क्या कारगिल के शहीदों या वीरता के लिए पुरस्कृत लोगों से पुरस्कार राशि एवं जमीन भविष्य में छीनी जा सकती है ?

लेखक : कुँवरानी निशा कँवर नरुका
प्राचीन काल से एक कहावत है “वीर भोग्या वसुंधरा” अर्थात धरती पर वीरों का अधिकार है| जो वीर है जमीन उसी की है या यों कहिये की आदि काल से जमीन पर कब्ज़ा वीरता का ही रहा है|
क्यों रहा इसके पीछे मुख्यत: दो ही कारण है एक तो यह कि वीर से जमीन छिनने कि दूसरों में हिम्मत ही नहीं होती थी और दूसरा कारण था कि सैनिकों को वेतन नहीं मिलता था इसके लिए उन्हें जमीन दी जाती थी ताकि उनके परिवार का जीविकोपार्जन हो सके| कभी कभी वीरता के लिए पुरुष्कृत करते समय किसी किसी सैनिक को जागीर एवं जमींदारी भी दी जाती थी| आदिकाल से क्षत्रिय सैनिक का कर्तव्य निभाता आ रहा है| नियमित सेनाओं को उस समय वेतन नहीं दिया जाता था, सैनिकों को उनके पद एवं वीरता के अनुरूप जमीन आवंटित की जाती थी| अतः भूमि का अधिकांश हिस्सा उन सैनिकों (क्षत्रियों) के पास था| क्षत्रियों ने इस भूमि पर धोखे से या शोषण करके कब्ज़ा नहीं किया था, बल्कि अपनी बहादुरी के लिए या अवैतनिक सैनिक कर्म के लिए अपने खून के बदले प्राप्त किया था| ठीक उसी तरह जैसे आज कारगिल के शहीद परिवारों को सरकार की ओर से जमीन ,पुरस्कार राशि ,पेट्रोल पंप,गैस एजेंसी या अन्य स्थायी आय के साधन प्रदान किये गए है| अब जरा यह कल्पना कीजिये कोई सरकार यह आदेश दे कि शहीद परिवारों को आवंटित की गयी भूमि या अन्य आय के साधनों पर काम करने वाले मजदूरों को ही उस संपत्ति का मालिक मान लिया जाय तो कैसा महसूस होगा|
यह सही है कि कारगिल जैसे दो-चार युद्ध और हुए तो शहीदों और वीरता के लिए पुरस्कृत होने वालों कि संख्या में तेजी से बढ़ोतरी होगी| और वे सभी निसंदेह पुरस्कार के अधिकारी भी है| परन्तु क्या कुछ वर्षों बाद भारत सरकार ऐसा सोच कर कि अभी सभी या अधिकांश पेट्रोल पंप एवं गैस एजेंसियां ज्यादातर वीरगति को प्राप्त हुए या वीर सैनिकों के परिवारों में बाँट गयी है इसलिए अब सभी को बराबर करने के लिए इनके परिवारों से यह स्थायी आय कि संपत्तियां छीन ली जाये , तो कैसा महसूस होगा??? समझ सकने कि क्षमता यदि कोई सरकार या यह विवादित कांग्रेस और भाजपा रखती है तो समझे हम भूस्वामी “क्षत्रियो” के उस दर्द को बखूबी समझते है, क्योंकि इनके एक आदेश ने हमारी जमीने जिसे हम माँ कहते है भूमिहीनों में जबरन बँटवा दी थी|
