बेचारा बाप

रामलाल सरकारी विभाग में बाबू है अपने विभाग में ही नहीं जिस मुहल्ले में रहते है वहां भी लोग उनकी भलमनसाहित के कायल है, उनके सम्पर्क में रहने वाले किसी भी व्यक्ति से उनकी किसी भी बात पर आलोचना सुनने को आज तक नहीं मिली|

अपनी सरकारी नौकरी के वेतन से उन्होंने अपने दो बेटों व दो बेटियों को अच्छी शिक्षा देने में अपनी और से कोई कसर नहीं छोड़ी| बड़ा बेटा पढ़ लिखकर जहाँ भारतीय वायुसेना में भर्ती होने में कामयाब रहा वहीँ छोटा भी आजकल एक निजी इंजीनियरिंग कालेज में प्रोफ़ेसर बन गया| बड़े बेटे व बड़ी बेटी की शादी रामलाल ने अपने सीमित आर्थिक साधनों से कर दी| छोटी बेटी की शादी के समय बड़ा बेटा वायुसेना में भर्ती हो कमाने लगा तो उसके साथ से शादी में रामलाल को ज्यादा तकलीफ नहीं आई|
वर्षों सरकारी आवास में रहने के बाद अपने शहर में रामलाल ने एक छोटा सा अपने रहने लायक घर भी ले लिया था अत: उसे रिटायर्मेंट के बाद रहने की चिंता भी नहीं रही|

दोनों बेटियों की शादी हो गयी दोनों बेटों की अच्छी नौकरी लग गयी साथ ही दोनों बेटे एकदम लायक, माँ बाप की इज्जत तो करते ही पड़ौसियों में भी उनके व्यवहार की अक्सर अच्छी बातें चलती है| जिन्हें सून बाबू रामलाल की धर्म-पत्नी खुश होती है आखिर यह सब बच्चों को उसके द्वारा दिए गए संस्कारों का नतीजा जो है|

बाबू रामलाल के पास ही एक घर है जिसके मालिक तबादला होने के चलते दुसरे शहर में चले गये, उनके घर को किराये पर देना, किराया वसूलकर मालिक तक पहुँचाना व उस घर की देखभाल बाबू रामलाल ही एक अच्छे पड़ौसी होने के नाते करते थे| बाबू रामलाल के बड़े बेटे की इच्छा थी कि यह घर जब भी बिके तो वह ही उसे ख़रीदे ताकि माँ-बाप के पास रह सके| मकान मालिक की भी यही चाहत थी कि जब भी वे मकान बेचेंगे बाबू रामलाल के बेटे को ही बेचेंगे आखिर उनके मकान की देखभाल का जिम्मा भी तो बाबू रामलाल व उनकी धर्म-पत्नी मुफ्त में उठाते थे|

इस तरह कोई दस वर्ष बीत गये और आखिर एक दिन पड़ौसी मकान बिकने का समय आ गया| पड़ौसी ने बाबू रामलाल को कह दिया कि अब उसे अपना घर बेचना है आप बाजार भाव पता कर लीजिये और आपके बेटे के लिए बाजार भाव से पचास हजार रूपये कम दे दीजिये|

बाबू जी भी इस बात से खुश थे, पड़ौसी की भी दिली इच्छा थी कि वह घर बाबू रामलाल के बेटे को बेचे भले उसे कीमत मिलने में समय भी लगे, बेटे को कोई ऋण आदि भी लेने में समय लगे तो भी कोई बात नहीं| जब व्यवस्था हो जाये तब भी चलेगा|
बाबू रामलाल ने अपने बेटे से बात की, बेटा भी खुश था कि जिस घर को खरीदने का वर्षों से सपना संजोये बैठा था वह अब पूरा हो जायेगा, पर उसकी आधुनिक पत्नी ने वह घर किसी भी कीमत पर लेने से मना कर दिया कहने लगी- “मुझे आपके माँ-बाप के पास किसी घर में नहीं रहना|”

जब यह बात बाबू रामलाल और उनकी धर्म-पत्नी को पता चली तो वे बड़े निराश हुये हालाँकि ख़रीदे जाने वाले घर से उनको कोई सिर्फ यही एक मतलब था कि उनके बच्चे बुढापे में उनके नजदीक रहेंगे| आधुनिक बहू की जिद के आगे हथियार डालते हुए दोनों बाप-बेटे ने निराश होकर पड़ौसी को फोन पर कहा –“आप घर किसी और को बेच दीजिये|”

घर बिक गया, पड़ौसी को समझ नहीं आया कि- जिस घर को लेने बाप-बेटे वर्षों से सपना संजोये बेटे थे एकदम कैसे छोड़ दिया ?”
कुछ दिन जब पड़ौसी का बाबू रामलाल की पत्नी से मिला तब उसनें बड़े दुखी मन से घर न खरीद पाने का कारण बताते हुए पड़ौसी से प्रश्न किया-

“हमने तो शादी के बाद से ही बहू को बेटे के साथ भेज दिया, कभी सास-ससुर वाला रिश्ता भी ना रखा, हमारे लिए तो वह घर की तीसरी बेटी थी, उसे भविष्य में हमारे पडौस में रहने में क्या दिक्कत हो सकती थी ?

“बाबू जी की अपनी तनखा आती है फिर पैंशन आती रहेगी, हमें तो बेटों से कभी खर्च लेने की भी जरुरत नहीं पड़ेगी फिर बहू को किस बात की तकलीफ हो सकती थी ?

माँ-बाप बेटों को पालतें है, पढ़ाते है, उनकी शादी करते है क्या इसीलिए कि एक दिन बहू आयेगी और माँ-बाप का बेटे पर जो हक़ होता है वह छीन लेगी ?

ऐसे न जाने कितने ही प्रश्न उसने पड़ौसी से कर डाले| बेचारा पड़ौसी भी क्या जबाब देता ?आधुनिक बहुएं है कुछ भी कर सकती है|

बाबू रामलाल ने तो बेटे को अच्छे से पढ़ाकर नौकरी भी लगवा दिया था जो न पढ़ पाये उनके माँ-बाप को कोसते कई ऐसी कई आधुनिक बहुएं अक्सर नजर आ जाती है (जिनके माँ-बाप कम दहेज़ के लालच में किसी कम पढ़े लिखे या बेरोजगार से शादी कर देते है) कि- माँ-बाप ने खुद ही मजे किये औलाद को किसी लायक नहीं बनाया|

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