भूतों के भानगढ़ में सच का सामना

भूतों के भानगढ़ में सच का सामना

लगभग एक वर्ष से हिंदी ब्लॉग जगत के चर्चित ब्लॉगर ललित शर्मा के साथ राजस्थान में अलवर जयपुर के पास प्रसिद्ध भानगढ़ Bhangarh के भुतहा किले Ghost Fort की यात्रा पर चलने के कार्यक्रम पर चर्चा होती रही| ललित जी के साथ मैं भी इस चर्चित किले में जाने के लिए वर्षों से उत्सुक था आखिर इतने चर्चित किले में जाने की अभिलाषा कोई कैसे छोड़ सकता है| आखिर ११ दिसंबर को ललित जी के साथ भानगढ़ जाने का मौका मिल ही गया| ललित जी एक शादी समारोह में भाग लेने सीकर आये हुए थे, सो हमने ११ दिसंबर को आपस में जयपुर से एक साथ होकर भानगढ़ जाने का कार्यक्रम बनाया| जयपुर से भानगढ़ जाने की बस सुविधा व रास्ते के बारे में जानकारी लेने के लिए मैंने अपने जयपुर के एक पत्रकार मित्र प्रदीप शेखावत को फोन किया तो इनका जबाब था- “कहाँ बसों में धक्के खायेंगे, सुबह जयपुर पहुँचकर मुझे फोन कर देना मैं आपको अपनी कार से भानगढ़ किले की यात्रा करवा दूँगा साथ ही आपकी कुलदेवी जमवाय माता के दर्शन भी करवा दूँगा|”

अत: योजनानुसार मैं व ललित जी ११ दिसम्बर को सुबह जयपुर पहुंचे वहां दैनिक कार्यों से निवृत होकर प्रदीप जी के साथ भानगढ़ की यात्रा पर रवाना हुए, जयपुर से मेरे छोटे भाई का पुत्र भरत जो आजकल छुट्टियाँ बिताने इटली Italy से जयपुर आया हुआ है किला देखने की उत्सुकता लिए हमारे साथ हो लिया|

जयपुर से हम प्रदीप जी के साथ पहले जमवा रामगढ Jamva Ramgarh पहुंचे वहां रामगढ का बाँध देखा जिसका निर्माण जयपुर आमेर के राजाओं ने जयपुर व आस-पास के गांवों के लोगों की प्यास बुझाने के लिए कराया था पर अफ़सोस कभी आस-पास के ग्रामीणों व जयपुर शहर की प्यास बुझाने वाला बांध सुखा पड़ा था| राजनैतिक प्रभाव वाले लोगों व भूमाफिया के अवैध कब्जों की वजह से आज यह बाँध पानी को तरसता खुद प्यासा बैठा है|

बाँध की दशा देखकर हम जमवाय माता Jamvay Mata Godess of Kacchvah Rajput of Amer के मंदिर पहुंचे| यह मंदिर कच्छवाह राजा सोढ्देव ने राजस्थान में अपना राज्य स्थापित करने के साथ ही बनवाकर यहाँ अपनी ईष्ट देवी जमवाय माता की मूर्ति की स्थापना की थी| राजा सोढ्देव का वंशज होने के नाते देवी जमवाय माता मेरी भी कुलदेवी Kuldevi है जिनके दर्शन का सौभाग्य मुझे आज जीवन में पहली बार मिला था, अपनी कुलदेवी के दर्शन और उसके दरबार में मत्था टेकने का सौभाग्य प्राप्त कर मैं अभिभूत हूँ अपनी कुलदेवी के दर्शनों की अभिलाषा व उत्सुकता मेरे मन में वर्षों से थी| इस अभिलाषा को पूरी करने के लिए ललित जी व प्रदीप जी का तहे दिल से आभारी हूँ आखिर उन्हीं दोनों के कार्यक्रम के चलते मुझे ये सौभाग्य प्राप्त हुआ|

