राजपूत नारियों की साहित्य साधना : चंपादे भटियाणी

यह जैसलमेर के रावल मालदेव की पोत्री और रावल हरराज की राजकुमारी थी| रावल हरराज जैसलमेर के शासकों में बड़े साहित्य और कला प्रेमी शासक थे| उनके शासनकाल में राजस्थानी छंद शास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथ पिंगल सिरोमणि और श्रृंगार रस के काव्य ढोला मारू री चौपाई का सर्जन जैन मुनि कुशललाभ जी ने किया था| कुशलराज उनके काव्य गुरु थे|

रावल हरराज की बड़ी राजकुमारी गंगाकुंवर बीकानेर के राजा रायसिंह तथा छोटी लालांदे उनके भाई महाराज पृथ्वीराज बीकानेर को ब्याही थी| लालांदे गुण सम्पन्न नारी थी| उसके निधन पर हरराज ने लालांदे से छोटी चंपादे का वि.स. १६५० में पृथ्वीराज से विवाह कर दिया था| चंपादे को काव्य शिक्षा अपने पिता के यहाँ मिली थी और उसके योग्य हि कवि हृदय महाराज पृथ्वीराज पति के रूप में प्राप्त हुए| पृथ्वीराज राजस्थानी (डिंगल) तथा ब्रज भाषा के मूर्धन्य कवियों में हुए| उनकी “कृष्ण रुक्मणि री बेली” राजस्थानी की सर्वश्रेष्ठ कृति है| रानी चंपादे भी राजस्थानी और ब्रज भाषा की कवयित्री थी| यद्धपि उसकी प्रबंध-बंध तो अभी कोई कृति उपलब्ध नहीं है परन्तु मुक्तक दोहे प्राप्त है| प्रसिद्धि है कि एक बार महाराज पृथ्वीराज अपनी दाढ़ी में सफ़ेद बाल दर्पण बिंब में देख रहे थे तभी चंपादे हंस उठी| इस पर पृथ्वीराज ने वृद्धावस्था के कारण के भाव के कुछ दोहे बनाकर राणी चंपादे को सुनाए| पर चंपादे ने उनके मन में वृद्धावस्था के कारण उत्पन्न खिन्न भाव का निवारण करते हुए तीन दोहे सुनाए और पति पत्नी दोनों हंस उठे| उनमे से एक दोहा….

प्यारी कहे पीथल सुनों, धोलां दिस मत जोय|
नरां माहरां दिगम्बरां, पाकां हि रस होय||
खेड़ज पक्का घोरियां, पंथज गधधां पाव|
नरां तुरंगा वन फ़लां, पक्कां पक्कां साव||
अभिप्राय: है- कि खेती प्रोढ़ बैलों से और मार्ग की दूरी पके ऊँटों के पैरों से ही तय होती है| मानव, घोड़े और वनफलों में पकने पर ही रस संचार होकर स्वाद उत्पन्न होता है जो बहुश्रुत है|

महाराज पृथ्वीराज बादशाह अकबर की सैनिक सेवा में रहते थे| वे एक बार लम्बी अवधि के बाद अपने घर बीकानेर लौटे| चंपादे ने उनके आगमन पर अपनी विरह में कृशकाय तथा ढलते यौवन का वर्णन करते हुए कहा-

बहु दीहां बल्ल्हो, आयो मंदिर आज|
कंवल देख कुमलाइया, कहोस केहई काज||
चुगै चुगावै चंच भरि, गए निलज्जे कग्ग|
काया पर दरियाव दिल, आइज बैठे बग्ग ||
केश रूपी काले कौवों की खूब सार-संभाल रखी लेकिन फिर भी वे तो उड़ हि गए और अब उनके स्थान पर शरीर रूपी सागर में श्वेत केश रूपी वक आ बैठे| अर्थात यौवनावस्था गुजर गयी|

चंपादे द्वारा रचित ब्रज भाषा के कुछ छंद भी मिलते है परन्तु कोई प्रभूत साहित्य उपलब्ध नहीं है| चंपादे भी अपनी बहन लालादे की भांति हि अधिक आयु नहीं पा सकी व उसके निधन से पुन: पृथ्वीराज जी के जीवन में रिक्तता उत्पन्न हो गयी| चंपादे के निधन पर पृथ्वीराज ने बड़े मर्मान्तक दोहे लिखे जो उनके मन की पीड़ा और दुःख प्रकट करते है| उनमें से कुछ दोहे इस प्रकार है ..

चंपा पमला च्यारि, साम्हां दीजै सज्जणा |
हिंडोले गलिहारि, हंसते मुंहि हरिराजउत ||
चांपा चडीज वास,मौ मन मालाहर तणी|
सैण सुगन्धि सांस, हियै आवै हरिराजउत ||
चांपा चमकंनेह, दांतोई अनतै दामिणी |
अहर अनै आभेह, होमि पड़ी हरिराजउत||
हंसौ चीतै मानसर, चकवौ चीतै भांण |
नितहु तुनै चीतखूं, भावै जांण म जाण ||
चख रत्ते नख रतडे, दंसड़ा खड़ा खड़ देह |
कहै पित्थ कल्याण रो, आरिख सिघ्घी अह ||

इन सौरठों से स्पष्ट है कि चंपादे जैसी विदुषी थी वैसी हि रूप-लावण्य युक्त देहयष्टि की नारी रत्न थी| दोनों पति-पत्नी का साहित्य प्रेम और काव्य उच्च कोटि का था| चंपादे के साहित्य की अनूप संस्कृत पुस्तकालय में खोज की जाय तो और भी मिलने की संभावना है|

लेखक : श्री सौभाग्यसिंह शेखावत,भगतपुरा

नोट : महाराज पृथ्वीराज साहित्य जगत में “पीथल” के नाम से प्रसिद्ध है| कहावत है कि अकबर के साथ संघर्ष के समय एक बार महाराणा प्रताप विचलित हो गए थे और उन्होंने अकबर को संधि करने हेतु पत्र लिखा| अकबर ने वह पत्र सबसे पहले पृथ्वीराज को पढ़ाया, उस पत्र को पढ़कर पृथ्वीराज ने जो महाराणा के अनन्य प्रसंशक थे एक पत्र के माध्यम से ऐसे दोहे लिख भेजे जिन्हें पढ़कर महाराणा प्रताप को अपने लिखे पत्र पर बहुत रोष हुआ और उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे अकबर से कभी संधि नहीं करेंगे|इस तरह पृथ्वीराज ने महाराणा को स्वतंत्रता संघर्ष से विचलित नहीं दिया|

राजपूत नारियों की साहित्य साधना की अगली कड़ी में कवयित्री प्रेमकुंवरी का परिचय

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