हठीलो राजस्थान-34

धर गोरी, गोरी खड़ो,
गोरी गाय चराय |
गोरी लाई चूरमो ,
गोरी रूप लजाय ||२०३||

रेगिस्तान की धवल भूमि पर गोर वर्ण का ग्वाल सफ़ेद गाय को चरा रहा | दोपहर होने पर उसकी सुन्दर पत्नी भोजन के लिए चूरमा लेकर आती है व ग्वाल के रूप को देखकर शरमा जाती है |

टाबर दीधो रोवतो,
सज दीधो सिणगार |
डाबर भरवा जल गई,
डाबर नैणी नार ||२०४||

उस श्रंगार सज्जित युवती ने अपने रोते हुए शिशु को परिवार की अन्य महिलाओं को सौंप दिया तथा वह डाबर नैणी (सुनयना) डाबर (छोटे जलाशय) में जल भरने चली गई |

रंग सुरंगी ओढ़नी ,
हिवडै मोत्यां हार |
पणीयारयां पाणी भरै,
गावै राग मलार ||२०५||

रंग बिरंगी सुन्दर ओढ़नियां पहने तथा छाती पर मोतियों का हार धारण किए पनिहारिनें मल्हार राग गाती हुई पानी भरने जाती है |

हाली झूमै मगन व्है,
गोरी , डोरी भूल |
रट सु लगावै रेण दिन ,
अ-रटज नाम फिजूल ||२०६||

अरट की ध्वनी में मस्त होकर किसान (हाली) बैल को हांके जा रहा है व उसकी पत्नी जो खेत में पानी (पाणत करना)दे रही है मस्ती में डोली लगाना (नाके मोड़ना) भूल जाती है | ऐसी मस्ती प्रदान करने वाली जिसकी रट (ध्वनी) है उसका नाम व्यर्थ में ही अ-रट रखा गया है |

मेह अँधेरी रातड़ी,
उतरादी आ फांफ |
पग कादै कर खांक में,
पाणत आवै जाफ ||२०७||

मेह-अँधेरी रात में उतर दिशा से भयंकर लहर चल रही है | ऐसे में किसान की पत्नी ठण्ड के मारे हाथों को बगल में दबा कर क्यारियों में कीचड़ में खड़ी पाणत(फसल में पानी देना) करने के बाद लौटकर आ रही है |

लेखक : स्व.आयुवानसिंह शेखावत

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