ठाकुर महेशदास आसोप, जिन्होंने तलवार से काट दी तोप की नली

ठाकुर महेशदास आसोप : सुमेलगिरी के समरांगण में मातृभूमि के लिए प्राणों का उत्सर्ग करने वाले वीरवर कूंपा की वंश परम्परा में जन्में ठाकुर महेशदासजी की वीरता का बखान मारवाड़ के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा है | ठाकुर महेशदासजी का जन्म वि.सं. 1803 में हुआ था | आपके पिता कुंवर दलपतजी थे और […]

देवगढ फोर्ट पारम्परिक जल आपूर्ति व्यवस्था का बेहतरीन नमूना

देवगढ के किले में पानी आपूर्ति के लिए अंडरग्राउंड टैंक बना है | जिसमें मुख्य महल की छत और प्रांगण में बहने वाले वर्षा जल को संग्रहित कर वर्षभर की पानी की आवश्यकता पूरी की जाती थी | चूँकि देवगढ किला सैनिक छावनी था अत: सैनिकों व संकटकाल में सीकर के राजपरिवार की आवश्यकता के […]

देवगढ फोर्ट सीकर : रहस्य और रोमांच का संगम

देवगढ फोर्ट सीकर :  सीकर शहर के दक्षिण दिशा में अरावली की ऊँची पहाड़ी पर बना है देवगढ फोर्ट, जो वास्तुकला का नायाब नमूना है | वि. सं 1841 में सन 1784 में सीकर के राजा राव देवीसिंहजी ने यह किला बनवाया था, जो उन्हीं के नाम पर देवगढ फोर्ट के नाम से जाना जाता […]

History of Lamiya Fort लामिया का इतिहास

History of Lamiya Fort: इतिहास में राजा रायसल दरबारी के नाम से प्रसिद्ध रायसलजी को सात गांवों की जमींदारी मिली थी | राजा रायसल दरबारी अमरसर के शासक राव सूजाजी के पुत्र थे | वि. सं. 1611 में रायसलजी ने अपनी जमींदारी में एक छोटे से किले का निर्माण कर लामिया नाम से गांव बसाया […]

गौरक्षा के लिये मर मिटे थे ये मुसलमान

गौरक्षा के लिए किसी मुसलमान द्वारा प्राणों की आहुति देने की बात की जाय तो शायद ही कम लोग पचा पायेंगे | लेकिन इतिहास में मुसलमानों द्वारा गौरक्षा के लिए प्राणों के उत्सर्ग के उदाहरण मिल जाते हैं | रघुनाथसिंह कालीपहाड़ी द्वारा लिखित “शेखावाटी प्रदेश का राजनैतिक इतिहास” पढ़ते हुये मुझे चुरू जिले के आसलसर […]

माण्डण युद्ध, जब राजपूत व जाटों ने मिलकर सबक सिखाया मुगलों को

माण्डण युद्ध 6 जून, 1775 ई. के दिन रेवाड़ी के पास माण्डण नामक स्थान पर शाही सेनाधिकारी व शेखावतों के मध्य हुआ था | यह युद्ध इतना भीषण था कि विजयी शेखावत पक्ष की हर शाखा उपशाखा के वीरों ने अपनी स्वतंत्रता बचाए रखने के लिए प्राणों की आहुति दी थी | शाही सेना का […]

ये था देश की गुलामी का सबसे बड़ा कारण -1

भारत में एक से बढ़कर एक योद्धा हुए हैं | यहाँ की हर घाटी व मैदान रणक्षेत्र रहा है, फिर सवाल उठता है कि भारत गुलाम क्यों हुआ ? इस सवाल के जबाब में कई किताबें लिखी जा सकती है और लिखी भी गई है और ज्यादातर इतिहासकारों ने इस विषय पर गहन मंथन भी […]

आमेर के ये पांच युवराज इसलिये नहीं बैठ सके राजगद्दी पर

आमेर के इतिहास पर नजर डाली जाये तो आमेर के पांच युवराज राजगद्दी के अधिकारी होते हुए भी गद्दी पर नहीं बैठ सके | इन सभी युवराजों को भिन्न भिन्न कारणों से आमेर की राजगद्दी नसीब नहीं हुई | इनमें सबसे पहले थे – युवराज कुम्भाजी | कुम्भाजी आमेर नरेश चंद्रसेनजी के बड़े पुत्र थे […]

ठाकुर हणूंतसिंह डूण्डलोद, मांडण युद्ध के योद्धा

बिसाऊ के ठा. केसरीसिंह शार्दूलसिंहोत के दोनों पुत्रों में ठाकुर हणूंतसिंह ज्येष्ठ थे। उन्होंने डूण्डलोद में गढ़ बनवा कर अपना अलग ठिकाना कायम कर लिया। बिसाऊ पर उनके छोटे भाई सूरजमल का अधिकार रहा। द्वितीय जाट अभियान के समय (सं. 1731 वि.) नवाब नजफकुली ने झुंझुनू पर भी चढ़ाई करनी चाही थी, किन्तु अपने सलाहकारों […]

राजपूत व जाटों के खिलाफ यूँ लामबंद हुये थे मुग़ल व मराठा

विक्रम सम्वत् 1830 की आसोज शुक्ला पंचमी के दिन मुग़ल बादशाह शाहआलम द्वितीय प्रकट हुआ। दिल्ली निवासियों ने पहली बार यह जाना कि बादशाह जीवित है और दिल्ली आ रहा है। मराठों की विशाल सेना उसके साथ थी। मुगल सेना का संचालक मिर्जा नजफखां सेना के अग्रभाग में चल रहा था। रुहेला पठानों के प्रदेश […]