चाटू

चाटू
राजस्थानी भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार श्री सौभाग्यसिंह जी शेखावत की कलम से ……
घणा लोग चाटू (Chatu) नै कोरौ लाकड़ी रौ टुचकलौ, रूख रौ छांग्यौ-छोल्यौ, ठूंठियौ, खाती रा रंदा सूं रांद काटियोड़ौ रसोवड़ा रौ राछ, तरकारी तीवण रौ रमतियौ, हांडी रौ हम्मीर, चूला रौ चांद नै बांठ बोझा खेजड़ी कैर रौ जळमियौ-जायौ इज मानै। उणरा आपांण ऊरमां नै नी ओळखै, जद ही चाटू रा चमत्कारां सूं अणजांण घणां अकल रा उजीर, बुधरा वेदव्यास, ग्यान रा गुणेस, गोबर-गुणेस बणिया थका आपरी आवड़दा पूरी कर नांखै। रोही रा त्रिसा म्रिगला ज्यूं पद-पाणी रा खोज काढ़ता भंभाभोळी खावता फिरै। फेर भी उणां हक हिरणियां रौ हक त्रिखा नी बुझै। उणां रा हकां रा बादळा बणै नै थोथा ललूससा मिट जावै। सियाळा रा सीकोट री भांत प्रभात रा वणै नै दोपैर रा गळ जावै, काचा-कळवा ज्यूं छाऊं-म्याऊँ व्है जावै।

भोळा भिनख कांई जांणै चाटू कांई है। चाटू किण भांत संसार रा आखा सुख मांणै। बिना चून, लूण री रोटी पोवै नै सुख सूं खूटी तांण सोवै। चाटू रै धकै ठग री ठगाई, बाजीगर री हाथ सफाई, झगड़ायतां में संप करावणियां री रसाई री विद्या नै अड़कसी री आजार मिटाई, मेळ-मिळाई सगळी बातां पाणी भरै। चाटू जीम री लड़ाई री कमाई खावै। उण री जीभ री करामात आगै मोटा-मोटा माणसां री सकळाई री बाजती झालरां ठम जावै। किस्तूरी री सौरम नै हींग उडा नांखै। कपूर री सुबास लसण रै सांमै न्हास जावै, उणी रीत चाटू रै आगै सगळां री अकल रा पैड़ा जाम व्है जावै।

सीधा स्याणां मिनख आ जांणै कै चाटू खाली मांटी री हाडी रौ मांटी इज हुवै, रंधीण रौ राईवर इज हुवै, भाजी-भुगती रौ भरतार इज हुवै, खीचड़ी रौ खांवद इज हुवै, राबड़ी रौ रसियौ इज हुवै पण इती इज वात नी है। चाटू रसोवड़ा रौ मोटौ ताजदार ताजीमी उमराव हुवै। उण रै आगै देस-दिवांण ऊभा दांत तिड़कावै, तन दिवाण पंचहजारी पग पपोळै। आपरी कतरणी सी धाराळी जीभ सूं मिनखां रा हित सत कतर फेंकै। चाटू री ओळगगारी में, टैल बंदगी में ठाढा-ठाढा ठाकर ऊंभा थड़ी करै। चाटू री चाकरी में बिना धेले-टकै घणा सबळा-निबळा लखटकिया, मैफलिया, वातां रा बालम, खटपटिया खुमाण, फंफोड़ मूंडै रा मांटी, मटैड़ा रै चाक रै थापा रै अणगाररा आदमी अठपौर ऊभा रैवै, कदम सेवै । ऊभा चाटू री पगतळी चाटै।

चाटू नीं चाकी चलावै, नीं खेत कमावण जावै, नी मांटी भरी काठड़ी उठावै, नी पाळौ पग उठावै, नी लूखौ खावै। आखै दिन काम रै नांव सूं फळी इज नी फोडै़। बस बातां रा बिणंज बिणजै नै लाखां रा वारा न्यारा करै। मोटा मिनखां री थळी पर जा मुजरौ करै। सांच नै कूड़, कूड़ नै सांच कैय नै उणा रा मन भरमावै। बस, फेर छत्तीस बिंजनां रा भोग भोगै अर नचीत मल्हार गावै।

पण आ करामत कांई कम हुवै। इण रा बळ सूं तौ लुंठां-लुंठां रौ धंूवौ काढ नांखै। उणा नै चाटू नी घर रा छोड़ै, नी घाट रा नै बाट रा। जिण बखत चाटू चढनै चाकरी पर चालै, उण बखत धरा धूजै, मेघ धडूकै, देवराज रौ सिंघासण डोलै। कुंण जांणै चाटू किण समै कांई कुबध कर नांखै। कांई बात किण बखत पैरासूट कर दै। सांति रा सागर नै मचोळ नै गुधळा देवै। किण भोळा भूतनाथ रा चित नै चकरी चढाय देवै।