हमारे पास एक निश्चित सीमा से ज्यादा संपत्ति थी, अतः उसे सम्पत्तिहिनों में या तथाकथित कांग्रेसी स्वतंत्रता सेनानियों में बंटवा दिया गया | सरकार या उस समय की कांग्रेस ने यह तर्क फिय कि “धरती और धन बाँट कर ही रहना चाहिए” हमें वीरता एवं हजारो वर्षों की सैनिक सेवा एवं लगभग हर पीढ़ी के वीरगति को प्राप्त होने के फलस्वरूप वह जमीन के टुकडे मिले थे जिसे हम श्रद्धा स्वरूप धरती माँ कहते थे| क्योंकि उस जमीन के अन्दर ऐसी कोई जगह शेष नहीं थी जहाँ मेरे किसी न किसी पूर्वज का खून न बहा हो| उसे केवल इसलिए हस्तगत कर लिया गया कि मेरे पास जमीन ज्यादा थी| मै आज चुनौती देती हूँ कि यदि इस सरकार या कांग्रेस में ताकत है तो “बिड़ला ,टाटा ,रिलायंस एवं अन्य औधोगिक घरानों की संपत्ति तुरंत हस्तगत करके दिखाए, क्योंकि मुझे तो खून बहाने के बदले जो जमीन मिली थी, उसे तुमने केवल इसलिए ले लिया कि मेरे पास जमीन ज्यादा थी| अब तुम्हारे सभी उधोग पति,फ़िल्मी कलाकार ,राजनेता,एवं बड़े बड़े शेयर दलालों के पास मेरी जमीन से कई गुना ज्यादा संपत्तियां है और इन्होने यह सारी संपत्ति खून बहाकर नहीं बल्कि लोगों का खून चूस कर या लोगों को बेवकूफ बनाकर जुटाई गयी है| इस सारी संपत्ति को अब क्यों नहीं गरीबी की रेखा के नीचे गुजर बसर कर रहे लोगों में बांटवा दिया जाये ? सैनिकों कि वीरता को पुरस्कृत करने का ढोंग तो करते हो ,पर क्या कभी हम पूर्व सैनिकों (क्षत्रियों) से छिनी गयी हमारी संपत्तियां,हमारा सम्मान,हमारी इज्जत ,हमारी उपाधियाँ ,हमारा जनमानस में आदर को पुनः हमें लौटने के बारे कभी भी ,किसी भी राजनैतिक दल ने क्यों नहीं सोचा ?
क्या केवल कारगिल के वीरो का सम्मान करना ही मात्र तुम्हारा फर्ज है ? बाद में इन वीरों के परिवारों में संपत्तियां ,पुरस्कार और जन मानस यदि उनका आदर करता हो तो इसे पुनः छीन लेने का इरादा है ? जनता क्षत्रियों का स्वाभाविक रूप से आदर करती है ,क्षत्रियों को आज के युग में भी पहली वरीयता देती है , ६५ वर्ष के दुष्प्रचार के बावजूद आज भी सबसे ज्यादा विश्वास हम क्षत्रियों पर ही करती है | जनता कारगिल के युद्ध में शहीद परिवारों का आज भी बहुत सम्मान करती है| इसलिए बिना किसी पहचान या प्रचार के शहीद परिवार से चुनाव में खड़े होने वाली प्रत्याशी श्रीमती सुधा यादव को महेंद्र गढ़ (हरियाणा) में राव वीरेन्द्र सिंह जैसे राजनेता के खिलाफ भी जनता ने जिताया था | लेकिन क्या आज के राजनैतिक दल कुछ वर्षों बाद शहीद परिवारों से चिढ कर एवं अपने सत्ता प्राप्ति के लक्ष्य को मरते देख इन शहीदों को ठीक उसी तरह “भारत एक खोज ‘ या अन्य इतिहासकारों से इतिहास के साथ तोड़-मरोड़ करके देश द्रोही सिद्ध करवाने कि कोशिश करेंगे ? जैसा कि कांग्रेस ने वीरता और शहादत के लिए प्रसिद्द ” क्षत्रिय जाति” के साथ किया है ? हमारी भूमि को हमसे अधिग्रहण करने का सरकार को कौनसा अधिकार था ? उसने किस अधिकार के साथ यह अन्याय हमारे साथ किया ? जो जमीने हमारे खून बहाने