भारत के प्रमाणिक इतिहास-लेखन में अवरोधक तत्व

भारत के प्रमाणिक इतिहास-लेखन में अवरोधक तत्व

अधिकतर भारतीय इतिहासकारों को हम दो वर्गों में रख सकते है| पहले वर्ग में वे इतिहासकार है जो भारतीय इतिहास की विरासत को आवश्यकता से अधिक महत्त्व देते है| दूसरे वर्ग में हम उन इतिहासकारों की गणना कर सकते है, जो भारतीय इतिहास का उपहास करते है और जानबुझकर उसका महत्त्व कम करने की चेष्टा करते है| उपर्युक्त दोनों वर्गों के इतिहासकार भारत का प्रमाणिक इतिहास लिखने में असमर्थ है| परन्तु आजकल इन्हीं दोनों वर्गों के लेखकों के लिखे इतिहास ग्रंथों की भरमार है| ये इतिहासकार तथ्यों को तोड़ मरोड़कर ऐसा निष्कर्ष निकालते है जो पूर्णतया असत्य होता है|

पाश्चात्य इतिहासकारों का उद्देश्य था कि यूरोपीय संस्कृति को श्रेष्ठ सिद्ध करे और भारतीय संस्कृति को अत्यंत निम्न कोटि की प्रदर्शित करे| उन्होंने उपयोगितावाद को कसौटी मानकर ब्रिटिश शासन को बहुत श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयत्न किया| इन लेखकों के अनुसार ब्रिटिश शासन के कारण ही भारत में एकता, आधुनिकता और सुव्यवस्था स्थापित हुई| उनके अनुसार अंग्रेजों ने पतनोन्मुख भारतीय संस्कृति के स्थान पर सर्वश्रेष्ठ यूरोपीय संस्कृति की स्थापना की| हम यह मानते है कि अठारहवीं शती में भारतीय संस्कृति में परिपक्वता, सहिष्णुता और जीवन शक्ति विद्यमान थी| जेम्स गिल ने अपने इतिहास ग्रन्थ “ब्रिटिश इंडिया” में भारत का वर्णन यह मानकर ही किया कि अंग्रेजों की सभ्यता भारतीय सभ्यता से बहुत उतम थी| उसने यह स्वीकार नहीं किया कि भारतीय संस्कृति बहुत विकसित और परिपक्व संस्कृति थी| मेकाले ने भी भारतीय साहित्य और संस्कृति को बहुत निम्नकोटि का समझा और लिखा| सोनी ने तो भारतीय राज्यों को डाकू राज्यों की संज्ञा दी थी| इस प्रकार पहला अवरोधक तत्व यूरोपीय इतिहासकारों की वे मान्यताएं है जिनका कोई आधार नहीं है किन्तु भारतीय इतिहासकार उनको ब्रह्मवाक्य समझकर अब भी उनका परित्याग करने के लिए तैयार नहीं है|
यूरोपीय इतिहासकारों के वर्णनों की प्रतिक्रिया के रूप में कुछ भारतीय राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि प्राचीन भारत में आदर्श लोकतंत्र व्यवस्था विद्यमान थी| उन्होंने उन तत्वों के ऊपर ध्यान नहीं दिया, जिनके कारन परवर्ती काल में भारत परतंत्र हुआ उअर भारतीय संस्कृति पतनोंमुख रही|

मध्यकालीन भारत के इतिहासकारों को इतिहास के स्वरूप का तो अच्छा ज्ञान था किन्तु उनकी दृष्टि शासकों, राजदरबारों और अभिजात वर्ग के वर्णन तक सीमित रही| उन्होंने मुसलमान शासकों की बहुत प्रशंसा की और उनकी हिन्दू प्रजा की अधिकतर निंदा की| क्योंकि वे इस्लाम की श्रेष्ठता से अत्यधिक प्रभावित थे| उन्होंने केवल फ़ारसी में उपलब्ध साहित्य का उपयोग किया और अन्य भारतीय भाषाओँ में उपलब्ध साक्ष्यों का उपयोग नहीं किया| उनके इतिहास ग्रन्थों में हमें जनसाधारण के जीवन के दर्शन नहीं होते|