चाटू परवार रौ धणी हुवै। चाटू रौ जुवराज चमचौ, रायकुंवरी चमची, परधान पलटौ, कोटवाल कुड़छौ, फौजदार झरौ, प्रांतपाळ टीपरियौ, तन-दिवाण मिरियौ, पौसाकी पळौ, खवास खुरचनौ नै तोबची ताकळौ हुवै। चाटू चालै जद अै सारा रांण-खुमाण उणनै विदा करै। अै सारा अेक खांदा री माटी रा बासण हुवै अर समै पड़ै चाटू री बात नै हेटै नीं पड़बा देवै, ऊपर री ऊपर झेल लेवै। अै पाणी पैली पाळ बांधै, उळझी-सुळझी नै सांधै। चाटू जद आपरा लवाजमा रै साथ चाकरी माथै वहीर हुवै, जणां जांणै पांख आयोड़ी कीड़ी ज्यूं उड़तौ लखावै। गुरड़ री गति, भूत री माया, नै बादळ री छाया ज्यूं छिण-पलक में झबकौ नांखनै अलोप व्है जावै।

चमचौ तौ चाटू सूं भी दोय पग आधा काढै। टणका-टणका भारीखम बुध रा भाखर गिणीजणियां नै हांडी री खुरचण ज्यूं खुरच नै ठौड़-ठांणै लगा देवै। चमचौ राजपुरखां रै असवाडै-पसवाडै इयां बुवै, जियां दीवटियां रै साथै-साथै अंधेरौ चालै। चमथा रै मूंडै में जीभ इण रीत पळेटा मारै जांणै हळाबोळ रै कड़ाव में पलटी पळेटा खावै, हरी दूब कांनी हिरणी माल्है, भाखर री ढळांत कांनी बरसाळा रौ बाहळौ चालै, कराड़ां चढ़ी नदी रौ नीर चालै, डूंगरां रा खाळां धकै धूड़ चालै। इण भांत चाटू री असवारी चालै।

लोग कैवै चाटू रौ कोई मिनख जमारा में जमारौ है। चाटू री पूठ पाछै सगळा उण री चहचै-पहपै करै पण मूंडागै सैग उण सूं डरै। इण में डर-भय री कांई बात है ? ऊंदरा रौ जायौ तौ बिल इज खोदसी। पछै चाटू आपरी चाटूगीरी सूं टाबर-टीगरां नै ‘सैंटपाल’ में भणावै तौ किणी रौ हकनाक पेट क्यूं दूखै ? आप आप री करामत, नै आप आप रा कार है। चाटू रौ धन्धौ चाटूगीरी। चमचा रौ कार चमचागीरी। पण, चमचागीरी सूं इज चमचम मिळ जावै तौ सगळा ई चमचा नी बण जावै। चौंच तो कबूतर ही चलावै पण आव भगत कोयल री वाणी री इज हुवै। कोरी जीभां री लपालोळ सूं इज पार नी पडै़। चाटू री भणाई बी० एड०, एम० एड० नै आई० सी० एस० सूं भी मुंहगी पड़ै है। चमचां री पोसाळ न्यारी इज हुवै। चमचा री मुहारणी नै घोखियां इज काम नी सधै। खाली बारहखड़ी रा बारह कक्का, नै लुहुड़ौ कु, वडौ कू रटबा सूं इज कारज सिध नी हुवै। रटायोड़ौ सूवटौ गोविंद गोपाळ नारायण तौ बोल लै पण कांई वौ गोविंद, नारायण रा चरित्रां नै तोल लै। गीता रा रयान री घुळ गांठा खोल लै।

बोलबा में तौ पंखेरुवां में कागलौ इज कक्का बौलै, मोल्यौ इज किक्की कैवै, कूकड़ौ इज कूकड़कू चवै, कोयल इज कोक्क उ बोलै, तूती इज तूंई-तूंई भणै अनै घणा जानवर कुंई नै कुंई आखर धुन बोलै इज है पण इण सूं कांई ? उण नै कदे लाखपसाव मिळती दीठ है। चाटू री भणाई री पोसाळ बीजी इज हुदै। चाटू रौ ‘कोर्स’ न्यारौ इज हवै। चाटू री डिग्री चाटू इज नै सिलै। चाटू री पढ़ाई में विख री बीजगणित भणाईजै। संसार रै सनेह रौ खोगाळ नै बिणास रा बीज चाटू री वचन विधग्ता हुवै। बासगनाग रौ फैण, आग री झाळ इज चाटू रौ सुभाव हुवै। बोलण में गूंदगीरी रा सांटा जेड़ौ मिठौ हुवै पण करतूतां में पीळिया गोयरा नै परै बैठावै। अैड़ौ डंक मारै कै आगलौ पांणी इज नी मांगै। जमराज रा डंडिया सूं डंडिया गेहर रमणौ नै चाटू सूं अड़कसी करणौ बरौबर। चाटू सूं तौ डंडियौ मिळायौ राखै सौ इज भलौ। जिण री अकल उधारी लियोड़ी हुवै, वौ इज चाटू री वात नै उथेलै। नींतर तौ उण काळजीभा सूं होठांजोड़ी कुंण करै।

