Alauddin Khilji वंश के ख़त्म होने की खौफनाक दास्तान

Alauddin Khilji ने अपने चाचा जलालुद्दीन की नृशंस हत्या के बाद उसके राज्य का अपहरण कर लिया था और शासन के दावेदारों को खत्म कर दिया था|  Alauddin Khilji ने जब शादी चंदोवा अपने सिर पर रखा, उस वक्त भी जलालुद्दीन के कटे सिर से खून टपक रहा था| अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा के वध के बाद मुक्त धन वर्षा कर, पद बाँट, सत्ता के संभावित दावेदारों को खत्म कर सिंहासन पर बैठा| यही नहीं गद्दी पर बैठने के बाद उसने कई राज्यों पर आक्रमण कर निरंकुश शासन की स्थापना की| रणथम्भोर, चितौड़, जैसलमेर और कई जगहों Alauddin Khilji के आक्रमण के कारण हजारों नारियां अपने सतित्त्व की रक्षा के लिए जौहर की ज्वाला में कूद पड़ी| खिलजी ने कई जगह बड़े बड़े नरसंहार किये|

पर हिंसा, विश्वासघात, लम्पटता और षड्यंत्रों की बुनिवाद पर खड़ा किया राज्य उसकी अगली पढ़ी भी नहीं भोग पाई| आपको बता दें भारत में ऐसे बहुत से हिन्दू राजवंश है, जिनकी स्थापना के बाद सैंकड़ों, हजारों वर्ष तक उनके वंशजों ने राज किया और देशी रियासतों के खात्में के बाद भी आज उनके महल, किले उनके वंशजों के अधिकार में है| जबकि खिलजी ने जिन हथकंडो को अपनाकर राज्य पाया, वह उसके पुत्रों के हाथों वैसे ही हथकंडों से निकल गया| यही नहीं उसी के वफादारों ने जो कभी खिलजी के गुलाम हुआ करते थे, ने उसके परिवार का खात्मा कर सत्ता हथिया ली|

जनवरी 1316 ई. में घोर मानसिक यंत्रणा और बीमारी के कारण खिलजी के निधन के बाद उसका सात वर्षीय पुत्र शिहाबुद्दीन खिलजी सल्तनत के सिंहासन पर बैठा| मलिक काफूर नए सुल्तान का संरक्षक बना| आपको बता दें शिहाबुद्दीन को गद्दी पर काफूर ने ही षड्यंत्रपूर्वक बैठाया था, ताकि उसका संरक्षक बनकर सत्ता अपने हाथ में रख सके| इससे पूर्व मलिक काफूर ने खिलजी के बड़े पुत्र खिज्रखां को षड्यंत्रपूर्वक कैद करवा दिया था जिसे बाद में अँधा करवा दिया और अन्य पुत्रों को भी कैद करवा दिया| काफूर ने Alauddin Khilji के तीसरे पुत्र मुबारक खां को मारने के लिए आदमी भेजे, पर मुबारक ने उन्हें गले का हार देकर अपना बना लिया और उन्हीं से मलिक काफूर की हत्या करवा दी|  काफूर की हत्या के बाद मुबारक नाबालिग सुल्तान शिहाबुद्दीन का संरक्षक बना और कुछ माह बाद उसे ग्वालियर भेज दिया गया, जहाँ उसकी आँखे निकलवा ली गई| इस तरह खिलजी के इस पुत्र मुबारकखां ने अपने भाई को रास्ते हटाकर दिल्ली के तख़्त पर अपनी ताजपोशी की और कुतुबुद्दीन मुबारकशाह के ख़िताब से बादशाह बना|

अपने पिता की ही तरह खून से रंगकर गद्दी पर बैठे कुतुबुद्दीन मुबारकशाह ने भी जनता व सामन्तो की सहानुभूति पाने के लिए धन वर्षा की, सामान्य बंदियों को कैद से छोड़ा, जागीरें बांटी, जनता के कर खत्म किये, कई सुधारवादी कदम उठाये| पर सब बेकार| खिलजी का यह बादशाह पुत्र भी अप्रैल 1320 ई. में अपने ही एक गुलाम खुसरो खां द्वारा परिवार के साथ मौत के घाट उतार दिया गया| खुसरो खां के समर्थकों ने महल में घुस कर बादशाह सहित अवशिष्ट राजकुमारों की हत्या कर दी| उस रात राजमहल में हिंसा व व्याभिचार का तांडव अपनी पराकाष्ठा पर चला| खुसरो खां के बारे में बता दें यह इतिहास प्रसिद्ध कवि, इतिहासकार  अमीर खुसरो नहीं बल्कि मुबारकशाह का गुलाम था| जो हिन्दू से धर्मान्तरित मुसलमान था| तत्कालीन इतिहासकार खुसरो, बर्नी आदि ने उसे गुजरात की खार, बरादू या बरवारी जाति से उत्पन्न बताते है| जिसका बचपन का नाम हसन था| अपनी खूबसूरती के कारण हसन अलाउद्दीन के घरेलु सेवक समूह में भर्ती कर लिया गया| शाही रहन सहन में पले सुन्दर हसन पर जब मुबारक की नजर पड़ी तो उसका नसीब खुल गया और वह खुसरो खां हो गया, जो बाद में मुबारकशाह की हत्या कर खुसरोशाह के नाम से दिल्ली का बादशाह बना|

खुसरो खां के बारे में इतिहासकार लिखते है कि- “वह खुबसूरत गुलाम सुल्तान मुबारकशाह का दाहिना हाथ था जिसके साथ कहा जाता है कि उसका समलैंगिक सम्बन्ध था| इसी खुबसूरत गुलाम हसन को खुसरो खां की उपाधि देकर सुल्तान ने उसे वजीर-खास का पद दिया था| मुस्लिम इतिहासकार लिखते है कि- खुसरोशाह के गद्दी पर बैठते ही पांच-छ: दिन बाद महल में मूर्तिपूजा आरम्भ हो गई| साम्राज्य के हिन्दू बहुत प्रसन्न थे और आशा करते थे कि दिल्ली पुन: उनके अधीन आ जाएगी| तत्कालीन इतिहासकार बर्नी ने उसे हिन्दूक्रांति कहा| हिन्दुओं के प्रति उसकी अनपेक्षित उदारता के चलते ही कट्टर मुस्लिम शक्तियां उसके खिलाफ लामबंद हुई और उसे सत्ताच्युत कर दिया गया|

 इस तरह खिलजी की मृत्यु के बाद षड्यंत्रों, हत्याओं, व्याभिचार, दुराचार, विश्वासघात की बुनियाद पर खड़ा किया उसका शासन चार वर्ष भी नहीं चला| शासन ही नहीं, इस अल्प अवधि में उसका वंश ही ख़त्म हो गया| जिस तरह अलाउदीन खिलजी ने अपने चाचा के साथ विश्वासघात किया ठीक उसी तरह उसके गुलाम और वफादार मलिक काफूर व उसके बेटे मुबारकशाह के वफादार खुसरो खां ने उनके साथ विश्वासघात किया और उसके वंश का नामोनिशान मिटा दिया| शायद यह जौहर की ज्वाला में कूदने वाली सतियों का यह अभिशाप था|

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