मार्क्स के अनुसार भारत में ब्रिटिश शासन के दो उदेश्य थे| पहला परम्परागत भारतीय समाज का विनाश और दूसरा भारत की भौतिक उन्नति की नींव डालना| मार्क्सवादी इतिहासकार अब भी प्राचीन भारतीय संस्कृति की निंदा करते है और मार्क्स के समान भारत में साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासन की निंदा करते है| मार्क्सवादी इतिहासकारों की मान्यता है कि पूरा इतिहास प्रभुत्व शक्ति रखने वाले और शासित वर्ग के संघर्ष का इतिहास है| उनकी यह मान्यता ठीक नहीं| उनकी विचारधारा में सांस्कृतिक परम्पराओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को यथेष्ट स्थान नहीं दिया जाता| उनमें से अधिकतर मनोनीत परिणाम पर पहुँचने के लिए चुने हुए आर्थिक साक्ष्य की व्याख्या करते है और अन्य साक्ष्यों की अनदेखी करते है| इसलिए हम उनके इतिहास ग्रन्थों को प्रमाणिक नहीं मान सकते| प्रमाणिक इतिहास लेखन के लिए सैद्धान्तिक और बौद्धिक स्वतंत्रता का होना नितांत आवश्यक है| मार्क्सवादी विचारधारा ने इतिहास के स्वतंत्र विकास की धारा में रोड़ा अटका दिया है|

प्राचीन भारत के इतिहास में परम्परागत विरासत का भी बहुत महत्त्व है| कुछ इतिहासकार इस विरासत का पूर्णतया परित्याग करते है| प्रो. डी.के.गांगुली पुराणों के स्वाध्याय के पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि पुराणों में जिन राजाओं का वर्णन मिलता है उनको हम तीन भागों में बाँट सकते है| पहले वर्ग में वे राजवंश है जिन्होंने महाभारत के युद्ध के प्रारंभ होने तक राज्य किया| दूसरे वर्ग में वे राजवंश है जिन्होंने महाभारत युद्ध से मौर्यवंश की स्थापना तक राज्य किया और तीसरे वर्ग में वे राजवंश आते है जिन्होंने मौर्यवंश की स्थापना से चौथी शती ईस्वी तक राज्य किया| पुराणों के वर्णन में प्रमुख रूप से तीन दोष है| उनके वर्णन भिन्न भिन्न है| ऐसी परम्पराओं का उल्लेख है जिनकी अन्य साक्ष्यों से पुष्टि नहीं होती| राजाओं का क्रम भी ठीक नहीं है| इन दोषों के होते हुए भी उनमें सुरक्षित परम्पराओं का सर्वथा परित्याग अभीष्ट नहीं है| उनका तुलनात्मक अध्ययन करके और पुरातात्विक साक्ष्य से मिलान करने पर महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी मिल सकती है| (१- देखिये : डी.के.गांगुली, हिस्ट्री एंड हिस्टोरियंस ऑफ़ एन्शियंट इण्डिया”)

कुछ विद्वान पुरातात्विक साक्ष्य को ही विश्वसनीय मानते है जैसे कि प्रो. ब्रजवासी लाल ने अपने खनन के आधार पर यह सिद्ध करने की कोशिश की कि रामायण में जिन घटनाओं का उल्लेख है वे महाभारत में वर्णित घटनाओं के बाद की है| जिस स्तर पर आजकल रामायणकालीन अवशेष मिलते है यह संभव है कि महाभारत से पूर्व हों, किन्तु धरती के हिलने-डुलने से यह संभावना हो सकती है कि यह स्तर ऊपर आ गया हो| काल गणना के लिए केवल कार्बन 14 की वैज्ञानिक विधि को ही विश्वसनीय मानना ठीक नहीं है| हमें साहित्यिक साक्ष्यों से जो तिथि संभव प्रतीत होती है उसका सर्वथा त्याग करना उचित नहीं|

लेखक : डा.ओमप्रकाश
इतिहास परिषद संगोष्ठी 1989 में.

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