अकबर – आमेर संधि के मायने

अकबर – आमेर संधि के मायने

अकबर के साथ आमेर के राजा भारमल द्वारा राजनैतिक संधि करने व बाद में उसके वंशजों द्वारा उसे निभाने को लेकर आज उस काल की परिस्थितियों को बिना समझे कई तरह की बातें की जाती है| कई अति कट्टर धार्मिक प्रवृति के लोग मुस्लिम शासकों की आलोचना करते समय आमेर के राजाओं का चरित्र हनन करने से भी नहीं चूकते, जबकि यदि आमेर के शासक जो उस वक्त अपने स्वजातीय बंधुओं, मीणाओं, पिंडारियों आदि से त्रस्त थे ने विरोधियों पर काबू पाने के लिए अकबर जैसे शक्तिशाली बादशाह से राजनैतिक संधि कर अपने राज्य की जनता की सुरक्षा व विकास का मार्ग ही प्रशस्त किया था|

मुसलमान शासकों से संधि के मामले में आलोचना करने वाले हिन्दू कट्टरपंथी आमेर के शासकों के की उस दूरगामी निति पर ध्यान नहीं देते जिस निति की वजह से आज वे अपने आपको हिन्दू कहने लायक बचे हुए है| आमेर के शासकों द्वारा अकबर से संधि कर भारत पर मुसलमान आक्रमणकारियों द्वारा आक्रमण कर इस्लामीकरण करने की उस गति पर जो लगाम लगाई उस निति पर प्रकाश डालते हुये मगध विश्व विद्यालय, गया के इतिहास रीडर राजीव नयन प्रसाद द्वारा लिखित और डा.रतनलाल मिश्र द्वारा अनुवादित पुस्तक “राजा मानसिंह आमेर” की भूमिका में लिखते हुये पूर्व पुलिस अधिकारी, क्षत्रिय चिंतक व लेखक श्री देवीसिंह जी महार लिखते है –

“कोई भी व्यक्ति अथवा समाज काल परिस्थिति निरपेक्ष नहीं हो सकता है, इसीलिए चाहे इतिहास व्यक्ति का हो अथवा समाज या देश का उस पर उस काल की परिस्थितियों का न केवल प्रभाव होता है, अपितु जो व्यक्ति अथवा समाज काल व परिस्थितियों की उपेक्षा करके चलता है, ऐसा नहीं है कि केवल सफलता ही प्राप्त नहीं कर सके,अपितु विनाश को भी प्राप्त होता है| आज के इतिहासकार उपर्युक्त तथ्यों पर प्रकाश डाले बिना ही इतिहास लेखन का कार्य कर रहे है, जिससे इतिहास के पात्रों के साथ न्याय नहीं हो पाता है|

सिकंदर ने देश पर ईशा पूर्व 326 में अर्थात 2329 वर्ष पूर्व आक्रमण किया था, उसके बाद सिंध पर लगातार आक्रमण होते रहे| महमूद गजनी ने ईस्वी 1001 व मुहम्मद गौरी ने ई.1175 में भारत पर पहला आक्रमण किया| उसके बाद लगातार पठानों व बाद में मुगलों ने इस देश पर आक्रमण किये| इन आक्रमणों का उद्देश्य न तो लूटपाट था और न ही केवल शासन स्थापित करना, अपितु इनका उद्देश्य था – सम्पूर्ण देश का इस्लामीकरण| पिछले कुछ सौ वर्षों में ही ईरान, ईराक व अफगानिस्तान के विशाल भूभाग की जनता का धर्म परिवर्तन कर उनको इस्लाम में दीक्षित करने के बाद उनका मुख्य उद्देश्य भारत का इस्लामीकरण था| लगातार 2000 से अधिक वर्षों तक विदेशियों के आक्रमण का सामना करने व उसके कारण भारी जन-धन की हानि उठाने के कारण राजपूत-शक्ति क्षीण व क्षत-विक्षत हो गई थी| मुसलमानों ने विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति कर आधुनिक हथियारों बंदूकों, तोपों आदि का निर्माण कर लिया था, जबकि हमारे देश के शिक्षा के ठेकेदार इस दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाये थे, परिणामस्वरूप मुसलमानों के विरुद्ध होने वाले युद्धों में राजपूतों को भारी हानि उठानी पड़ती थी| बाबर व शेरशाह सूर के काल तक परिस्थिति इतनी दयनीय हो गई थी कि लोग धन व राज्य के प्रलोभन में बड़ी संख्या में इस्लाम को अपनाने लगे थे, यहाँ तक की राज्य के लोभ में राजपूत भी इस्लाम को अपना रहे थे|

इक्के दुक्के आक्रमणों को छोड़कर 2000 वर्षों में भारत पर सैंकड़ों आक्रमण काबुल व कंधार के रास्ते से हुये, लेकिन इस देश के किसी शासक ने खैबर व बोलन के दर्रों को बंद करने की बुद्धिमत्ता प्रदर्शित नहीं की| काबुल क्षेत्र में पांच बड़े मुसलमान राज्य थे, जहाँ पर हथियार बनाने के कारखाने स्थापित थे| इन राज्यों के शासक भारत पर आक्रमण करने वालों को मुफ्त हथियार व गोलाबारूद देते थे, व वापस लौटने वालों से बदले में लुट का आधा माल लेते थे| इस प्रकार धन के लोभ में बड़ी संख्या में हजारों मुसलमान इस देश पर आक्रमण करते थे, जिनमें से कुछ लोग वापस लौटते समय धर्म परिवर्तन व राज्य के लोभ में यहीं रूककर पहले आये मुसलमानों के साथ मिल जाते, जिससे धर्म परिवर्तन का कार्य तेजी से बढ़ने लगा था व लाखों हिन्दुओं ने इस्लाम को स्वीकार कर लिया था|

