बाळपणा नै झालौ

बाळपणा नै झालौ

सुण रै म्हारी सखी सहेली,

किती सुखी है आ छोटी सी चिड़कली |

जद मन करै रुंख पै आवै,
जद मन करै आकास में फुर सूं उड़ जावै |

सुण रै म्हारी सखी सहेली,
आज्या चालां आपां भी उड़बा बाळपणा मै |

खावां खाटा-मीठा बोरया, अर काचर-मतिरा
आज्या मौज मनावां कांकड़ मै |

आज्या घर बणावां माटी का, गळीयारा में
खेलां चोपड़ – पासा, तिबारा में |

लै खेलां लुख -मिचणी ओ रयुं
तूं लुख्ज्या म्हूँ तनै हैरुं |

किती सुखी है आ छोटी सी चिड़कली
न तो ब्याह की चिंता, न ही सासरै आणों-जाणों
अर न ही घुंघटो पड़े काढणों |

सुण रै म्हारी सखी सहेली,
चाल बाळपणा नै देवां झालो
आज्या हिंडोळा हिंडा सावण-तिजां मै
अर पूजां ईसर-गौर, गणगौरां मै |

लै आपां गुड्डी बणावां चिरमी-चिप्ल्या की
आज ओळयूं आई पाछी ,पेल्याँ की |

राजुल शेखावत

बाळपणा = बचपन,झालो = पुकारना, रुंख = पेड़, बोरया = झाड़ी के बेर,कांकड़ = खेत खलिहान,हिंडोळा = झूले, ओळयूं = याद

5 Responses to "बाळपणा नै झालौ"

  1. ravi   August 7, 2012 at 2:23 am

    बचपन को याद दिलाती यह कविता ….बेहद सुंदर …

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  2. विष्णु बैरागी   August 9, 2012 at 12:46 am

    ओह! सुन्‍दर। इसे यदि जीवन्‍त सुना जा सकता तो कितना आनन्‍द आता?

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  3. Pagdandi   August 11, 2012 at 8:37 am

    wowww chidakli kya khubsurti se bachpan likha h .. suparb

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  4. nindak niyre rakhiye   August 12, 2012 at 2:13 pm

    वो कविता है ना "न अहा बाल्य जीवन भी क्या है क्यों न इसे सबका मन चाहे" याद आ गयी. वास्तव में आपने बाल्य जीवन को बहुत ही सुंदर शब्दों से संजोया है. उत्तम कविता. आपको साधुवाद

    महिपाल सिंह राठौड़

    Reply
  5. nindak niyre rakhiye   August 12, 2012 at 2:20 pm

    वो कविता है ना "न अहा बाल्य जीवन भी क्या है क्यों न इसे सबका मन चाहे" याद आ गयी. वास्तव में आपने बाल्य जीवन को बहुत ही सुंदर शब्दों से संजोया है. उत्तम कविता. आपको साधुवाद

    महिपाल सिंह राठौड़

    Reply

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