होनहार के खेल

सन १९५० के दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में स्व. श्री तन सिंह जी एक शिक्षण शिविर के सिलसिले में अपने जीवन में पहली बार चितौड़ गए और वहां उन्होंने चितौड़ दुर्ग देखा | लेकिन चितौड़ दुर्ग देखने के दो महीने बाद तक स्व. श्री तन सिंह जी उस कसक और वेदना से मुक्त नहीं हो सके जो दुर्ग के प्रत्येक पत्थर और स्मारक में कसमसा कर मूक हो गयी | कलम का सहारा लेकर उन्होंने उन भावनाओं को वैरागी चितौड़ शीर्षक देकर भाषा के बन्धनों में जकड कर मुक्ति की सांस ली |
खुद स्व. श्री तन सिंह जी के शब्दों में -” जब पहली बार चितौड़ को देखा तो लगा , मैं स्वयं कितनी ही बार लड़ चूका हूँ ,मर-मर कर अमर हो चूका हूँ | पर नहीं ,वह तो केवल एक छलना थी ; उस पर मरने की एक इच्छा थी ; मेरे रक्त की एक मांग थी , जिसे न कभी पूरी की और न कभी पूरी की जा सकती | सोचा , इच्छा तो व्यक्त कर दूँ और वैरागी चितौड़ उसका अभिव्यक्त रूप है |

इसी तरह फरवरी सन १९५८ में जब वे उज्जैन गए और वहां उन्होंने क्षिप्रा के तीर पर प्रात: स्मरणीय इतिहास प्रसिद्ध वीर दुर्गादास का स्मारक देखकर उनकी सोई हुई वेदना ने फिर विद्रोह कर दिया और इस वेदना के भुलावे के प्रयास विफल हो गए तो उन्होंने उन्हें भी “क्षिप्रा के तीर “ शीर्षक देकर एक गद्य लिख डाला | जिसमे उन्हें स्मारक देखते समय लगा -कि उस दिन उस स्मारक ने उनसे बहुत कुछ कहा है ; वही सब लिख डाला |

फिर मई १९५९ में जब स्व.श्री तन सिंह जी ने हल्दी घाटी देखी तो उन्होंने वही महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की समाधि पर दो आंसू बहाने के बहाने ” चेतक की समाधि से “ नामक एक गद्य लिख डाला | इसी वर्ष फिर अक्तूबर के महीने में जब उन्होंने जैसलमेर दुर्ग देखा तो उन्हें लगा जैसे दुर्ग उनसे कह रहा है – मेरी भी कुछ सुनो ; उपेक्षा तो सभी करते है ,पर तुम भी …| और उन्होंने जैसलमेर दुर्ग देखते समय जो इतिहास के दृश्य उनके मन मष्तिस्क में आये ‘ होनहार के खेल ” शीर्षक देकर लिख दिए | इसी वर्ष स्व. श्री तन सिंह जी ने इतिहास का अध्ययन किया , उन्ही के शब्दों में – यह वर्ष मेरे लिए अविस्मरणिय रहेगा क्योंकि इसी वर्ष मैंने इतिहास पढने की चेष्टा की, उसके तोल-जोख ने वर्तमान की परीक्षा की और परिणाम स्वरूप भविष्य की कल्पना में ” कौम की कुटिया ” शीर्षक लेख भी लिखा |
स्व. श्री तन सिंह जी के इन्ही पांचो गद्यों को एक साथ संकलित कर श्री क्षत्रिय युवक संघ द्वारा होनहार के खेल नामक पुस्तक प्रकाशित की गयी |स्व. श्री आयुवान सिंह जी शेखावत के अनुसार -” इतिहास के इतिवृत्तात्मक सत्य के अन्दर साहित्य के भावनात्मक और सूक्ष्म सत्य के प्रतिष्ठापन की चेष्टा ही समाज में चेतना ला सकती है ” और समाज में आत्म-सम्मान और आत्म-गौरव की भावनाओं का सृजन करना ही इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य है |फिर भी स्व. श्री तन सिंह जी ने यह पुस्तक केवल इसी उद्देश्य के लिए नहीं लिखी | कभी कभी हमारी भावनाएं सीमाएं तोड़ने लगती है और हृदय की अपार वेदना जब जीवन के सभी सुखों पर छा जाती है तब लेखक अपनी कलम चला कर ही जी हल्का करता है | और इसी तरह स्व.श्री तन सिंह जी ने भी वीर दुर्गादास के स्मारक, चेतक की समाधि पर, जैसलमेर व चितौड़ दुर्ग देखने के बाद जो वेदना महसूस की उसी वेदना से मुक्त होने के लिए उन्होंने कलम का सहारा लेकर यह पुस्तक लिख डाली |

पुस्तक में छपे पांच लेखों में से वैरागी चितौड़ ज्ञान दर्पण पर व चेतक की समाधि सेक्षिप्रा के तीर स्व.श्री तन सिंह जी के नाम वाले ब्लॉग पर पढ़े जा सकते है |

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