लोकदेवी-सूंक

लोकदेवी-सूंक
रिश्वत पर राजस्थानी भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार श्री सौभाग्यसिंह जी शेखावत का राजस्थानी भाषा में लेख—

‘पूजापौ’, ‘नजराणौ’ अर ‘सूंक’ (रिश्वत, bribe) सबद देखण में तौ न्यारा-निरवाळा है। पण ब्यौवार में अै तीनूं ही अेक सारखा है। ‘पूजापौ’, देई-देवतावां रै चढीजै। पूजापै नै इज सीरणी प्रसादी, बळ, भोग नै चढावौ कैवै। देई-देवतावां री महर खातर आस्तिक लोग उणां री बोलमां करै, मनवांछित फळ-लबधी रै पाछै उणा रै देवथांन तांई पाळा जावै, जात-जडूला चढावै, प्रसादी सवामणी करै, झारी में नकद रुपिया घालै अर मंगळ गीत गवाया जावै।

‘नजराणौ’ मोटा हाकम, दिवाांण, ओहदादारां रै जिकी चीजां समरपीजै उण नै कैवै। नजरांणै में रोकड़ी रुपिया, घाबा-लतां रा थान, घी, गुड़, गोवूं सूं लेय नै गाय, भैंस पसुवां तक री गिणती हुवै। अंगरेजां रै जमानै में बडा-बडा सेठ साहूकार, राजा जागीरदार उणांरी क्रपा वासतै फळ-फूलां री छाबां भेजिया करता। आज भी औ रिवाज चालू है। राज काज में जिक मिनखां रौ ‘हांम पाव’ हुवै, उणां रै नजराणौ पेस हुवै है।

‘सूंक’ तौ लोकतंतर री लाडली देवी है। छोटा नै लुंठा तूं लूंठा सूंक रौ चरणाम्रत लेय नै आप रौ जीवण-जळम सफळ करै है। राज-दरबार, कचेड़ी-कोटवाळी पंचपंचायत सगळी ठोडां सूंक री देवळियां थरपीजियोड़ी है। सूंकदेवी रा पुजारा-भोपा, सेवग नै कामेती अेक नै ढूंढतां पचास मिळे है। सूंक री ओट लिया संू मिनख रा सगळा काट झड़ जावै नै सारी पीड़ मिट जावै।

इण भांत पूजापौ, नजराणौ नै ‘सूंक’ तिरेपनवां भैंरू, दसवीं दुर्गा, पैंसठवीं जोगणी नै देवाधिपत देव रौ नूंवौ औतार गिणीजै है। इण जुगावतार री आराधणा सूं पांगळी लाल-किला में पूग जावै, बजर-मूढ़ रेडियै माथै बोल आवै नै डरपस्याळियौ वीर पद पा जावै। इण री महिमा रौ पार पावणौ मेह री छांटां री गिणती करणै सूं भी दोरौ है। गुणां री खांण इण महामाया रै चरित रौ बखाण नीं काळीदास रा ग्रन्थां में मिळै, न वेदव्यास रा महाभारथ में खळलै। बालमीक, तुळसी नै आंधळौ कोई भी सूंकदेवी रै प्रवाड़ां तांई नीं पूग पायौ।

देखण में ‘पूजापौ’ ‘नजराणौ’ नै सूंक तीनूं जोड़ला मां-जाया भाई बैंन है। अेक इज उदर सूं जलमियोड़ा एक इज पालणै झूलियोड़ा, एक ही आंगणै रमयोड़ा नै एक ही गरु-परम्परा नै पौसाळ रा चेला रहियोड़ा है। रूस नै चीण आपसरी में एक दूजा सूं रूसै पाकिस्तान नै बंगला देस वाळा एक दूजा नै देखियां बळनै आकतड़ी हुय जावै, पण पूजापैं, नजराणै अर सूंक रौ संप निराळौ है। लड़णौ-झगड़णौ तौ आंतरै रह्यौ, कदैई आपसरी में बोली-चाली, कही-सुणी भी हुयोड़ी कोनी सुणी। जैड़ी प्रीत न द्वापर में रैयी अर नै त्रेता जुग में।

जिण तरै मिनखां रौ एक सारखौ उणियारी नीं मिलै, उणी भांत सुभाव में भी आकास-पाताळ रौ आंतरौ मिलै। जद मिनखां री रुचि में मेळ नीं तौ फेर प्रकत देवां में मेळ किण भांत हुय सकै। न्यारा देव, न्यारा पूजापा, न्यारा पुजारी नै न्यारा-न्यारा पूजणिया।

आदपूज बिघनटाळ बिनायक मोदक-प्रेमी है। चौसठ जोगणियां री धिराणी चंडका मांस नै दारू सूं रीझै है। बावन बीरां रा आगीवांण काळी मैरू बाकळां सूं राजी हुवै। रामदूत अतुल बळधाम हड़मान रै सवा सेर रै बाटां रौ भोग चढायां कारज सिध हुवै सिवजी आक धतूरा सूं ही रीझै। गोरज्या रै ढोकळा रौ भोग लागै। जूझारां भौमियां रै नारेल चढीजै। जद देवता ई चढावा सूं राजी हवदै तौ मिनखां रै सूंक चढै, इण में अणहूंती कांई ? सूंक सूं कुंण राजी नीं हुवै ?

