राजपूत नारियों की साहित्य साधना : चंपादे भटियाणी

यह जैसलमेर के रावल मालदेव की पोत्री और रावल हरराज की राजकुमारी थी| रावल हरराज जैसलमेर के शासकों में बड़े साहित्य और कला प्रेमी शासक थे| उनके शासनकाल में राजस्थानी छंद शास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथ पिंगल सिरोमणि और श्रृंगार रस के काव्य ढोला मारू री चौपाई का सर्जन जैन मुनि कुशललाभ जी ने किया था| […]

मीरांबाई

मीरांबाई

साहित्यिक क्षेत्र में भक्ति भागीरथी मीरांबाई राजपूत समाज ही नहीं भारतीय नारी समाज की माला की सुमेरु-मणि है| मध्यकालीन संत तथा भक्त-कवियों में कबीर, तुलसीदास और सूरदास के समकक्ष साहित्य जगत में उसका स्थान है| वह राजस्थान के राठौड़ कुल की मेड़तिया शाखा के राव दूदा की पोत्री तथा ठाकुर रतन सिंह बजोली की पुत्री […]

राजपूत नारियों की साहित्य साधना

राजपूत नारियों की साहित्य साधना

भारतीय इतिहासकारों ने शासक जाति राजपूत नारियों के द्वारा शासन सञ्चालन में योगदान, युद्ध बेला में शत्रु सामुख्य जौहर तथा शाकों में आत्म-बलिदान और पति की मृत्यु पर चितारोहण कर प्राण विसर्जन करने आदि अति साहसिक कार्यों पर तो प्रकाश डाला है परन्तु उनके द्वारा सर्वसाधारण के हितार्थ किये गए विशिष्ट सेवा कार्यों की ओर […]

नहीं बदलते राजपूत समाज में महिलाओं के सरनेम

नहीं बदलते राजपूत समाज में महिलाओं के सरनेम

हमारे देश में लगभग समुदायों में महिला का शादी के बाद सरनेम बदल जाता है, उसे अपने पिता के सरनेम से पति का सरनेम रखना पड़ता है| जिससे महिला की अपने खानदान की पहचान खत्म हो जाती है| पिछले दिनों हिंदुस्तान में भी इस सम्बन्ध में दो लेख पढ़ने को मिले- एक लेख में एक […]

सुहाग पर भारी पड़ा राष्ट्र के प्रति कर्तव्य

सुहाग पर भारी पड़ा राष्ट्र के प्रति कर्तव्य

रावल अखैसिंह की मृत्युपरांत सन १७६२ में रावल मूलराज जैसलमेर की राजगद्दी पर बैठे | उनके शासन काल में उनका प्रधानमंत्री स्वरूपसिंह जैन जो वैश्य जाति का था बहुत भ्रष्ट व स्वेछाचारी था | उसके षड्यंत्रों से सभी सामंत बहुत दुखी व नाराज थे पर प्रधान स्वरूपसिंह जैन ने रावल मूलराज को अपनी मुट्ठी में […]

पति के प्राणों की रक्षार्थ अपना प्राणोंत्सर्ग करने वाली रानी कलावती

अल्लाउद्दीन खिलजी के सेनापति ने दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त करने से पूर्व रास्ते में एक छोटे से राज्य के राजा कर्णसिंह को अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव भेजा | बिना युद्ध किये एक क्षत्रिय पराजय स्वीकार करले,यह कैसे संभव हो सकता है ? अत: कर्णसिंह ने यवनों से संघर्ष करने को तैयार हुआ | […]

रानी जवाहर बाई

रानी जवाहर बाई

मेवाड़ के महाराणा संग्रामसिंह का पुत्र विक्रमादित्य विलासी और योग्य शासक था | मेवाड़ राज्य की बागडोर जब उसके हाथ में आई तो उसके कुप्रबंधन के चलते राज्य में अव्यवस्था फ़ैल गई | मेवाड़ की पड़ोसी रियासतें मालवा व गुजरात के पठान शासकों ने इस अराजकता का लाभ उठाकर चितौड़ पर आक्रमण कर दिया | […]

चितौड़ की रानी पद्मिनी

चितौड़ की रानी पद्मिनी

रावल समरसिंह के बाद उनका पुत्र रत्नसिंह चितौड़ की राजगद्दी पर बैठा | रत्नसिंह की रानी पद्मिनी अपूर्व सुन्दर थी | उसकी सुन्दरता की ख्याति दूर दूर तक फैली थी | उसकी सुन्दरता के बारे में सुनकर दिल्ली का तत्कालीन बादशाह अल्लाउद्दीन खिलजी पद्मिनी को पाने के लिए लालायित हो उठा और उसने रानी को […]

पन्ना धाय से कम न था रानी बाघेली का बलिदान

पन्ना धाय से कम न था रानी बाघेली का बलिदान

भारतीय इतिहास में खासकर राजस्थान के इतिहास में बलिदानों की गौरव गाथाओं की एक लम्बी श्रंखला है इन्ही गाथाओं में आपने मेवाड़ राज्य की स्वामिभक्त पन्ना धाय का नाम तो जरुर सुना होगा जिसने अपने दूध पिते पुत्र का बलिदान देकर चितौड़ के राजकुमार को हत्या होने से बचा लिया था | ठीक इसी तरह […]

रानी जसवंत दे हाड़ी

जसवंत दे बूंदी के राव हाडा की पुत्री थी | हाडा वंश की यह राजकुमारी अत्यंत वीर व साहसी महिला थी | जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह (प्रथम) के साथ इसका विवाह सम्पन्न हुआ | महाराजा जसवंत सिंह भी बड़े वीर और पराक्रमी राजा थे | मुग़ल दरबार में उन्हें महत्त्वपूर्ण मनसब मिला हुआ था […]