बिश्नोई समाज के प्रवर्तक संत जाम्भोजी पंवार

बिश्नोई समाज के प्रवर्तक संत जाम्भोजी पंवार

Bishnoi community promoter saint Jambhoji Panwar history in Hindi
राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि में सिर्फ वीर ही नहीं, कई ऐसे संतों ने भी जन्म लिया जिन्होंने भक्ति, ईश्वर साधना, आत्मबोध के साथ ही तत्कालीन समाज में फैली बुराइयों को जड़ से समाप्त करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किये|  इन संतों को उनके सुकृत्यों के कारण यहाँ की जनता ने भरपूर आदर दिया व इनकी लोक देवता के रूप में पूजा-अर्चना शुरू की|  इन विविध लोक-देवों की उपासना वैसे तो अंध-विश्वास पर आधारित रही है व बुद्धिजीवियों की इन पर कोई श्रद्धा नहीं रही, फिर भी आम जनमानस में इनके प्रति दृढ़ निष्ठा ने सहस्रों साधारण स्तर के नर-नारियों को सद्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया है।

इनके जीवन-वृत्त पर मनन करने से ऐसा वर्ग इस नतीजे पर पहुँचा है कि जगत् का नियन्ता कोई ऊपरी शक्ति है और चमत्कार से धार्मिक जीवन का घना सम्बन्ध है। इस प्रकार के विश्वास से प्रेरित होकर इन लोक-देवों के अनुयायी बिना किसी छुआछुत, ऊँच-नीच, भेदभाव के एक स्थान पर एकत्रित होते हैं और जातीय व धार्मिक एकसूत्रता का अनुभव कर साम्प्रदायिक सौहार्द व समानता की मिशाल कायम करते हैं। सबसे बड़ा महत्त्व इस प्रकार के स्थानीय लोक देवों में विश्वास का यह है कि अधिकांश जनता ने बिना धर्म सम्बन्धी दर्शन के शास्त्रार्थ में पड़े एकता ध्यान और नैतिक जीवन के तत्त्वों को समझने में सफलता प्राप्त की। इनके अनुयायियों में आज भी अच्छे सिद्ध-पुरुष दिखायी देते हैं जो एक तरह से निरक्षर हैं परन्तु जिनका आत्मबोध स्तुत्य है और जिनका ईश्वर के प्रति प्रेम प्रगाढ है।

राजस्थान के शासक वर्ग क्षत्रिय जाति में रावल मल्लीनाथ, बाबा रामदेव तंवर (Baba Ramdev sa peer), गोगा जी चौहान (Gogaji Chauhan), तेजाजी (Veer Tejoji), हडबू जी सांखला (hadbuji sankhla), पाबूजी राठौड़ (Pabuji Rathore) आदि लोक देवताओं की एक लम्बी श्रंखला रही है, जिन्होंने अपने शासकीय धर्म के निवर्हन के साथ लोक-कल्याणकारी कार्यों में आत्मोसर्ग कर, सादा तथा सदाचारी जीवन जी कर, तत्कालीन समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के उपाय बताकर, आम जन को बिना ऊँच-नीच अपने सीने से लगाकर देवत्व को प्राप्त किया. क्षत्रिय संतों की इसी श्रंखला में बिश्नोई समाज के प्रवर्तक जाम्भोजी का नाम बड़े सम्मान के साथ प्रसिद्ध है. उनके सम्बन्ध में बतायी गयी वाणी में परमतत्त्व की विवेचना मिलती है जो अनुभव-प्रधान हो सकती है। संसार के मिथ्या होने पर भी उन्होंने समन्वय की प्रवृत्ति को प्रधानता दी। दान, तीर्थ आदि के सम्बन्ध में उन्होंने उपेक्षा करते हुए ‘शील-स्नान” को उत्तम बताया। पाखण्ड को अधर्म और पवित्र जीवन को धार्मिक बताया । विष्णु की भक्ति में अर्चन करने पर बल देते हुए कुरीतियों से बचने के उपाय भी उन्होंने सुझाये। समाज-सुधारक की भाँति जाम्भोजी ने विधवा विवाह पर बल दिया। मुसलमानों के अनुरूप मुर्दो को गाढ़ना उन्होंने ठीक बताया।

उनके ये सभी अनुभव 29 शिक्षा के नाम से जाने जाते हैं और इनका पालन करने वाले “विष्णोई’ ( बिश्नोई ) नाम से सम्बोधित किये जाते हैं। इन मतावलम्बियों का अपने जीवन और विचारों का एक तरीका है जिससे वे स्वतः एक समाज बनाते हैं। इनको एक सूत्र में गठित करने का श्रेय जाम्भोजी (Jambhoji) को है। आज भी बिश्नोई समाज, जिसमें अधिकांश में जाट हैं, अपने ढंग से स्वतन्त्र विचारों का है और उसकी अपनी इकाई है।

  • जीवन परिचय :

जाम्भोजी का जन्म 1451 ई. में जोधपुर राज्य के अन्तर्गत नागौर परगने के पीपासर गाँव में हुआ था। जाति के वे पंवार राजपूत थे। इनके पिता का नाम लोहटजी था और उनकी माता हाँसा भाटी राजपूत कुल की थीं। अपने माता-पिता के इकलौते पुत्र जाम्भोजी बचपन से ही यह मननशील थे जिससे वे कम बोलते थे। साधारणतः इस स्थिति को देखकर लोग इन्हें गूंगा थे। परन्तु कभी-कभी वे ऐसी बात कर बैठते थे कि लोग आश्चर्यान्वित हो जाते थे। संभवतः अचंभित करतूतों से लोग इन्हें जाम्भोजी कहने लगे हों। बताया जाता है कि 7 वर्ष की उम्र से ही जाम्भोजी ने गायें चराना आरम्भ कर दिया था जो लगभग अपनी 16 वर्ष की आयु तक करते रहे। इसी अवस्था में इन्हें सद्गुरु का साक्षात्कार हुआ।

जब इनके माता-पिता मृत्यु हो गयी तो वे घर छोड़कर चल दिये और सत्संग में तथा हरिचर्चा में अपना समय बताने लगे “वे केवल मननशील ही नहीं वरन् उस युग की साम्प्रदायिक संकीर्णता, कुप्रथाओं एवं कुरीतियों के प्रति जागरूक भी थे। वे चाहते थे कि अन्ध-विश्वास और नैतिक पतन के वातावरण से सामाजिक दशा को सुधारा जाय और आत्मबोध के द्वारा कल्याण के मार्ग को अपनाया जाय। उनकी शिक्षा-दीक्षा का व्यवस्थित न होना स्वाभाविक था, परन्तु गायें चराने के अवसर ने उन्हें एकान्तवास और मनन का समय दिया।

जाम्भोजी की जीवन लीला तालवा गाँव में 1526 ई. में समाप्त हुई जिसके स्मरण में बिश्नोई भक्त फाल्गुन मास की त्रयोदशी को वहाँ एकत्रित होते हैं और मृत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। जाम्भोजी द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त सबदवाणी और उनका नैतिक जीवन मध्ययुगीन धर्म सुधारक प्रवृत्ति के बलवान अंग हैं।

  • सन्दर्भ पुस्तक: राजस्थान का इतिहास, लेखक- डा.गोपीनाथ शर्मा

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One Response to "बिश्नोई समाज के प्रवर्तक संत जाम्भोजी पंवार"

  1. Anurag Choudhary   March 24, 2016 at 4:53 am

    विश्नोई समाज के प्रवर्तक जाम्भोजी के जीवन पर सार्थक लेख के लिए धन्यवाद।

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