कुजड़बो शौक

दिन भर ढोवै सर पर काठड़ी,
मजदुर पिसा ल्यायो घाल आँटड़ी
घर आंवतो ही ठेके पर गियो
थांकेलो उतारण न छककर पियो
मजदूरी उठही पीण म सारी गवां दी
उधारी भी आती बेल्ल्यां लिखा दी
ढलती रात म आयो दारु की पीक में
नैना टाबर बैठ्या चुल्हौ तापै आटा री उडीक में
पेट कि भूख पर भारी पड़, कुजड़बो शौक
काल ओज्यूं ध्यानगी नै देगो दारु म झोंक

लेखक : गजेन्द्रसिंह शेखावत

2 Responses to "कुजड़बो शौक"

  1. Yogi Saraswat   January 21, 2016 at 8:53 am

    घर आंवतो ही ठेके पर गियो
    थांकेलो उतारण न छककर पियो
    मजदूरी उठही पीण म सारी गवां दी
    उधारी भी आती बेल्ल्यां लिखा दी
    बहुत सटीक !!

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  2. viram singh surawa   January 21, 2016 at 9:45 am

    हकीकत को बया करती सुन्दर राजस्थानी कविताराज विवेचना

    Reply

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