1857 से पहले की क्रांति ने यहाँ तोड़ा था दम | डूंगजी जवाहर जी

राजस्थान के शेखावाटी आँचल के स्वतंत्रचेता छोटे राजपूत शासकों को अंग्रेजों का दखल कभी पसंद नहीं था | पर जयपुर जैसी बड़ी रियासत द्वारा अंग्रेजों के साथ संधि करने के बाद अंग्रेजों को शेखावाटी आँचल में भी पैर पसारने का मौका मिल गया | पर यहाँ के शूरवीर जागीरदारों ने अपने सीमित साधनों के दम पर ही सही पर अंग्रेज सत्ता का पुरजोर विरोध किया | अंग्रेजी हकुमत के खिलाफ डूंगरसिंह शेखावत के नेतृत्व में सशस्त्र बगावत का बिगुल बजाय गया | पटोदा के ठाकुर जवाहरसिंह, लोठू निठारवाल (जाट), सांवता मीणा जैसे स्वतंत्रचेता वीर उनके दल के महत्त्वपूर्ण सदस्य थे |

इस दल ने अंग्रेजी सेना की नसीराबाद स्थित छावनी लूट ली व अंग्रेजी सेना को सप्लाई होने वाली रसद को मार्ग में लूटकर बाधित कर दिया | इससे नाराज होकर अंग्रेजों ने राजस्थान की रियासतों यथा जयपुर, जोधपुर, बीकानेर को डूंगरसिंह व उनके दल का सफाया करने का आदेश दिया | डूंगरसिंह को धोखे से पकड़ कर आगरा किले की कैद में रखा गया, पर उनके दल ने आगरा किले पर हमला कर उन्हें छुड़ा लिया | आखिर रियासती व अंग्रेजी फ़ौज ने इनका पीछा किया और दल के मुखिया डूंगरसिंह व जवाहरसिंह पकड़े गए|

जवाहरसिंह को बीकानेर के राजा अपने यहाँ ले गए और ससम्मान नजर कैद रखा, वहीं डूंगरसिंह को जोधपुर किले में ससम्मान नजरबन्द रखा गया| जोधपुर किले में नजरबंदी के दौरान बीमार होने पर डूंगरसिंह को किले के बाहर राखी ठाकुर की स्मृति में बनी छतरी में रखा गया, जहाँ पांच छ: दिन बीमार रहने के बाद डूंगरसिंह का निधन हो गया | उनके परिजनों ने जोधपुर के कागा श्मशानघाट पर उनका अंतिम संस्कार किया |

इस तरह से जोधपुर किले का सलीम खाना और किले के मुख्य द्वार के बाहर राखी ठाकुर की स्मृति में बनी छतरी शेखावाटी के महान क्रांतिवीर डूंगरसिंह के इतिहास से जुड़ी है| एक तरह से कहा जाय कि 1857 से पहले डूंगरसिंह शेखावत ने अंग्रेजों के खिलाफ जो सशस्त्र क्रांति की थी, उसने उनके निधन के साथ ही इसी छतरी में आखिरी दम तोड़ दिया था |

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