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Friday, October 7, 2022

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चक्रवर्ती सम्राट विचित्रवीर्य का नाम चित्र-रथ से विचित्र वीर्य क्यों पड़ा ?

महाभारत कालीन महाराज धृतराष्ट्र और पांडू के जन्म पर हमें पढाया व टीवी में दिखाया जाता है कि वे वेद व्यास की संतानें है क्या वाकई महाराज धृतराष्ट्र और पांडू वेद व्यास जो ब्राह्मण थे की संतान है ? या वेद व्यास ने चक्रवर्ती सम्राट विचित्र वीर्य जिनका असली नाम चित्र रथ था के संरक्षित वीर्य से कृत्रिम गर्भाधान तकनीक के जरीय धृतराष्ट्र और पांडू का जन्म कराया ? चक्रवर्ती सम्राट चित्र रथ का नाम विचित्र वीर्य क्यों पड़ा ?

ज्ञान दर्पण.कॉम पर बता रही है कुंवरानी निशा कँवर

हम पांडा-वाद की मानसिक दासता के इतने आदी हो चुके है क़ि जब वह मोटी-मोटी पुस्तको को सर पर लाद कर हमारे सामने आता है तो हमें लगता है क़ि यह कोई बहुत ही उच्च श्रेणी का धार्मिक ग्रन्थ है ! पंडाजी ने उसका नाम भी बहुत ही आकर्षक और मनमोहक रखा होता है जैसे क़ि “श्री मद-भागवत पुराण” | ऐसे भ्रमित करने वाले नामों से हम जो क़ि पहले से ही अध्ययन के प्रति अरुचि दिखा चुके होते है के प्रति खींचे चले जाते है | और पंडा-वादी तत्व इसका पूरा -पूरा फायदा उठाते है | हमारे ही धन पर इन पुराणों का श्रवण हमारे संपूर्ण नारी-समाज और बालकों को करवाते है और इन पुराणों की किसी भी बात पर शंका न करने का पूरा भय पहले ही दिखाकर हमारे महान पूर्वजों का चरित्र हनन करने का दुष्कृत्य करते है | हम न केवल उसे सुनते है बल्कि उसे सत्य मानकर अपने ही महान पूर्वजों के प्रति घृणित वातावरण बनाने के महापाप में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते है |

वैसे तो हमारे समाज के इन परम्परागत शत्रुओं ने किसी भी महान चरित्र का चाहे वह अखिल कोटि ब्रह्माण्ड के महानायक श्री राम और कृष्ण हो या फिर पितामह भीष्म, माता सत्यवती हो या फिर राजमाता कुंती, किसी को नहीं बक्शा है किन्तु कुछ ऐसे घिनौने झूंठ इन्होनें जोड़े है जिससे हमारे क्षत्रिय समाज के कई पूरे के पूरे कुल जैसे तोमर (तंवर) चाहे वह राजपूत तोमर हो या जाट तोमर हो या फिर मुश्लिम राजपूत तोमर हो, उन्हें तो एकदम से वर्ण-शंकर सिद्ध करने का कुत्षित प्रयास किया है|
“श्री मद-भागवत पुराण’ में क्योंकि संपूर्ण तोमर कुल चाहे वह आज किसी भी जाति , वर्ण या धर्म में हो वह सुभद्रा-नंदन , अभिमन्यु के ही वंशज है | और पंडा-वादियों ने लिख दिया है क़ि यह महाराज पांडू और धृतराष्ट्र तो पराशर और सत्यवती की नाजायज संतान वेद-व्यास जी के महाराज विचित्र-वीर्य की विधवाओं ( अम्बिका और अम्बालिका) के साथ नाजायज सम्भोग (नियोग) करके पैदा किया गया है !!!!

अब बताइए की ऐसे अनैतिक सम्बन्ध जिन्हें समाज आजतक भी घोर अनैतिकता की श्रेणी में रखता है उस समय इन महा पाखंडी पंडों ने अपनी लेखनी से क्षत्रिय कुल की मर्यादा की कैसे धुल धूसरित किया है और हम से बड़ा नाजोगा और कपूत कौन होगा कि हम उन्ही पाखंडियों को अपना धन भी लुटाने के लिए तैयार रहते है ?? यह विचारनीय विषय है !!! श्रद्देय श्री देवी सिंह जी महार ने अपनी बहुपयोगी पुस्तक “हमारी भूले” में साफ़ साफ़ लिखा है कि संस्कृत भाषा के ज्ञान के आभाव ने हमें बहुत गहरी चोट पहुंचाई है ! और इस प्रकरण में भी यही हुआ ,,,वरना क्या हमें यह जानकारी नहीं होती कि “विचित्र-वीर्य ” का शाब्दिक अर्थ क्या है ??

कौन थे विचित्र वीर्य –

महाराज शांतनु के सत्यवती से दो पुत्र पैदा हुए जिनमे बड़े चित्रांगद और छोटे चित्र-रथ (कही कही उनका नाम चित्र-केतु और चित्र-वृत भी पाया गया है ) थे| तब चित्र-रथ का नाम विचित्र-वीर्य कैसे पड़ गया ? यह नाम था या कोई उपाधि या विरुद ?? हमने कभी इन बातों पर गौर करने का श्रम ही नहीं किया ! पंडा-वाद को भरपूर मौका मिला, अब यह विचार करने कि बात है कि “विचित्र-वीर्य” का शाब्दिक अर्थ क्या होता है ?