लोकतंतर में जनता राजा बाजै। पिरजा रा बणायोड़ा ठावा मिनखां रै पांण राजकाज चालै। राजतंतर री भांत कोई एक मिनख न राज रौ धणी हुवै, न अेक जात री राज करणै री बपौती हुवै। पण औ ओखाणौ घणौ पुराणौ है कै जिसा देव, उसा ही पुजारा। मंत्री नै मेम्बर लोग इज लोकतंतर रा देव है। ओहदादार, मुसायब, कामदार उणांरा पुजारा है। पुराणा देवता तौ बासना रा भूखा होता पण आज रा देवता तौ कोरी बासना सूं तिरपत नीं हुवै। उणां रै तौ सांचकलौ प्रसाद चढायां इज काम बणणै रौ गतगैलौ नीसरै। काम-काज नै ढंगसिर चलावण खातर नेम-कायदा हुवै तौ अठै भी अैहड़ा कायदा बणायोड़ा है। जिसा काम उणी तरै री सूंक बंधोड़ी है। किणी ने नौकरी चाहिजै तौ जिसी जगै, उणी रै माफक सूंक चढायां कारज सिध हुवै। ‘अेयर-फोरस’ में सिपाई बणणौ हुवै तौ पैली दो हजार चढता पण अब दस हजार रै चढावै सूं काम पार पड़ै। पुलिस री थाणैदारी रौ भाव तौ और भी घणौ ऊंचौ है। दस हजार संू तीस हजार पर जाता कठैई सोदौ झळै तौ झळै। फेर जे कोई गंगानगर नै रायसिंघनगर री पलटी चावै तौ पांच हजार री माहवारी ‘रेख’ भरणी पड़ै। गंगानगर री थाणैदारी आजकलै माळवै री मनसबदारी रै बरौबर मानी जावै है। जैपुर माणकचौक थाणौ नै जोधपुर रौ उदै मन्दिर थाणौ पैदास में लंगै-ढंगै गिणीजै है। जैपुर रौ माणक चौक थाणौ आगरा री कोटवाळी नै उदै मंदिर रौ थाणौ दिखण रा बुरहानपुर री होड़ करता कहीजै।

कचेड़ी में किणी मामला-मुकदमां री नकल लेवणी हुवै तौ पुराणा रेकार्ड रा बाबू रौ धूप-ध्यान करियां बिना पार पड़णौ दोरौ है। रामचंदरजी तीन तिलोकी रा नाथ हा पण लंका पर चढ़ाई करी, जद सागर री पूजा करी। जणां ही सागर आगै जावण रौ गैलौ दियौ हौ। कचेड़ी में भी चपड़ासी नै अेक रुपियौ झिलायां कुरसी रा देवता कनै पूगबा रौ गैलौ नीकलै। पछै रेकार्ड-बाबू नै रीझाणौ पडै़। चपड़ासी नै बाबू तौ कचेड़ी रा राहु-केतु गिणीजै। इणां रै सनमुख हुवां इज काम पार पडै़, नींतर तौ अटक्यौ कारज सरणौ दूभर है। औ रिवाज कचेड़ी में इज नीं है- बैंका, तैसीलां, अस्पताळां, पंचायतघरां नै पटवारियां रै हळकै तक चालू है।

दोय हजार रुपिया पगार कमावण वालै थांणैदार रै रामबाग जेड़ौ बंगलौ संूक रै परताप रौ फळ इज है। पटवारी री बोरगत रौ रहस संूक इज तौ है। कचेड़ी रै अैलकार रै पांच हजार रुपिया माहवारी रै खरचौ नै सूंक इज तौ पूरै है। संूक रै इज कारण रोजीना गोठ-घूघरियां हुवै है। नितनुंवा टैरीलीण रा घाबा नै स्कूटर कम-रोजी पावणियां रै कठै संू आवै है ? अै सारी बातां आंधौ इज जाण सकै है कै सूंक सायजादी रै तूठां इज काम पार पडै़ है। बंगलौ, स्कूटर, कार, टैरीलीण सारा थोक सूंक रै क्रपा-कटाछ सूं मिळे है। सूंक रा पीसां सूं नगरां में जमीनां खरीदीजै। प्लाटां रा धंधा करीजै। आभूसणां सूं तिजोरियां भरीजै। नौकरी तौ नांव की हुवै। सूंक री ऊपर छाळा री कमाई रै आगै नौकरी बापड़ी रा गिणत रा टक्कां री कांई गिणत ?

सूंक लोकतंतर री उर्वसी है। अंगरैजां रै जमानै में तपस्या-भंग हुवण सूं आ धरालोक में सराप-मोचण नै आई ही, पण अब तौ पाछी जावण रौ सूत ही नीं करै। अठै ही घरबासौ मांड लियौ। भलां, अब छोरा-छोरी बेटां-पौतरां नै छोड कींकर जावै ? पूरी ग्रहस्थी, भरौ-पूरौ कुळ-कडूंबौ, आखा प्रान्त पड़गनां में मांन-तांन आवभगत किंण भांत छोड़ीजै। लागै है देस में कदै सोटां रौ सूंटौ नै आकासी काळी पीळी आंधी रा ओळा नीं बरस पड़ै। ई पैली सूंक रौ सिंघासण अटळ अडिग इज लखावै है। इण वासतै लोकतंतर री नूवीं देवी ‘सूंक’ री आरती उतारौ। पगल्या खोळ नै चरणाम्रत लेवौ। इण री सोड़स पूजा करौ। कारज सिद्धि रै तांई इण सूं बधती नीं हड़मान री पूजा फळदायी है अर नीं काळा-गौरा चंडी-पूतां री बोलमां ही आडी आंणी है।

बोलौ जुगदेवी सूंक री जै। सिद्धि री राणी री जै।

Leave a Reply

Your email address will not be published.