1952 में दुर्भाग्यवश ठाकुर शाहजादसिंह काल-चक्र जनित मारक आपदाओं से घिर गए और उनकी आर्थिक सम्पन्नता विपन्नता में परिणित हो गयी|

घर की आर्थिक स्थिति लड़खड़ाने के बावजूद कर्नल नाथूसिंह की माता जी श्रीमती शिवताज कुंवरी निरवाण अपने पुत्र की शिक्षा के लिए सजग रही| उन्होंने अपने पुत्र को शिक्षा के लिए प्रेरित करने के साथ ही निडरता का पाठ भी पढाया| माताजी से प्रेरित हो कर्नल नाथूसिंह शेखावत ने तत्कालीन खेतड़ी ठिकाने के जसरापुर स्थित एकमात्र माध्यमिक विद्यालय से आठवीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की व सन 1963 में बिड़ला सीनियर सैकण्डरी स्कूल से प्रथम श्रेणी से एवं सन 1964 में सीनियर सैकण्डरी परीक्षा पास करने के बाद आंध्रप्रदेश में आदिलाबाद के जंगल विभाग में डी.एफ.ओ. के पद पर नियुक्त हुए पर आपका बचपन से ही सपना भारतीय सेना में सैन्य अधिकारी बन देश सेवा करना था अत: सिर्फ दस महीने के बाद ही जंगल विभाग की नौकरी छोड़कर आप 8 जून 1965 को टैक्निकल अप्रेन्टिस के तौर पर ई.एम्.ई. में भर्ती हो गये| छ: महीने के सैन्य प्रशिक्षण के बाद आपको ई.एम्.ई. कालेज सिकंदराबाद में उच्च शिक्षा के लिए भेज दिया गया| सन 1967 में आपने निशानेबाजी प्रतियोगिता में भाग लिया जिसमे आपकी टीम ने अखिल भारतीय सेना निशानेबाजी प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया|

दिसंबर 1967 में आपका सेना कमीशन हेतु चयन किया गया और जून 1968 में आर्मी कैडेट कालेज पूना में प्रवेश कर 13 जून 1971 को कमीशन प्राप्त कर २२ मराठा रेजिमेंट में पोस्टिंग प्राप्त की| तुरंत ही आपको पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) के मोर्चे पर एक घातक के तौर पर संघर्ष के लिए शत्रु क्षेत्र में कई किलोमीटर भीतर उतार दिया गया| जहाँ कई बार शत्रुओं से घिरने के बाद भी आपने अपने कार्य को बखूबी अंजाम देते हुए सफलता पूर्वक निकले|

1972-74 में आपने प्रसिद्ध पर्वतारोही तेनजिंग के सानिध्य में पर्वतारोही संस्थान दार्जिलिंग में प्रशिक्षण लिया| व सन 1974 में आप सेना सेवा कोर में पदस्थापित हुए| 1976 में आपने जम्मू विश्व विद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की| सन 1977-80 तक आप आर्मी एयरफोर्स स्पोर्ट स्कूल में प्रशिक्षक रहे| वहां आपकी उपलब्धियों को देखते हुए आपको सेना सेवा कोर कालेज बरेली में सैन्य अधिकारीयों को प्रशिक्षण देने हेतु 1981-83 तक भेज दिया गया| 1984-86 में आप मिजो विद्रोहियों के खिलाफ तैनात रहे तो सन 1987-88 में आपने पंजाब आतंकवाद के खिलाफ सराहनीय कार्य किया| 1987 में पठानकोट से सेना का गोला बारूद से भरा ट्रक आतंकवादी ले उड़े| जिनका आपने महज बारह बोर बंदूक व पिस्टल लेकर कुछ सिपाहियों को साथ लेकर आतंकवादियों का रात भर पीछा कर उन्हें घेर कर ट्रक छुड़ाने सहित एक आतंकवादी को जिन्दा पकड़ लिया था| आपके इस साहसिक कार्य की सेना में बहुत प्रशंसा हुई|
आपने प्रत्येक यूनिट में यूनिट कमांड की| साहसिक कार्य करना आपकी प्रकृति रही| दिसम्बर 1996 में आपका ब्रिगेडियर के लिए चयन किया गया परन्तु अफ़सोस मात्र एक दिन की सर्विस कम पड़ जाने के चलते आपके जैसे योग्य अधिकारी को 31 मार्च 1997 को सेवानिवृत होना पड़ा|

