चित्तोड़गढ़ का किला देखिये

महाराणा सांगा,महाराणा कुम्भा,महाराणा प्रताप, वीरवर राव जयमल मेडतिया,कल्ला,पत्ता आदि असंख्य वीरों की वीरता,महारानी पद्मिनी सहित असंख्य राजपूत स्त्रियों के जौहर का प्रत्यक्ष साक्षी,शोर्य,वीरता,त्याग और बलिदान का प्रतीक चित्तोड़गढ़ का किला |

राजस्थान का गौरव चित्तौडगढ उत्तर-पश्चिमी रेल्वे के अजमेर-उदयपुर खंड पर स्थित हैं। यहाँ का किला राजस्थान का सबसे बडे गिरी दुर्गों में से एक हैं। किला अपने रंग-बिरगें इतिहास, रक्तरंजित ऐतिहासिक युद्धों, तीन हृदय विदारक साकों(जौहर) और वीरतापूर्ण घटनाओं के लिये जग विख्यात हैं। इसका प्राचीन इतिहास इसे राजा भीम से जोडता हैं, जिसका प्रमाण वह स्थान हैं जहाँ भीम के कदम पडते ही एक जलधारा बह निकली थी।
चित्तौडगढ की ऐतिहासिकता उसके किले से पता चलती हैं। किले में अनेक ऐतिहासिक स्मारक, मंदिर और कुडं(जलाशय) स्थित हैं। यह किला चारों ओर से एक सुरक्षा प्राचीर से घिरा हुआ हैं जिसे भेदने के लिये किले में अनेक दरवाजों को पार करना पडता हैं। इन दरवाजों को पोल कहा जाता हैं यथा-पाटनपोल, भैरोपोल, हनुमानपोल, रामपौल, गणेशपोल, जोर्लापोल और लक्ष्मण पोल। चित्तौडगढ के किले में देखने योग्य अनेक आकर्षण हैं।
चित्तौडगढ जिले का इतिहास, शौय, त्याग एवं बलिदान की गाथाओं से भरा पडा है। यहाँ के स्मारक शूरवीरों एवं वीरांगनाओं की कुर्बानियों की दास्तान बयां करते दिखाई देते हैं, जो पर्यटकों में चितौडगढ के इतिहास को जानने की अनायास ललक पैदा किए बिना नहीं रहते। चित्तौडगढ दुर्ग बनवाने का श्रेय मौर्य राजा चित्रांगद को हैं। कर्नल टॉड के अनुसार सन् 728 ई. में बापा रावल ने इस दुर्ग को राजपूताने पर राज्य करने वाले मौर्य वंश के अंतिम शासक मान मौर्य से छीनकर गुहिलवंशीय राज्य की स्थापना की।

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