हिन्दी ब्लोग्स का बेहतर भविष्य

कल हिन्दी ब्लोग्स टिप्स पर ” हिन्दी ब्लोगिंग आपको क्या देती है ” व्यंग्य पोस्ट पढ़ी | आशीष जी ने ब्लॉग लिखने की १० मजेदार वजह भी बताई हालाँकि दशों वजहें बड़ी मजेदार लगी लेकिन आखिरी वजह ” बेहतर भविष्य” में आशीष जी ने लिखा .

मेरे जैसे ब्लोगर इसमे अपना बेहतर भविष्य देखते है ..सोचते है क्या पता भविष्य में ऊंट किस करवट बैठे ..शायद हिन्दी ब्लोग्स पर भी एडसेंस मेहरबान हो जाए और कमाई होने लगे ..या पता नही कोई सुंदर सी कन्या इस ब्लॉग को पढ़ बैठे और वेलेंटाईन डे पर मुझे प्रपोज कर दे |

ये बेहतर भविष्य वाली वजह पढ़कर मुझे एक सर्कस वाले गधे का किस्सा याद आ गया | इस किस्से के अनुसार ..
एक धोबी के पास दो गधे थे एक दिन उस शहर में भयंकर तूफान आया और इस तूफान में दोनों में से एक गधा बिछुड़ गया | उस बिछुडे गधे को आवारा घूमते देख एक सर्कस वाले लोग पकड़ कर ले गए | सर्कस का सामान ढुलवाने के अलावा सर्कस वालों ने उसे कुछ करतब भी सिखा दिए जो उसे हर शो में दिखाने होते थे इतनी कड़ी मेहनत के बाद बेचारे को थोडी सी घास खाने को मिलती थी जिससे वह बहुत कमजोर व दुबला हो गया | संयोग से एक दिन सर्कस उसी शहर में वापस पहुँच गया |
और सामान आदि ढोने के बाद सर्कस वालों ने उस गधे को घास चरने के लिए उस दिन खुला छोड़ दिया | इस दरमियान अचानक उसकी अपने पुराने साथी धोबी के गधे से मुलाकात हो गई और दोनों ने एक दुसरे को पहचान भी लिया | आपसी खुशल-क्षेम पूछने के बाद खुले घूम कर घास खा-खा मोटे ताजे हुए धोबी के गधे ने सर्कस के दुबले पतले गधे से पूछा –
धोबी का गधा— अरे यार तुम तो सर्कस में काम करते हो इतने करतब भी सीख गए हो फ़िर इतने दुबले पतले व कमजोर कैसे हो गए |
सर्कस का गधा — क्या करूँ यार ! दिन भर कभी करतब दिखाओ,कभी करतब दिखाने की प्रेक्टिस करो और जब शो नही हो तब सर्कस का सारा सामान भी ढोना होता है और इतनी कड़ी मेहनत के बाद खाने में थोडी सी खास मिलती है वो भी सूखी |
बड़ा परेशान हूँ यार …
धोबी का गधा — अरे यार ! इतने परेशान हो तो सर्कस से भाग क्यों नही जाते ,अभी तो तुम्हे खुला भी छोड़ रखा है भाग लो
सर्कस का गधा — यार सर्कस में मेहनत तो बहुत है खाने को भी कम ही मिलता है लेकिन मेरे यार सर्कस में मेरा फ्यूचर बहुत ब्राईट है |
धोबी का गधा — अरे वो कैसे ?
सर्कस का गधा– अरे यार तुमने सर्कस के शो में उस खूबसूरत लड़की को तो देखा ही होगा जो रस्से पर चलती है ?
धोबी का गधा — हाँ देखा है लेकिन तेरे बेहतर भविष्य का उस लड़की से क्या देना ?
सर्कस का गधा — यही तो बात है यार ! शो करने से पहले हर बार उस सुंदर लड़की का बाप उस लड़की को धमकाता है कि शो में रस्सी पर अच्छी तरह चलना जिस दिन रस्सी से गिर गई उस दिन तेरी शादी इस गधे से कर दूंगा | मै तो दोस्त उस लड़की के गिरने के इंतजार में सर्कस में बैठा हूँ कभी तो गिरेगी ही ! इसलिए कह रहा हूँ कि भविष्य बहुत सुनहरा है |
इसलिय भाईयों हम भी आशीष जी की बताई नो वजहों के अलावा दशवीं वजह की वजह से ही उम्मीद में बैठे है कभी तो गूगल बाबा हिन्दी ब्लोग्स पर मेहरवान होगा ही | और जिस दिन गूगल बाबा के विज्ञापन हिन्दी ब्लोग्स पर आने शुरू हो जायेंगे उस दिन कमाई भी होगी ही | तब तक आशीष जी द्वारा और हाँ मेरी हिन्दी वेब साईट पर गूगल के विज्ञापन खूब आते है तो उम्मीद है जल्द ही हिन्दी ब्लोग्स पर भी गूगल विज्ञापन जरुर दिखेंगे |बताई नो वजहों का ध्यान रखते हुए ब्लोगरी कर ही रहे है |

9 Responses to "हिन्दी ब्लोग्स का बेहतर भविष्य"

  1. Anonymous   February 11, 2009 at 1:56 am

    भविष्य तो बहुत सुन्दर है…..

    Reply
  2. ताऊ रामपुरिया   February 11, 2009 at 3:24 am

    अच्छा खाका खींचा है आपने. पर सोचिये अगर लडकी रस्सी से गिर गई तो भी क्या गधे की शादी उससे हो पायेगी?

    गधा भी ना मिल पाने वाली चीज की उम्मीद में बैठा है . पर भाई हम तो गधे की तरह उम्मीद नही लगा रहे हैं .:)

    रामराम.

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  3. PN Subramanian   February 11, 2009 at 3:35 am

    बिल्कुल ठीक लिखा जी आपने. आभार

    Reply
  4. सिद्धार्थ जोशी   February 11, 2009 at 4:16 am

    शेखावत जी

    उम्‍मीद पर दुनिया कायम है तभी तो तारों के नीचे बेखौफ घूमते रहते हैं कि इस भरोसे कि सभी तारों को भगवान ने पकड़ रखा है एक भी मेरे सिर पर नहीं आ गिरेगा। 🙂

    ब्‍लॉग से कमाई बाद की बात है पहले दिल की भड़ास तो निकाल लें। क्‍या पता उसी से मुक्ति मिल जाए।

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  5. RAJIV MAHESHWARI   February 11, 2009 at 6:39 am

    कहानी अच्छी लगी.

    आभार

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  6. डॉ .अनुराग   February 11, 2009 at 6:49 am

    ताऊ की बात गौर करने लायक है….

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  7. Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"   February 11, 2009 at 12:01 pm

    ईश्वर के यहां देर जरूर है लेकिन अंधेर नहीं.अजी क्या पता ऊपर वाले को बेचारे गधों की दुर्दशा पर दया आ ही जाए.
    वैसे उम्मीद पे दुनिया कायम है……….

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  8. नरेश सिह राठौङ   February 11, 2009 at 2:41 pm

    जब कमाई होगी तब कि तब देखेगें तब तक तो जेब से खर्चा किया जाये । वैसे कहानी पहली बार सुनी है मजेदार भी है और ज्ञान वर्धक भी है ।

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  9. Yogesh SSemwal   May 9, 2012 at 6:03 am

    sir ek na ek Din yesa kuch na kuch jarur hoga or Hindi to aaj jaruri ho gai hai, bhale he kisi ko kitni acchi english kyun na aati ho par hindi ka apna he ek astitaw hai or kaam hai…

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