आपमें राजपूती संस्कृति व राजपूती संस्कार बचपन से ही कूट-कूट कर भरे थे यही कारण है कि आप आज भी राजपूती संस्कृति व संस्कारों के संरक्षक है| सेवानिवृति के बाद भी आपने देश सेवा व सामाजिक दायित्वों को निभाने हेतु युवकों को रक्षा सेवाओं में अधिकारी बनाने के लिए प्रशिक्षित करना शुरू किया| आजतक आपके द्वारा प्रशिक्षित 165 युवक व युवतियां सेना व कई बड़ी कम्पनियों में अधिकारी बन चुकें है| यह आपका समाज व देश के लिए अतुलनीय योगदान है| यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि जो कार्य बड़े बड़े सामाजिक संस्थान नहीं कर सके, वे आपने अपनी लग्न, निष्ठा द्वारा पुरे कर समाज को आर्थिक सम्पन्नता प्राप्त करने हेतु नई दिशा दी व अधिकारीयों की कमी झेल रही सेना के लिए योग्य अधिकारी तैयार कर देश सेवा के लिए अतुलनीय कार्य किया है|आप अपने प्रशिक्षण केंद्र पर राजपूत समाज के गरीब वर्ग और विधवाओं के बच्चों को मुफ्त प्रशिक्षण देते है साथ ही युद्ध में शहीद हुए किसी भी सैनिक के सेना में अधिकारी के रूप में शामिल होने की इच्छा रखने वाले बच्चों को भी मुफ्त प्रशिक्षण देते है|

सेना में अधिकारी बनने के लिए परीक्षा व साक्षात्कार में सफलता के लिए प्रशिक्षण के इच्छुक छात्र व अभ्यार्थी कर्नल साहब के प्रशिक्षण केंद्र की वेब साईट पर पूरी जानकारी हासिल कर उनसे संपर्क कर सकते है|

प्राचीन एवं मध्य युगीन इतिहास की खोज आपका पसंदीदा विषय रहा है| राजस्थान व महाराष्ट्र के लगभग सभी मुख्य किलों का उनकी सैन्य अभियांत्रिकी व संरचना का व्यूह रचना पर पड़ने वाले प्रभाव का आपने गहरा अध्ययन किया है|
सन 2004 में आपको एक बार शेखावाटीशेखावत वंश के प्रवर्तक महाराव शेखाजी के युद्ध विषयक चरित्र पर व्याख्यान करने का अवसर मिला पर इसके लिए आपके पास व उपलब्ध इतिहास पुस्तकों में सूचनाएं अत्यंत क्षीण थी| इस कमी के लिए आपने इतिहासकारों को कोसने के बजाय खुद ही शोध कार्य करने का मन में निश्चय किया और महाराव शेखाजी के इतिहास पर उपलब्ध पुस्तकों का अध्ययन करने के साथ ही आपने शेखावाटी के सभी ऐतिहासिक स्थानों, प्राचीन मंदिरों व युद्ध स्थलों का भ्रमण कर पूरी शोध के साथ जानकारी जुटाकर “अदम्य यौद्धा : महाराव शेखाजी” नामक शोध पुस्तक लिखी| पुस्तक में आपने महाराव शेखाजी द्वारा अपनाई गयी उन युद्ध प्रणालियों का बहुत बढ़िया तरीके से चित्रण कर विश्लेषण किया| आपके इस विश्लेषण को पढने के बाद शेखाजी द्वारा कैसे एक छोटी सी सेना के बल पर बड़ा स्वतंत्र राज्य स्थापित किया, आसानी से समझा जा सकता है|

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