अपनी कुलदेवी के दर्शन के बाद हमने भानगढ़ किले के मुख्य द्वार “हनुमान द्वार” के बाहर गाड़ी पार्क कर पैदल प्रवेश किया| द्वार पर ही एक छोटा सा हनुमान मंदिर बना था जहाँ आप-पास के कुछ ग्रामीणों का जम-घट लगा था| सामने ही उजड़ चुके पर कभी वैभवशाली रहे इस भानगढ़ नगर का मानचित्र लगा था| जिसकी तस्वीर को हम अपने अपने कैमरों में कैद कर मुख्य रास्ते पर आगे बढे, रास्ते के दोनों ओर के भग्नावशेष देखकर आसानी से समझा जा सकता कि कभी यहाँ एक बहुत बड़ा और समृद्ध बाजार था| तीन तीन और चार चार कक्षों में बनी दुकानों के भग्नावशेष आज भी वहां मौजूद है कई दुकानों में सीढियाँ भी बनी हुई है जिन्हें देखकर साफ जाहिर होता है कि यहाँ दो मंजिली दुकानों की भी भरमार थी|

बाजार में दुकानों के पीछे खण्डहर में तब्दील हुई हवेलियां भी नजर आती है| इन हवेलियों का वास्तु डिजाईन देखकर साफ जाहिर होता है कि उनके मालिक आर्थिक दृष्टि से संपन्न थे| जौहरी बाजार के साथ ही मोडा सेठ Moda Seth की हवेली के भग्नावशेष दीखते है तो आगे चलने पर एक और हवेली का खंडहर दिखता है जिस पर पुरातत्व विभाग ने “नर्तकियों की हवेली” का बोर्ड लगा रखा है| बाजार में ही मंदिर के भग्नावशेष भी है जिसे चामुंडा माता के मंदिर से पहचाना जाता है| बाजार में ही पुरातात्विक विभाग का एक कर्मचारी अपनी देखरेख में कुछ मजदूरों से उत्खनन का कार्य करवा रहा था| खुदाई में मिले कुछ अवशेषों के बारे में हमने उससे जानकारी ली| खुदाई से सम्बंधित ललित जी के प्रश्नों का उत्तर देते हुए विभाग के कर्मचारी के पसीने छूटने रहे थे| वह भी ललित जी का पुरातत्व के मामलों में ज्ञान देखकर चकित था|
बाजार के खत्म होते ही आगे त्रिपोलिया दरवाजा Tripolia Gate नजर आता है यह दरवाजा राजमहल को नगर से अलग करता है| इस दरवाजे को हम राजमहल का मुख्य दरवाजा भी कह सकते है|

त्रिपोलिया दरवाजे में घुसते ही दायें और एक बहुत शानदार व बड़ा मंदिर स्थापित है जिसे गोपीनाथ जी Gopinath ji का मंदिर के नाम से जाना जाता है हालाँकि मंदिर में अब गोपीनाथ जी मूर्ति नहीं है| मंदिर के दक्षिण भाग में एक कुआँ व पुरोहित के रहने के लिए एक हवेली व एक छोटा कक्ष बना है| मंदिर स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है| दरवाजों व छत पर लगी विभिन्न देवताओं व गंधर्वों की मूर्तियों की स्थापना व उनके उद्देश्य के बारे में ललित जी ने हमें विस्तार से जानकारी दी| ललित जी को पुरातात्विक जानकारी के साथ मंदिरों की स्थापत्य कला का इतना गहरा ज्ञान है आज ही पता चला| हमें भानगढ़ की जानकारी देने के लिए साथ चल रहा पुरातात्विक विभाग का कर्मचारी अपनी जानकारी छोड़ ललित जी से जानकारी जुटाने में मशगुल हो गया वह बड़ा प्रसन्न था कि अब वह भी ललित जी से ली गई जानकारी के आधार पर पर्यटकों के आगे खूब ज्ञान झाड़ेगा|

गोपीनाथ जी के मंदिर के आगे ही एक और मंदिरनुमा ईमारत के खंडहर मौजूद है बीच में एक छतरीनुमा मंडप बना है किसी को नहीं पता कि यह किस देवता का मंदिर था पर जब हमने मंडपनुमा छत्री का मुआयना किया तो उस पर भगवान महावीर की छोटी मूर्ति नजर आई जिसे देखकर मंदिरों की स्थापत्य कला के जानकर ललित जी ने निष्कर्ष निकाला कि ये जैन मंदिर Jain temple in Bhangarh था|

