चुनावी कुरुक्षेत्र में कौरवों द्वारा जातीय भावनाओं का दोहन

चुनावी कुरुक्षेत्र में कौरवों द्वारा जातीय भावनाओं का दोहन

देश के आजाद होते ही अन्य देशी रियासतों के साथ महाराज ताऊ धृतराष्ट्र के हस्तिनापुर राज्य का भी देश में विलय हो गया| उसके बाद महाराज ताऊ धृतराष्ट्र अपने महलों में समय व्यतीत करने लगे, वैसे भी इतने युगों तक राज रहने से उनके मन में राज करने की भूख भी ना रही थी| इस तरह महलों में आराम फरमाते महाराज ताऊ धृतराष्ट्र को काफी समय बीत गया| इसी दौरान महाराज के कुछ समाज बंधुओं ने पतन की और अग्रसर अपने समाज को बचाने हेतु एक संगठन का निर्माण कर लिया, वे जगह जगह शिविर लगा अपने समाज बंधुओं का चरित्र निर्माण करने लगे और इसी सद्कार्य के चलते समाज में उस संगठन की अच्छी पैठ बन गई|

कुछ वर्षों बाद महाराज ताऊ धृतराष्ट्र को भी लगा कि बहुत राज कर लिया, आजादी के बाद आराम भी बहुत कर लिया क्यों ना अब कुछ समाज सेवा की जाय| और महाराज ताऊ धृतराष्ट्र समाज सेवा जैसे पुनीत कार्य में उतर पड़े| महाराज ताऊ धृतराष्ट्र की सदासयता व भलापन देख समाज के प्रबुद्ध लोगों ने उस चरित्र निर्माण कार्य में सलंग्न संगठन का उनको मुखिया बना दिया|

महाराज ताऊ धृतराष्ट्र का मुखिया बनते ही समझो कौरवों की तो बिगड़ी बन गई क्योंकि अब तक संगठन में भी पांडव गुट का कब्ज़ा था सो वे कौरवों को अपनी मर्जी से कुछ करने भी नहीं देते थे, सो अब महाराज ताऊ धृतराष्ट्र के मुखिया बनते ही कौरव ग्रुप संगठन के नाम पर स्वार्थी सिद्धि के ख्वाब देखने लगा| पर महाराज ताऊ धृतराष्ट्र ने महाभारत काल के विपरीत कौरवों को इस बार सहानुभूति तो रखी पर पूरा स्पोर्ट नहीं दिया| क्योंकि उस संगठन के मुखिया बनने के बाद समाज में महाराज ताऊ धृतराष्ट्र की इज्जत काफी बढ़ गई थी, जहाँ भी वे जाते समाज बंधू उनके चरणों में लोटपोट हो जाते पर फिर भी पांडव गुट के आदमी महाराज को आशंका की दृष्टि से देखते और वो आदर सत्कार नहीं देते जो उनको अन्यों से मिलता था|

महाराज ने अपने कई सलाहकारों से इस संबंध में चर्चा की तो बात आई कि महाराज ताऊ धृतराष्ट्र को दीक्षा लेकर साधू बाबा का मुखौटा लगा लेना चाहिये फिर समाज बंधू तो क्या ? और लोग भी चरणों में लोटपोट होने को तैयार हो जायेंगे| और साथियों की यह बात महाराज ताऊ धृतराष्ट्र को जंच गई| और वे इसे कार्यरूप देने जल्द ही एक साधू के आश्रम में जा पहुंचे| वहां दीक्षा देने से पहले महाराज ताऊ धृतराष्ट्र को बाबा के चेलों ने झाड़ू पकड़ा दी और बोले – महाराज ताऊ धृतराष्ट्र ! होंगे आप महाराज अपने हस्तिनापुर के ! पर यहाँ तो कई साल झाड़ू निकालोगे तब कहीं जाकर दीक्षा मिलेगी| और कुछ दिन आश्रम का झाड़ू पोछा करने से परेशान महाराज ताऊ धृतराष्ट्र कैसे जैसे अपना पीछा छुड़ा अपने संगठन मुख्यालय भाग आये|

पर महाराज ताऊ धृतराष्ट्र की इस तरह महत्वाकांक्षा भांप मामा शकुनी कौरवों के पक्ष में माहौल बनाने में जुट गये, मामा शकुनी की सलाह से कौरव महाराज ताऊ धृतराष्ट्र के नेतृत्व राजनीति में टांग अड़ाने हेतु बने एक अलग संगठन पर कब्ज़ा जमाने में कामयाब रहे और उसकी एक जनसभा में पांडू पक्ष के कुछ नेताओं पर हमला कर उन्हें संगठन से खदेड़ दिया| चूँकि कौरव गुट महाराज ताऊ धृतराष्ट्र को समझाने में सफल रहे कि – आपका काम चरित्र निर्माण का है अत: आप उसमें लगे रहे और हम आपके द्वारा चरित्र निर्माण हुए समाज बंधुओं की जातीय भावना का दोहन इस नए फाउंडेशन के नाम से राजनीति करते रहेंगे| इससे हमारा भी काम चलता रहेगा और आप पर भी कोई आरोप नहीं लगेगा|

