कछवाहों का आमेर पर आधिपत्य : कछवाहा राजवंश का प्रारम्भिक इतिहास -2

पिछले से आगे…. 1614 ई. में दक्षिण में ऐचिलपुर में महाराजा मानसिंह की मृत्यु होने पर आमेर में उत्तराधिकारी को लेकर एक अशान्तिपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो गई। मानसिंह के वरीयताक्रम में दो पुत्रों जगतसिंह एवं दुर्जनसाल की मृत्यु उनके जीवनकाल से हो चुकी थी। उनका तीसरा पुत्र भावसिंह, जहांगीर की सेवा में था। इस समय […]

कछवाहों का आमेर पर आधिपत्य : कछवाहा राजवंश का प्रारम्भिक इतिहास -1

पिछले से आगे… ज्ञात इतिहास के आधार पर आमेर में सर्वप्रथम सुसावत मीणों का आधिपत्य था। आमेर के आसपास दो-चार कोस के फासले छोटी-छोटी 52 बस्तियां थी, जिनमें मीणों का राज्य था। प्रत्येक मीणा राज्य के पास अपनी गढ़िया थी। आमेर इनकी प्रधान राजधानी (केन्द्रीय शक्ति) थी।30 मीणा जागाओं की बहियों के अनुसार सुन्दरलाल के […]

कछवाहा राजवंश का प्रारम्भिक इतिहास : नरवर से राजस्थान

पिछले भाग से आगे.. नरवर में इस वंश का शासन करीब दस पीढ़ी तक रहा। नरवर के कछवाहों को मध्यकाल में कन्नौज के प्रतिहार वंश के साथ युद्ध करना पड़ा जिसमें इन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा था। वि.स. 1034 वैशाख शुक्ला 5 (11 अप्रेल, 977) के शिलालेख से यह ज्ञात होता है कि उस […]

कछवाहा राजवंश का प्रारम्भिक इतिहास : उत्त्पति, मूल स्थान एवं आमेर आगमन -3

पिछले से आगे …. आमेर के राजाओं के कुछ शिलालेखों – मिर्जा राजा मानसिंह का वि.स. 1658 का सांगानेर से मिला शिलालेख, राजा रायसल दरबारी का रेवास (शेखावाटी) के आदिनाथ मन्दिर का वि.स. 1661 का शिलालेख, लीली (अलवर राज्य) के वि.स. 1803 एवं वि.स. 1814 के शिलालेखों में अपने को कुर्मवंशी लिखा है। पृथ्वीराज रासों […]

कछवाहा राजवंश का प्रारम्भिक इतिहास : उत्त्पति, मूल स्थान एवं आमेर आगमन -2

भाग. 2 से आगे…. इसी सन्दर्भ में एक दूसरा तथ्य मिलता है जिसमें कछवाहा राजपूतों का निकास पश्चिमोत्तर भारत से होना प्रतीत होता है। जिस समय सिकन्दर ने पश्चिमी भारत पर आक्रमण किया था उस समय पहले तो इन लोगों ने उसका डटकर मुकाबला किया किन्तु बाद में इन्हें वहाँ से पलायन कर ‘कच्छ’ नामक […]

कछवाहा राजवंश का प्रारम्भिक इतिहास : उत्त्पति, मूल स्थान एवं आमेर आगमन -1

भाग .1 से आगे… जिस प्रकार अन्य जातियों में अनेक शाखा और उपशाखाओं का  विस्तार हुआ, ठीक उसी प्रकार राजपूतों ने भी अपनी शक्ति, संगठन और प्रभुत्व के बल पर अनेक वंशों की स्थापना कर ली जिनमें मुख्य रूप से अग्नि, चन्द्र और सूर्यवंशी राजपूत हुए। शास्त्रों के अनुसार जिनका वंश सोम से चला वे […]

कछवाहा राजपूत राजवंश का प्रारम्भिक इतिहास – भाग -1

इतिहास मानव जीवन में नई स्फूर्ति उत्पन्न करता है, सोये हुओं को जगाता है और कायरों में वीरत्व पैदा करता है। भूली-बिसरी त्रुटियों को उजागर करके उनमें नवीनता का संचार करता है। इसी प्रकार राजस्थान का इतिहास भी चिरकाल से उज्ज्वल और गौरवमय रहा है तथा वीर प्रसूता भूमि की अस्मिता गौरवशाली इतिहास अदम्य साहस […]

दहिया राजवंश : Dahiya Rajput Rajvansh

ठाकुर बहादुरसिंह बीदासर ने लिखा है कि पहले दहिया राजवंश वाले पंजाब में सतलज नदी पर थे। ऐसा माना जाता है कि उस समय ये गणराज्य के रूप में थे। वहाँ से ये सतलज नदी के पश्चिम में भी फैले। यह माना जाता है कि सिकन्दर के आक्रमण के समय ये वहीं थे। वहाँ इन्होंने […]

परमारों का विस्तार और आजादी के बाद परमार वंश

Parmar Kshatriya Rajvansh ka Itihas hindi me परमारों का विस्तार- उज्जैन छूटने के बाद परमारों की एक शाखा आगरा और बुलंदशहर में आई। उन्नाव के परमार मानते है कि बादशाह अकबर ने उन्हें इस प्रदेश में जागीर उनकी सेवाओं के उपलक्ष में दी। यहाँ से वे गौरखपुर में फैले। कानपुर, आजमगढ़ और गाजीपुर में परमार […]

परमार राजवंश और उसकी शाखाएँ : भाग-3

भाग-2 से आगे ….Parmar Rajvansh ka itihas जगनेर के बिजौलिया के परमार- मालवा पर मुस्लिम अधिकार के बाद परमारों चारों ओर फैल गये। इनकी ही एक शाखा जगनेर आगरा के पास चली गई। उनके ही वंशज अशोक मेवाड़ आये। जिनको महाराणा सांगा ने बिजौलिया की जागीर दी। जगदीशपुर और डुमराँव का पंवार वंश- भोज के […]