जैन मंदिर के बगल में और महल के सामने एक बड़ा प्रांगण है जहाँ एक बड़ा चबूतरा बना है और चबूतरे के ऊपर एक छोटा चबूतरा है कहते है कि यहाँ सार्वजनिक समारोह में राजा चबूतरे पर बने चबूतरे पर बैठता था और नीचे के चबूतरे पर उसके मंत्री व गणमान्य नागरिक बैठते थे| एक तरह से ये चबूतरा या स्थल राजा का दीवाने आम लगता है जहाँ राजा सार्वजनिक समारोहों व आम नागरिकों से मिलने के लिए बैठा करता था| इस स्थल के आगे महल में प्रवेश के लिए फिर एक दरवाजा बना है जिसमे प्रवेश करते ही आगे महल की ऊपर चढती सीढियाँ नजर आती है|

ज्यादातर महल खण्डहर बन चुका है हाँ तलघर व एक मंजिल अभी भी सुरक्षित बची है| महल में ऊपर जाने पर एक कक्ष में पानी का एक बड़ा खुला होद है जिसे देखकर लगता है कि ये रानियों के नहाने व महल में ठंडक रखने के लिए बनाया गया था| इस पानी के होद के चारों और बने कक्ष जो अब टूट चुकें है के भग्नावशेष देखने पर लगता है कि ये रानी का कक्ष था| कमरों में स्नानघर भी बना है| बाथरूम के ढाँचे में बनी सुविधाओं को देखते हुए पता चलता है कि उस जमाने में भी आजकल की तरह अटैच टायलेट का चलन था| महल के इस खंड के सामने ही प्रांगण में एक छोटा मंदिर बना है जिसे कहते है कि यह रानी रत्नावती का मंदिर है मंदिर के चारों और परिक्रमा भी बनी है| हालाँकि महल में मुग़ल स्थापत्य कला का इस्तेमाल जगह जगह इस्तेमाल नजर आता है पर इस मंदिर को एकदम राजपूत शैली में ही बनाया गया है इसमें मुग़ल शैली के इस्तेमाल से परहेज किया गया है| देखने से लगता है यह मंदिर रानी के लिए बनाया गया था जिसमें रानी अपने किसी ईष्ट देव की पूजा आराधना करती थी| रानी के कक्ष से महल से दूर उसके मायका “तितरवाड” गांव भी नजर आता है जनश्रुति है कि रानी अपने महल में दिया जलाने से पहले अपने मायके में जले दिए का प्रकाश देखती थी| मायके में जले दिए का प्रकाश देखकर ही वह अपने महल का दिया जलाती थी|
महल को वहां के लोग सात मंजिला बताते है पर पहाड़ पर उसकी बसावट देखकर यह महल सात मंजिला नहीं सात खंड में बना सतखंडा नजर आता है| ललित जी के पुरातत्व ज्ञान ने भी यही निष्कर्ष निकाला|

महल से निकलने के बाद हम सोमेश्वर महादेव Someshwar Mahadev के मंदिर गए| यह मंदिर भी बहुत सुन्दर बनाया गया है इसके दक्षिण में एक प्राकृतिक झरना बहता है मंदिर के साथ ही इस झरने पर पक्के कुण्ड बने है इन कुंडों के भीतर से होते हुए झरने का पानी आगे जाता है| इस मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है साथ ही मंडप में शिव के वाहन नंदी व गणेश के वाहन चूहे की प्रतिमाएं बनी है| नंदी के पास गणेश के वाहन चूहे की प्रतिमा देखकर ललित जी ने बताया कि –“आज पहली बार किसी मंदिर में नंदी के साथ उन्होंने चूहे की प्रतिमा देखी है|”

यह शिवमंदिर सोमनाथ नाई द्वारा बनाया गया है इसीलिए इसका नाम सोमेश्वर महादेव मंदिर है| विभाग के कर्मचारी ने बताया कि सोमेश्वर नाई ने भानगढ़ के पास अजबगढ़ की पहाड़ियों में पक्का तालाब भी बनाया था जिसका नाम सोमसागर है और वो अब भी मौजूद है|

