वोट की राजनीति असमंजस में राजस्थान के राजपूत

वोट की राजनीति असमंजस में राजस्थान के राजपूत

पार्टी में अपनी उपेक्षा, तिरस्कार आदि से नाराज राजस्थान का राजपूत क्या आने वाले चुनावों में भाजपा की खिलाफत करेगा? क्या भाजपा को हराने के लिए उस कांग्रेस को वोट देगा, जिसे आजतक अपनी विरोधी पार्टी मानते हुए घ्रृणा करता आया है। ये बहुत बड़े सवाल है। भाजपा विरोधी राजपूत सामाजिक नेता राजस्थान उपचुनावों में राजपूतों द्वारा भाजपा का खुला विरोध कर हराने के बाद प्रफुल्लित है। वहीं भाजपा नेतृत्व व भाजपा के राजपूत विधायक, मंत्री किसी भी हालत में समाज को पार्टी से दूर नहीं जाने देने के प्रयास में है। खुद मुख्यमंत्री वसुंधराराजे राजपूत समाज की नाराजगी दूर करने को प्रयासरत है। आपको बता दें सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार राजे को आज भी राजपूत समाज पर भरोसा है कि राजपूत भाजपा छोड़कर नहीं जा सकते। राजे से मिलकर इस सम्बन्ध में चर्चा कर आये लोगों के अनुसार मुख्यमंत्री राजे आज भी मानती है कि आम राजपूत उसके साथ है, विरोध करने वाले नेताओं के बारे में उसने मिलने गए लोगों को बताया कि- ये लोग तो शुरू से ही उसके विरोधी रहे हैं। इनके विरोध को पूरे राजपूत समाज के विरोध के तौर पर नहीं समझा जा सकता।

मुख्यमंत्री के इस विश्वास में दम भी है, दरअसल भाजपा का विरोध करने वाला राजपूत तबका मुखर है जबकि समर्थन करने वाले चुप हैं। अतः विरोध करने वालों की संख्या का सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता। आज भी सोशियल मीडिया में भाजपा के खिलाफ खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के किसी निर्णय के खिलाफ लिख दो, बहस करने के लिए सबसे पहले राजपूत युवा ही मोदी के पक्ष में आते है। मैंने स्वयं कई बार फेसबुक पर प्रयोग के तौर पर मोदी सरकार की आलोचना की तो मेरे से बहस करने, मेरी बोलती बंद करने के लिए कोई और नहीं, राजपूत ही आये और कई राजपूत युवा तो भाजपा के पक्ष में इतने आक्रामक रहते है, जिन्हें देखकर लगता है कि किसी असंतुष्ट भाजपाई राजपूत की बोलती बंद करने का इन्हें ठेका मिला हुआ है।

कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि अभी भी राजपूत असमंजस की स्थिति में है कि राज्य सरकार से अपनी उपेक्षा और तिरस्कार के कारण पार्टी की खिलाफत कर उसे सबक सिखाया जाय, पर दूसरी ही तरफ वह सोचता है कि वर्षों तक पाली-पोषी पार्टी को आज थोड़े सी उपेक्षा के चलते यूँ ही दूसरों के हाथों छोड़कर कैसे चलते बने। आज राजस्थान के आम राजपूत के मन में एक तरफ स्वाभिमान का सवाल है, तो दूसरी तरफ अपनी ही पार्टी में उपेक्षा से उपजा गुस्सा है। एक तरफ पार्टी को सबक सिखाना चाहता है तो दूसरी तरफ भाजपा के सामने एक मात्र विकल्प कांग्रेस को वोट देते समय उसके हाथ कांपते है। आपको बता दें सत्ता हस्तांतरण यानी आजादी के बाद जागीरदारी उन्मूलन कानून की आड़ में आम राजपूत की कृषि भूमि छीन कर दूसरों को देने, उसके खिलाफ शोषण करने का दुष्प्रचार करने आदि को लेकर राजस्थान के राजपूत कांग्रेस से घृणा करते है, ऐसे में मात्र अपनी पार्टी को सबक सिखाने के लिए वोट देकर विरोधी को वह मजबूत कैसे कर सकता है।

यही नहीं आज राजस्थान के राजपूत के मन में जहाँ राजस्थान सरकार के प्रति असंतोष व नाराजगी है, वहीं वह राष्ट्रहित में मोदी को प्रधानमंत्री देखना चाहता है। भारतीय जनता पार्टी का केंदीय नेतृत्व भी अब राजपूतों की नाराजगी को लेकर चिंतित है। यही कारण था कि दिल्ली में फरवरी में देशभर के क्षत्रिय संगठनों द्वारा क्षत्रिय संसद के रूप में एक केन्द्रीय नेतृत्व मण्डल बनाने की खबर के बाद गृहमंत्री राजनाथसिंह सक्रीय हो गये और पद्मावत फिल्म से नाराज समाज को मनाने के लिए फिल्म निर्माता भंसाली को दिल्ली बुला लिया गया, जो मीडिया के सामने राजपूत नेताओं के पैर पकड़कर माफी मांगने के लिए तैयार था। चूँकि उस वक्त फिल्म प्रदर्शित हुए एक माह बीत चुका था, अतः समाज नेताओं ने भंसाली को माफ करने का कोई औचित्य नहीं समझा। अब देखना यह है कि अपनी उपेक्षा व तिरस्कार से नाराज व विकल्पहीनता के ऐसे असमंजस में आने वाले चुनावों के दौरान राजस्थान के आम राजपूत का भारतीय जनता पार्टी के प्रति क्या रुख रहेगा?

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