हठीलो राजस्थान-40, वीर रस के डिंगल सौरठे

हठीलो राजस्थान-40, वीर रस के डिंगल सौरठे

तनां तपावै ताव सूं, मनां घणी खूंखार | त्यागण तणी पुकार ना, नागण तणी फुंकार ||२३८|| ग्रीष्म ऋतू प्रचंड ताप से तन को तपा रही है यह स्वभाव से ही खूंखार है जिसके कारण उष्णता अधिक है | अब गर्मी के कारण वस्त्रादि त्यागने की बात सुनाई नहीं पड़ती क्योंकि लू रूपी नागिन फुंकारे भर […]

हठीलो राजस्थान-39, वीर रस के सौरठे

हठीलो राजस्थान-39, वीर रस के सौरठे

गरम धरा, गरमी गजब, गरम पवन परकास | सूरां तणों सभाव ओ, इला तणों उछवास ||२३२|| यहाँ (राजस्थान)की धरती गर्म है, यहाँ गजब ढाने वाली गर्मी पड़ती है | हवाएं भी गर्म चलती है | उपरोक्त गर्मी यहाँ बसने वाले शूरवीरों के उग्र स्वभाव का प्रभाव है अथवा यहाँ की धरती द्वारा छोड़ी गए उच्छवासों […]

हठीलो राजस्थान-38

हठीलो राजस्थान-38

उलझी टापां आंतड़यां, भालां बिन्धयो गात | भाकर रो भोम्यों करै, डाढ़ा घोडां घात ||२२७|| घोड़े पर सवार शिकारी जंगल में सूअर पर प्रहार करता है -भाले से सूअर का शरीर बिंध गया है | घायल सूअर पर शिकारी के घोड़े के पैर जाकर गिरने से उसकी आंतडियां प्रभावित हुई है पर फिर भी पहाड़ […]

हठीलो राजस्थान-37

हठीलो राजस्थान-37

ओडे चूँखै आंगली, खेलै बालो खेल | बिणजारी हाँकै बलद, माथै ओडो मेल ||२२०|| बालक टोकरे में अपनी अंगुली चूसता हुआ खेल रहा है व उसकी माता (बिणजारी) टोकरे को सिर पर लिए हुए अपने बैलों हांकती हुई चली जा रही है| देखो जोड़ी हेत री, हित हन्दो बरताव | इक मरतां बीजो मरै, सारस […]

हठीलो राजस्थान-36 : राजस्थान का जनजीवन दोहों में

हठीलो राजस्थान-36 : राजस्थान का जनजीवन दोहों में

घुमै साथै रेवडां, धारयां जोगी भेस | गंगा जमुना एक पग, बीजो मालब देस ||२१४|| राजस्थान के भेड़ बकरियों चराने वाले अपने रेवड़ों के साथ अकाल के समय कभी मालव प्रदेश में कभी गंगा यमुना के किनारे अपने पशुओं को चराने के लिए फिरते रहते है , क्या वे उन संतों के समान नहीं है […]

हठीलो राजस्थान-35 वीर रस के राजस्थानी दोहे

अमलां हेलो आवियौ, कांधे बाल लियांह | केरो केरो झाँकतो, ढ़ेरी हाथ लियांह ||२०८|| जब अमल लेने के लिए आवाज हुई तो अमलदार (अफीमची) जिसके कन्धों तक बाल थे,अमल की ढ़ेरी हाथ में लिए टेढ़ा-टेढ़ा देखता हुआ पहुंचा | लालां सेडो झर झरै, अखियाँ गीड अमाप | जीतोड़ा भोगै नरक, अमली माणस आप ||२०९|| जिसके […]

हठीलो राजस्थान-34

धर गोरी, गोरी खड़ो, गोरी गाय चराय | गोरी लाई चूरमो , गोरी रूप लजाय ||२०३|| रेगिस्तान की धवल भूमि पर गोर वर्ण का ग्वाल सफ़ेद गाय को चरा रहा | दोपहर होने पर उसकी सुन्दर पत्नी भोजन के लिए चूरमा लेकर आती है व ग्वाल के रूप को देखकर शरमा जाती है | टाबर […]

हठीलो राजस्थान-21

अमर धरा री रीत आ, अमर धरा अहसान | लीधौ चमचौ दाल रो, सिर दीधो रण-दान ||१२४|| इस वीर भूमि की कृतज्ञता प्रकाशन की यह अमर रीत रही है कि दल के एक चम्मच के बदले में यहाँ के वीरों ने युद्ध में अपना मस्तक कटा दिया || नकली गढ़ दीधो नहीं , बिना घोर […]

हठीलो राजस्थान-20

मुरछित सुभड़ भडक्कियो, सिन्धु कान सुणीह | जाणं उकलता तेल में, पाणी बूंद पडिह ||१०३|| युद्ध में घावों से घायल हुआ व् अचेत योद्धा भी विरोतेजनी सिन्धु राग सुनते ही सहसा भड़क उठा,मानो खौलते तेल में पानी की बूंद पड़ गई हो | बाजां मांगल बाजतां, हेली हलचल काय | कलपै जीवण कायरां, सूरां समर […]

हठीलो राजस्थान-19

हठीलो राजस्थान-19

बिण ढाला बांको लड़े, सुणी ज घर-घर वाह | सिर भेज्यौ धण साथ में, निरखण हाथां नांह ||९७|| युद्ध में वीर बिना ढाल के ही लड़ रहा है | जिसकी घर-घर में प्रशंसा हो रही है | वीर की पत्नी ने युद्ध में अपने पति के हाथ (पराक्रम) देखने के लिए अपना सिर साथ भेज […]