चाटू नै चाटू कैवणौ नै ऊजड़ बेवणौ बरौबर। अंवळी री संवळी नै संवळी री अंवळी करणौ चाटू रै डांवलै हाथ रौ खेल गिणीजै। कोई चाटू री करणी माथै रीसां बळै तौ लाख बळौ, औ तौ चाटू रौ सुभाव है कै इण तरफ रा भाखर उण तरफ, नै उण तरफ रा डूंगर इण तरफ धर देवणाँ।

चाटू री कोई बंधी-बंधाई पगार नी हुवै। उणरी पैदा ऊपरछाळा री हुवै। कणां महीनां रा दसहजार ही पटक लेवै नै कणाई सौ दोयसै मातै इज सरमोख लेवणी पडै़। चाटू री चाकरी नै घणां लोग हिकारत री आंख सूं जोवै। पण इण जुग री जीवा-जूंण में थणकढ़ दूध सारखौ साव निरमळ कुंण है ? चांद नै इम्रतबरसी कैवै है। इंदर नै धरापत कैवै है। संकर नै महादेव कैवै है पण उण नै कळंकी, रुळेट अर मसाणियौ भी तौ कैवै है। मूंडकी-मूंडकी री मत न्यारी हुदै। जितरा मूंडा, उतरी बात। लोग-बागां रा मुंहड़ारै छींकी थोड़ी ई जड़ीजै। पछै चाटू नै चमचौ चमचागीरी नीं करसी तो कांई खेत में हळ हांकसी, ऊंट लादसी, कमठां माथै काठड़ी नांखसी, रेवाड़ा री मीगणियां सोरसी, भाखरी रा भाटा भांगसी। अैड़ा काम धन्धा करसी जणां इती भण-गुण नै कांई कियौ ? कांई जुबान री जबा-जोड़ी, बात बणावणी काम गिणीजै। अबोलां री मोती दाणां-सी जंवार पड़ी रैवै अर समै माथै बोलै उणां रा बूंमळा सरै बाजार धोलै दिन छै पंसेरी री ठौड़ दो रिपियां कळी बिकै। पराया पेट में आपरै हित री वात उतार देवणौ, आंगळ्यां धरम करणौ कई ल्होड़ी कळा गिणीजै। ससि कळा सी सुपेत, संख सी धवळ, हिमसी अमळ, नै दूध-सी धोली हार रै मणकां री भांत पोयोड़ी साव सही, मेह रा जळ री भांत कूड़ धूड़ सूं, आंधी-अरड़ां री खेह सूं अछूती वात नै लुहार रै आरण रा लियाळा बणावण री करामात हुवै जणां चाटूगीरी करीजै है। सनीदेव री साढसाती सूं डरनै इज छायांदान करै। जे डर नीं लागै तौ रगत्या भैंरू तांई बकरां रा कान कुंण काटै। कोरी जीभां री लपालोळ सूं इज नाकौ नी झलै। जीभ री करामात रै साथै चौसठ घड़ी पगां पर थड़ी भी करणी पडै़।
चाटू रै डर सूं लूंठा-लूंठा धींग धज धारी इण भांत धूजै, जिण भांत थोड़ी सीक पवन रै हिलोर सूं पीपळ रौ पत्तो कांपै। चाटू रै आगै मोटा-मोटा गजगात गजपतियां नै सीयौ चढ़ जावै। चाटू री बात रौ असर तीजारा रा डोडिया, धतूरा रा रस, कपिल रा कोप, नै रावण रा रढ़ सूं घणौ ज्यादा हुवै।

चाटू जिण रात जळमियौ, जिण पुळ घड़ीजियौ वा पुळ वाहुड़ नै पाछी नी आई। चाटूरै पांण राजनीत, समाजनीत, साहित्य-नीत सैंग नीतियां पुळै। जिकी जीभ गुलांचिया कबूतरां री भांत जठी-कठी नै लुळती रैवै, वौ इज खरौ चाटू कहीजै। लोटण कबूतरां री रीत आपरा डील नै नीं मौड़ सकै, वौ सांच रा लाख टका कोथळी में घालियां फिरौ, उण नै पूछणै-बतलावणै खातर बोळखौ बगत किंण कनैं पड़ियौ है अर कुण लोभ री लाय में बळता आज रा इण दौड़ता-भागता जुग में दुहागण रा गुणवान डावड़ा नै बुचकारण रौ, हिमळास सूं बतळावण रौ साहस कर आप रौ नांव ‘ब्लैक लिस्ट’ में मंडावै।

चाटू रै भस्मी कड़ा सूं संकर खुद इज डरतौ लुकतौ फिरयौ, सौ चाटू सूं डरणै में इज खेमकुसळ है। आंख ऊघाड़ नै चाटू री आरती उतारौ, इणी में है सगळां रौ निस्तारौ। इण वास्तै चाटू नै धोय-पूंछ भींत रै सारै मेल द्यौ। राज दुराजी मौकै बीजा लंगर में खीचड़़ौ रांधण में काम आवै। पण औ निचल्यौ कठै रैवै ? ऊभौ-ऊभौ इज आया गियां नै कैवतौ रैवै-मुंहंडा देख अर टीका काढूं ठोक लबालब थूली।

लेखक : श्री सौभाग्यसिंह शेखावत

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