के लिए या यों कहिये रक्त के बदले मिली भूमि आखिर हमसे क्यों छीनली गयी ? यदि इसका कोई सार्थक उत्तर कांग्रेस या भाजपा समेत अन्य राजनैतिक दलों के पास है तो हमें इसका उत्तर दें! अन्यथा अपने उस भेदभाव पूर्ण कर्म के लिए जनता से सार्वजानिक रूपसे माफ़ी माँगे ! तथा उसे सार्वजनिक रूपसे बताये कि सच क्या है ? साथ में यह भी स्पष्ट करे कि राजपूतों को यह जमीने उस समय (प्राचीन काल), राजपूतों को सैनिक सेवा के फलस्वरूप वेतन एवं पुरस्कार स्वरूप तत्कालीन शासकों ने दी थी या यों कहे क्योंकि उस समय सेना को वेतन जनता द्वारा वसूले गए किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कर द्वारा नहीं दिया जाता था| राजपूतों से १९४७ एवं १९५२ के बीच हमने अन्याय पूर्ण तरीके से जमीने छीन ली है|

किन्तु फिर भी राजपूत इतने दानी एवं उदार जाति है कि उसने अब इसे वापिस लेने के बजाये आपके ही पास रहने देने के लिए आमसहमति से कहा है| हम सारे राष्ट्र और सरकार का फर्ज है कि जो जाति एक दिए की तरह जल कर समाज की रक्षा करती रही है, उसके उस ऋण को चुकाने की हममे क्षमता तो नहीं है, फिर भी उसे उसका सम्मान अवश्य दिया जाये ,जिसका वह स्वाभाविक अधिकारी है |
जब तक सरकार यह स्पष्ट नहीं करे ,तब तक क्षत्रियों को सरकार के साथ पूर्णतः असहयोग अपना लेना चाहिए ! हमने बहुत अपमान सहन किया है ,हमसे हमारी इज्जत ,आबरू ,या भूमि छीन ली गयी | तब भी यहं यदि अपने अपमान का बदला नहीं लेंगे तो कौन लेगा?? हमारी माँ का प्यार हम पर ज्यादा है या हमारी माँ बहुत अच्छी ,तो क्या इसे बाँट दिया जाये ?,यह बड़ा आश्चर्य है कि “हमने हमारे ऊपर इस प्रकार के अन्याय का प्रतिकार क्यों नहीं किया? आज जब हमारे इतिहास ,गौरव एवं हमें हमारे सम्मान से अलग कर दिया गया है ,तब हम किस मुंह से इन राजनैतिक दलों के साथ अपने को सामान्य मान लें ? हमारे ही कुछ भाई,हमारे इन शत्रु (लगभग सभी राजनैतिक दलों )में अपनी सोच को बेचकर उनके साथ ही हो लिये है और ऐसे राजनितिक दलों के आकाओं कि चापलूसी को ही अपना धर्म समझ कर उनकी हां में हां मिलाकर अपने को धन्य मान रहे है| इससे उन्हें व्यक्तिगत तौर पर खूब फायदा भी हुआ होगा किन्तु क्षत्रिय जाति को उसके खोये हुए गौरव की वापसी की कोई बात कोई भी राजनेता आज तक करने कि हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाया? सिर्फ इसलिए कि उसे राजपूतों के साथ अन्याय की बात करने से, उसके आका उसे राजनैतिकदल से निकाल फेंकेंगे ! देखिये जो इतना डरपोक प्रकृति का होगा,वह क्षत्रिय तो हो नहीं सकता ,उसे पिछले जन्म के किसी पुण्य स्वरूप क्षत्राणी की कोख से जन्म तो मिल गया है ,किन्तु वह क्षत्रिय कहलाने का हक़ नहीं रखता है!

