एक किसान की आत्महत्या के बाद

एक किसान की आत्महत्या के बाद

किसान की आत्महत्या : कल दिल्ली के जंतर-मंतर पर आम आदमी पार्टी की किसान रैली के दौरान के राजस्थान के दौसा जिले के एक किसान गजेन्द्र सिंह द्वारा पेड़ से लटककर आत्महत्या करने के बाद टीवी चैनल्स, अख़बारों, सोशियल मीडिया में प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है|  सभी राजनैतिक दल इस आत्महत्या को लेकर दुसरे दल को घेरने के चक्कर में उलटे सीधे बयान देकर, एक किसान के बलिदान की मजाक उड़ाए हुए है| यही नहीं सोशियल मीडिया पर अपनी अपनी राजनैतिक पार्टी के भक्तगण अपने अपने हिसाब से मृतक किसान पर टिप्पणियाँ लिखकर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे है| कोई मृतक को शहीद का दर्जा दे रहा है तो कोई उसके कृत्य को कायराना साबित करने पर तुला है| वहीं कुछ लोग इसे सोचे समझे एक ड्रामा का दुर्घटना में बदलना साबित करने में लगे है| कुल मिलाकर सोशियल मीडिया पर लोग अपना अपना दिमाग लगाकर साबित करना चाहते है कि जो वे सोच रहे है वही सही है| पर मृतक की भावनाओं को कोई भी समझने की कोशिश नहीं कर रहा|  एक बारगी मान भी लिया जाय कि मृतक किसान ध्यान आकर्षित करने के लिए कोई नाटक कर रहा था, पर उसके पीछे भी उसकी भावनाएं देखें कि इतना खतरनाक नाटक जिसमें उसकी जान तक चली गई, कर तो किसानों के हित में रहा था|

लेकिन नहीं जी, कुछ लोगों को उसका किसान होना भी इतना अखर गया कि वे सोशियल मीडिया पर उसके द्वारा पूर्व में पोस्ट की गई फोटो, उसके विधानसभा चुनाव लड़ने की ख़बरें, उसके द्वारा पगड़ियां बांधने की बातें तलाश कर भ्रम फैला रहे है कि वह किसान था ही नहीं| और ये सब कर रहे है एक आध राजनीतिक दलों के अंध भक्तगण और और एक जाति विशेष के लोग, जिन्हें किसी राजपूत द्वारा अपने आपको किसान कहना ही अखरता है| क्योंकि वे सोचते है कि किसान तो सिर्फ वे ही हो सकते है, कोई राजपूत जिसे उन्होंने सामंत, शोषक, अत्याचारी, क्रूर घोषित कर रखा है वह किसान शब्द का प्रयोग कैसे कर सकता है| उन्हें इस बात से चीड़ है कि कोई राजपूत किसान के नाम पर अपना बलिदान देने के बावजूद शहीद का दर्जा कैसे पास सकता है? क्योंकि किसान शब्द पर तो अपनी जाति का पेटेंट समझते है|

और इसी जलन का नतीजा है कि कई लोग सोशियल साइट्स पर ऐसी टिप्पणियाँ लिख रहे है जो उसके किसान होने पर भ्रम पैदा करे| अंग्रेजों के जमाने का एक पुलिस अधिकारी किसान केसरी हो सकता है, जीवन भर राजनीति करने वाले, कई बार मंत्री बनने वाले, कॉर्पोरेट घराने चलाने वाले, शिक्षा के कई संस्थान चलाने वाले, शराब की ठेकेदारी करने वाले किसान व किसान नेता हो सकते है!

पर दो-चार बीघा जमीन पर खेती करने वाले किसी राजपूत किसान ने यदि कभी विधानसभा चुनाव लड़ लिया, साफे बांधने जैसा कोई सिजनेबल काम कर लिया, किसी की गाड़ी के साथ खड़े होकर फोटो खिंचवा ली तो वो किसान नहीं है !

किसान आन्दोलन में जेल में बना मुफ्त का ज्यादा हलवा खा कर कोई मर गया, शराब का अवैध धंधा करने वाला, कोई बदमाश किसी एनकाउन्टर में मर गया तो वो शहीद है और कल जंतर-मंतर पर आत्महत्या करने वाला किसान ड्रामा कर रहा था. ड्रामे में मर गया. क्योंकि वो राजपूत था और ऐसे तत्वों की नजर में कोई भी राजपूत भले वो कृषि पर आश्रित हो, कितना भी गरीब क्यों ना हो, वो सामंत है, शोषक है, क्रूर ही हो सकता है, किसान नहीं| क्योंकि किसान शब्द पर तो उनका जातीय पेटेंट है|

अब इन बावली बूचो को कौन समझाएं कि किसान गजेन्द्र सिंह यदि ड्रामा भी कर रहा था, तो इतना खतरनाक ड्रामा जिसमें जान चली गई वो भी तो किसानों के हक में कर रहा था|

kisan gajendra singh
gajendra singh farmer
gajendra singh who suicide at jantar-mantar delhi.

3 Responses to "एक किसान की आत्महत्या के बाद"

  1. ashok bhanwal   April 23, 2015 at 12:48 pm

    marmik post hukum

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  2. shashank chandel   April 23, 2015 at 1:23 pm

    सहमत ,और आखिर एक सवर्ण शायद दुखियारा हो भी नहीं सकता ,न ही गरीब ,इसलिए शायद जातिगत और धार्मिक आधार पर कुछ लोग आरक्षण,छात्रवृत्ति,पदोन्नति पाने के हक़दार है।

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  3. अल्पना वर्मा   April 28, 2015 at 5:46 pm

    विषय की गंभीरता को समझाता और मर्म को भेदता आलेख.
    बेहद दुखद घटना .श्रद्धांजलि.ईश्वर गजेन्द्र की आत्मा को शान्ति और उसके घरवालों को इस दुःख से उबरने की हिम्मत दे.

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