इस खतरे को राणा सांगा जैसे बुद्धिमान शासक ने समझा था व बाबर से संधि भी की थी लेकिन सांगा उस संधि को निभा नहीं पाये, परिणामस्वरूप अन्तोत्गोत्वा बाबर से उनका युद्ध हुआ जिसमें पराजित होकर वे मारे गये| किन्तु इसके बाद आमेर में लगातार तीन पीढ़ी तक नितिज्ञ, शूरवीर व बलवान शासक हुये, जिन्होंने मुगलों से संधि कर, न केवल बिखरी हुई, दुर्बल व नष्ट प्राय: राजपूत शक्ति को एकत्रित कर उनमें आत्मविश्वास जगाया अपितु बाहर से आने वाली मुस्लिम आक्रामक शक्ति का रास्ता हमेशा के लिए रोक दिया| अपने राज्यों में आधुनिक शस्त्रों के निर्माण की व्यवस्था की व कुछ ही समय में मुगलों के बराबर की शक्ति बन गये| इसके अलावा मुगलों को पठानों से लड़ाकर पठान शक्ति को तोड़ना व भारत के इस्लामीकरण की योजना को नेस्तनाबूद कर देना उनकी प्रमुख उपलब्धि थी|

आमेर के राजा भारमल ने अकबर से संधि की| उनके पुत्र भगवंतदास ने इस संधि को न केवल सुदृढ़ किया बल्कि उन्हीं के शासन काल में उन्होंने बादशाह अकबर को पठानों को मुगलों का एक नंबर का शत्रु बताते हुए काबुल पर विजय की योजना बनवाई जिससे न केवल पठान शक्ति दुर्बल हुई बल्कि मुसलमानों की भारत के इस्लामीकरण की योजना भी दफ़न हो गई| तब मुसलमान ही मुसलमान से अपने राज्य को सुस्थिर करने के लिए लड़ रहा था व इस लड़ाई का लाभ उठाकर राजपूत अपनी शक्ति को बढाते जा रहे थे| अकबर के शासनकाल में ही मानसिंह इतना शक्तिशाली हो गया था कि अकबर के मुसलमान सेनापति उसे अपने भविष्य के लिए खतरा समझने लगे थे|

भगवंतदास ने जिस बुद्धिमत्ता से अकबर को काबुल विजय के लिए सहमत किया था उसकी क्रियान्विति कुंवर मानसिंह के शौर्य, युद्धकौशल व नितिज्ञता से ही संभव हुई थी| मानसिंह ने ही काबुल विजय कर उन पांच राज्यों के शस्त्र निर्माण करने वाले कारखानों को नष्ट किया था व वहां के शस्त्र निर्माण करने वाले कारीगरों को बंदी बनाकर आमेर ले आया था| जहाँ पर आज जयगढ़ का किला स्थित है, वहां पर शस्त्र निर्माण के एक कारखाने की स्थापना कराई गई थी व दुसरे राजपूत राजाओं को भी शस्त्र निर्माण की तकनीक उपलब्ध कराई गई थी| उन्हीं कारीगरों के वंशजों द्वारा निर्मित पहियों पर रखी संसार की सबसे बड़ी तोप आज भी जयगढ़ के किले में पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है|
काबुल विजय के बाद कश्मीर से लेकर उड़ीसा व बंगाल तक पठानों का दमन, हिन्दू तीर्थों व मंदिरों का उद्धार व उपर्युक्त क्षेत्र में नये राजपूत राज्यों की स्थापना मानसिंह के ऐसे कार्य थे, जिसके कारण उसे अपने काल में धर्मरक्षक कहा गया|”

लेकिन अफ़सोस इतिहासकारों व कट्टर हिन्दुत्त्ववादी लोगों ने मानसिंह व आमेर के राजाओं के चरित्र का सही अध्ययन किये बिना उनका चरित्र हनन किया और अब भी कर रहे है|

आधुनिक इतिहासकारों व कथित बुद्धिजीवियों ने राणा प्रताप व राजा मानसिंह को कट्टर शत्रुओं के रूप में प्रदर्शित किया है| इस प्रकार के प्रदर्शन के पीछे या तो उनकी स्वयं की हठधर्मिता कारण कारण रही है या इतिहास के सम्यक ज्ञान का अभाव| राजा मानसिंह मुसलमानों के इस्लामीकरण की योजना को जहाँ विफल कर स्वधर्म रक्षा के प्रयत्न में लगा हुआ था, वहीँ राणा प्रताप स्वतंत्रता की रक्षा में संलग्न थे| ये दोनों ही कार्य उस वक्त की अनिवार्य आवश्यकताएँ थी| इसीलिए समस्त राजपूतों का ही नहीं, समस्त जनता का भी समर्थन इन दोनों महापुरुषों के साथ था|

इस तथ्य का सबसे प्रबल प्रणाम यह है कि राणा प्रताप व मानसिंह के समकालीन समस्त कवियों व इतिहासकारों ने इन दोनों की वीरता व महिमा का समान रूप से बखान किया है|

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