नाई द्वारा मंदिर व पक्का तालाब बनाने की बात सुन ललित जी के मुंह से अनायास ही निकल गया कि-“इस नगर में जैन मंदिर, वैष्णव मंदिर, शैवमंदिर होने से साफ है कि यहाँ के राजा अपनी प्रजा द्वारा अपनाई गई हर धार्मिक आराधना का आदर करने वाले थे, साथ ही एक नाई द्वारा ऐसा भव्य मंदिर व पक्का तालाब बनाने वाली घटना से जाहिर है इस नगर का हर वर्ग का व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से संपन्न था और राजा ने हर वर्ग को अपनी आर्थिक उन्नत्ति करने की छूट दे रखी थी|”

 सोमेश्वर महादेव के मंदिर से निकलकर हम फिर त्रिपोलिया दरवाजे की और बढ़ें रास्ते में एक बरगद के पेड़ के नीचे एक पानी की बावड़ी के खंडहर देखे| त्रिपोलिया के बाहर निकलते ही किसी साधु के आश्रम के भग्नावशेष है जन-श्रुति है कि यह साधु का आश्रम का आश्रम इस किले से पहले यहाँ मौजूद था| एक दिन राजा भगवानदास शिकार खेलते हुए इधर आये उन्होंने साधु का आश्रम व आस-पास की जगह देखकर साधु से यहाँ महल बनाने की इजाजत मांगी जो साधु ने यह कहते हुए दे दी कि उसके आश्रम में होने वाले यज्ञों की धुंवा महल को ना छुए इतना दूर आप अपना महल या किला बना सकते है| यदि किसी दिन मेरे आश्रम की धुंवा महल को छू लेगी तो अनिष्ट हो जायेगा| कई लोग इस नगर के उजड़ने का एक कारण यह भी मानते है|

आश्रम के आगे पहाड़ियों पर पत्थरों से बनी पगडंडी पर चलते हुए हम एक खुले छोटे से कुएं के पास पहुंचे जहाँ रस्सी बंधा एक डिब्बा रखा था उसे देखकर हम मुंह पर ओक लगाकर देशी नुस्खे से पानी पीने के मौके को नहीं छोड़ सके और सबने बारी बारी से कुएं का पानी पिया और मंगला देवी व केशवराय के मंदिर देखने के लिए आगे बढ़ गए| केशवराय के मंदिर के दरवाजे के एक बड़े पत्थर पर नागरी लिपि में संवत १९०२ अंकित था जो यह प्रमाणित कर रहा था कि यह नगर संवत १९०२ में आबाद रहा होगा|

नगर के चारों और पांच दरवाजे थे- १- हनुमान द्वार (मुख्य नगर द्वार), २- फूलवाड़ी द्वार(इस द्वार के पास फूलों की बाड़ी हुआ करती थी), ३-दिल्ली द्वार , ४- अजमेरी द्वार, ५- लुहारी द्वार (कहते है कि इस द्वार के पास लोहारों की बस्ती थी)|

नगर जो अब खंडहर में तब्दील हो चुका है में हनुमान जी, गोपीनाथ जी, जैन मंदिर, गणेश जी, भैरव, केशवराय, महादेव, चामुंडा माता, मंगला देवी, सरसा माता आदि कई देवी देवताओं के मंदिर है|

नोट :- इस किले के भुतहा होने के पीछे की कहानी व इसकी हकीकत कि- क्या ये किला व उजड़ा हुआ नगर क्या वाकई भुतहा है ?
–क्या इस किले में अब भी भूत रहता है ?
–इस किले को किसने बनाया ? व इसका इतिहास क्या है ? की जानकारी अगले लेख में|
–किले की स्थापत्य शैली, किले व इस उजड़े नगर के मंदिरों की स्थापत्य शैली व उजड़े नगर के पुरातत्व विषय पर जानकारी देंगे ललित जी शर्मा अपने ब्लॉग ललित डॉट कॉम पर|

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