इस तरह कौरव महाभारत काल के विपरीत बिना द्रोपदी का चीर हरण किये व जुआ खेले उस हस्तिनापुर रूपी फाउंडेशन से पांडू पक्ष को निकाल काबिज हो गये| और चुनाव आते ही सक्रीय हो अपना उल्लू सीधा करते और फिर पांच साल ऐश|
इस तरह कौरव पांडू पक्ष की मेहनत से बने संगठन पर काबिज हो गए और पांडू पक्ष बेचारा खाली हाथ| पर पांडू पक्ष के साथ भी तो कृष्ण सरीखे बुद्धिजीवी थे सो उन्होंने अपने से हजार गुना संख्या में ज्यादा कौरवों का मुकाबला करने के लिए संसाधन तलाशने शुरू कर दिए कि अचानक उन्हें जुकरबर्ग नामक एक व्यक्ति का बनाया फेसबुक रूपी गांडीव मिल गया और फिर क्या था, संख्या में कुछ थोड़े बचे पांडू गुट ने कौरव सेना पर तीरों की बौछार करदी| सामने जो चुनाव आये उनमें पांडू पक्ष ने जुकरबर्ग का जयकारा लगाते हुये उस फेसबुक रूपी गांडीव से ऐसा हमला किया कि कौरव बौखला गये उनसे जबाब देते भी ना बना|

चुनाव रूपी कुरुक्षेत्र ख़त्म हुआ और पांडू पक्ष के यौधाओं ने भी गांडीव तीर हमले कम कर दिये फिर भी इस फेसबुक रूपी गांडीव के हमलों से घायल कौरव सेना के महारथी अभी भी फेसबुक दुनियां में बौखलाये घूमते देखे जा रहे है| नित्यप्रति एक कौरव बदले की भावना से टक्कर देने का प्रण लेकर आता है पर अर्जुन के गांडीव से छूटे तीरों की मार के आगे भाग खड़ा होता है|

अब सुना है नयी तकनीक से पैदल कौरवों के दल ने भी फेसबुक रूपी गांडीव प्रयोग कर पांडू पक्ष को जबाब देने के लिए एक युवा दल का गठन किया है पर गांडीव के सटीक प्रयोग के लिए अर्जुन चाहिये और वो कौरवों को मिल नहीं रहे| बेचारे महाराज ताऊ धृतराष्ट्र एक बार फिर कौरवों की महत्वाकांक्षा के चलते फंस गये|

चित्र : www.taau.in से साभार

9 Responses to "चुनावी कुरुक्षेत्र में कौरवों द्वारा जातीय भावनाओं का दोहन"

  1. HARSHVARDHAN   January 30, 2014 at 5:16 pm

    आपकी इस प्रस्तुति को आज की राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 66 वीं पुण्यतिथि और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर …. आभार।।

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  2. कालीपद प्रसाद   January 31, 2014 at 1:26 am

    वाह !बहुत दिनों के बाद फिर महाराज ध्रितराष्ट्र का दर्शन हुआ परन्तु वह फिर कुचक्र में फंसते नज़र आरहे हैं ,सावधान!
    सियासत “आप” की !
    नई पोस्ट मौसम (शीत काल )

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  3. gajendra singh   January 31, 2014 at 5:37 am

    समाज के ठेकेदारो को ठेगा दिखती हुई रचना साधुवाद आपका इस लेख के लिए

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  4. प्रवीण पाण्डेय   January 31, 2014 at 5:54 am

    क्या करें, कौरव चाहते तो हैं कि गाण्डीव को निष्प्रभ करें।

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  5. [email protected]   January 31, 2014 at 7:20 am

    bahut khubh

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  6. Pradeep Kashyap   February 1, 2014 at 1:01 pm

    dirshti to he hi nahi unke pas aur phir pandu jaisa bhai bhi nahi jo unke anusar chalkar dhirtrashtra ki jhanki jama sake

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  7. BHANWARSARATHORE JOSHSHRI   May 18, 2015 at 4:40 am

    कोरवो का कुछ भी बचा नहीं है फिर भी आज भी वे उतना का उतना पाखंड करने से नहीं चुकते है l

    Reply
  8. BHANWARSARATHORE JOSHSHRI   May 18, 2015 at 4:40 am

    कोरवो का कुछ भी बचा नहीं है फिर भी आज भी वे उतना का उतना पाखंड करने से नहीं चुकते है l

    Reply
  9. विनोद सिल्ला   January 8, 2016 at 4:07 am

    क्या कसूर था कौरवों का जो उन्हें कोसा जा रहा।
    दुर्योधन राजा का बेटा था
    धृतराष्ट्र का उत्तराधिकारी
    उसका बेटा ही होना चाहिए था
    न कि भतीजा

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