विचित्र+वीर्य, विचित्र यानि विशेष प्रकार का, खास,कोई विशेषता लिए या अद्भुत और वीर्य का अर्थ होता है अंश ,बीज या शुक्राणु, जिससे सन्तति बढती है ! इस का अर्थ यह हुआ कि चक्रवृति सम्राट चित्र-रथ विचित्र वीर्य के धनी थे ! चूँकि पितामह भीष्म ने कुरु वंश और हस्तिनापुर राज सिंहासन की रक्षा के लिए वचन दिया हुआ था और जब महाराज चित्रांगद अपने ही नाम के गंधर्व के हाथों वीरगति को प्राप्त होगये थे, राजमाता सत्यवती ने भीष्म से कहा कि यदि कभी छोटे बेटे चित्र-रथ के साथ भी ऐसी ही दुर्घटना घटित हो गई तो आपके द्वारा ली गयी प्रतिज्ञा का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा अतः पुत्र कोई उपाय कीजिये क्योंकि तुम जरुर कोई न कोई रास्ता निकल सकते हो !

तब पितामह भीष्म ने अपने मित्र महार्ण क्षत्रिय ऋषि, श्री मनन नारायण कि वाणी से उत्पन्न, कृष्ण द्वपायन, भगवान अपन्तार्त्मा जिन्हें आज लोग वेद-व्यास के नाम से जानते है के पास गए, ध्यान रहे कि कृष्ण द्वपायन जी तत्कालीन बहुत ही उच्च श्रेणी के महान वैज्ञानिक थे | पितामह भीष्म ने अपनी समस्या अपने मित्र के साथ बांटी और भगवान अपन्तरतमा (वेद-व्यास जी ) ने महाराज चित्र-रथ के शुक्राणु सुरक्षित अपने वेधशाला में रखवा दिए और भीष्म पितामह को कहा कि आज से आपका अनुज विचित्र-वीर्य हो गया है| अब इसकी अनुपस्थिति में भी इसके संतान उत्पत्ति में कोई समस्या नहीं है यह तत्कालीन कृत्रिम विर्यगर्भाधान के जानकार थे ! इसके बाद महाराज चित्र-रथ विचित्र-वीर्य नाम से ही प्रसिद्द हुए |

कृत्रिम गर्भाधान से पैदा हुए थे धृतराष्ट्र, पांडू और विदुर –

इसके बाद जब सम्राट विचित्र-वीर्य कि मृत्यु पर राजमाता सत्यवती ने बताया कि दोनों रानी गर्भ रहित है, तब पितामह अपने मित्र भगवान अपन्तरतमा (वेदव्यास जी ) को महाराज विचित्र-वीर्य के सुरक्षित अंश के द्वारा रानियों को कृत्रिम गर्भाधान के लिए बुलाकर लाते है और सम्राट विचित्र-वीर्य कि मृत्यु के उपरांत भी उन्ही के अंश से महाराज धृतराष्ट्र, पांडू और विदुर जी पैदा होते है ! यह बात बिलकुल झूंठी है कि अम्बिका के आंख बंद करने से महाराज धृतराष्ट्र अंधे पैदा हो गये क्योंकि गर्भाधान के समय माता या पिता की आंखे बंद होने से यदि संतान नेत्र-हीन पैदा होती है तब तो यह सभी कौरव भी अंधे ही पैदा हुए होते !

अतः अब जब भी पंडावादी यह घृणित प्रकरण सुनाये उन्हें वहीँ टोका जाये और हो सके तो उचित दंड भी दिया जाये, क्योंकि महाराज धृतराष्ट्र और पांडू किसी के नाजाय पुत्र नहीं बल्कि स्वयं चक्रवृति सम्राट विचित्र-वीर्य के पुत्र है|

अगले अंश में-
१).बिना माता-पिता के भगवान अपान्त्र-तमा(वेद-व्यासजी ) का जन्म कैसे हुआ ?एवं सत्यवती को माता क्यों बुलाते थे ?
२). राजमाता कुंती के द्वरा कर्ण और पांडवों के जन्म की हकीकत|
३).बिना माता-पिता के द्रौपदी और ध्रुस्टधुम्न का जन्म और
४). माता देवकी जी के गर्भ से बलराम जी माता रोहणी जी के गर्भ में कैसे पहुंचे ? का विस्तार से वर्णन बताया जायेगा|

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8 COMMENTS

  1. समझ नहीं आता "पांडा-वाद" कोनसे जन्म का बदला ले रहा है 🙂

  2. पौराणिक आख्यानों में हर स्तर पर हर परवर्ती ग्रंथकार द्वारा, अपनी सुविधा और रूचि अनुसार क्षेपक जोडे गये हैं. इसका अपवाद रामायण भी नही है. हर रामायण अलग अलग कहानी कहती है. इसी प्रकार जब तक कोई ठोस तथ्यात्मक बात नही हो तब तक इन मामलों को सत्य मानना सही नही होगा.

    हमारे यहां लिखित इतिहास की परंपरा बहुत बाद में आई है जो कुछ भी हम सुनते पढते हैं वो सिर्फ़ संहिताओं या स्मृतियों द्वारा आया है, अब एक बात को सुनकर उसी रूप में आगे बढाना और वो भी इतने समय तक, यह असंभव है. अत: पंडावाद भी अपनी रोजी रोटी की जुगाड में सुनी सुनाई बातें कहता है.

    आपका भ्रम दूर करने का प्रयास सराहनीय है. आभार.

    रामराम.

  3. वाह …सही एक कटुसत्य …इन बिचोलियों यानी पंडावाद ने ही हमारे इतिहास की दुर्गति की थी,जो आज भी जारी है , मगर आपके दिये इस शुद्ध ज्ञान से कुछ पीढियां तो समझेंगी {सीखेंगी} ही , आभार ,

  4. सत्य जब तक विष पाटों में पिसता रहेगा, संस्कृति अपना जीवन्त रूप न पा पायेगी। इतिहास को धूलधूसरित करने का कुचक्र अंग्रेजों और अंग्रेजियत ने अबी तक फैला रखा है।

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