संसद में एक मुसलमान, मुस्लमान के हित की बात करता है, मायावती सिर्फ अनुसूचित जाति की बात करती है, लेकिन एक राजपूत राजपूतों के साथ हुए अन्याय के प्रतिकार करने की क्षमता नहीं है| जबकि यह सच है कि चंद राजनैतिक आकाओं के अतिरिक्त आम मतदाता , तो इससे बिलकुल भी नाराज नहीं होगा ,क्योंकि वह जानता है कि वास्तव में राजपूतो के साथ शासकीय तौर पर अन्याय किया गया है | अरे यदि देखने के लिए आंखे है तो, देखो अधिकांश पूर्व राज-परिवारों को आज भी जनता अन्य लोगों के मुकाबले ज्यादातर जीता देती है |यह इस बात का पक्का सबूत है कि जनता के मन में राजपूतों के प्रति वास्तव में प्रेम और आदर आज भी है |
क्षत्रियो के साथ जो अन्याय हुआ है उसके बारे में न केवल आम जनता ही बेखबर है ,बल्कि हमारे ज्यादातर क्षत्रियों को भी इस बात का अंदाजा ही नहीं है, कि उसके साथ कितना बड़ा अन्याय सुनियोजित ढंग से किया गया है ! यह जरुरत है आज की ,सभी क्षत्रिय इस बात का आकलन कें कि उनके साथ कितना बड़ा अन्याय हुआ है ,और अभी भी जारी है ? जो अन्याय सहन करता है ,अन्याय उसी पर होता है |आज की आवश्यकता को समझें चारों ओर अन्याय ,भ्रष्टाचार,आतंकराज एवं स्वार्थी लोगों का बोलबाला है | जो ऐ क्षत्रिय तू अभी भी नहीं जागेगा, तो यह लोग तेरी तो पहचान मिटा ही चुके है ,तेरे बाद अब तेरे वतन की भी पहचान मिटा देंगे ! वक्त के तकाजे को समझो ! सुस्ताते ,सुस्ताते तुम सोवों मत ! और सोते सोते तुम मरों मत ! सवेरा तेरे जागने से होगा! यह काली अँधेरी रात्रि तेरे जागने से ही खत्म होगी ! अत्याचार सहना तो कायरता है ! कायरता तो एक क्षत्रिय के लिए बहुत ही शर्मनाक शब्द है ! अपने शत्रुओं के अत्याचार के आगे शीश मत नवाओं ! तुम्हारे ही शीश पर वह राजमुकुट रखा गया है ,जिसे कभी स्वयं श्री राम और श्री कृष्ण जैसे क्षत्रियों ने धारण किया था ! अपनी शक्ति को पहिचानो जो तुमने खोया है, उसे पाने के लिए कमर कस लो ! निराशा के गहरे गर्त में रहने से खुछ भी हासिल नहीं होगा ! श्री कृष्ण ने जो गीता तुम्हे सुनाई थी ,उसकी केवल द्वापर युग में अर्जुन को ही नहीं ,बल्कि हर युग , हर रोज ,हर क्षत्रिय को इसकी आवश्यकता है ,क्योंकि अब तुम्हारे स्वभाव में युधिष्ठर ,राम,भीम ,भीष्म,कृष्ण के बजाये अर्जुन कही ज्यादा घर कर गया है ! अतः तुम्हे फिर से उस महान गीता का रस पण करना ही होगा ! एवं सामने खड़े शत्रुओं पर टूट पड़ो ! स्वर्ग में तुम्हारे पूर्वज तुम्हारा स्वागत करने के लिए तैयार है ! युद्ध क्षेत्र में विजयश्री तुम्हारा वरण करने के लिए तैयार है ! और संसार में जनता तुम्हे अपना राजा बनाने के लिए अति उत्सुक है !

उपरोक्त विचार कुँवरानी निशा कँवर नरुका के है

8 Responses to "क्या कारगिल के शहीदों या वीरता के लिए पुरस्कृत लोगों से पुरस्कार राशि एवं जमीन भविष्य में छीनी जा सकती है ?"

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