हल्दीघाटी युद्ध के इतिहास में ये थी विसंगतियां, ऐसे हुई दूर

हल्दीघाटी युद्ध के इतिहास में ये थी विसंगतियां, ऐसे हुई दूर

हल्दीघाटी युद्ध के इतिहास में कई विसंगतियां थी, विभिन्न कलेण्डरों की तारीखों की गणना विभिन्न इतिहासकारों ने अलग अलग कर युद्ध की तारीख में भ्रान्ति पैदा दी थी| राजस्थान के बड़े इतिहासकार डा. गोपीनाथ शर्मा की गणना ने भी भ्रम को बढ़ा दिया| यह युद्ध हल्दीघाटी से लेकर खमणोर “रक्तताल” के मध्य हुआ था, इन स्थानों के मध्य कोई पांच किलोमीटर से अधिक का फासला है, अत: युद्ध मुख्य रूप से किस स्थान पर लड़ा गया, को लेकर भी इतिहासकारों में विवाद था| विभिन्न इतिहासकारों की पुस्तकों में युद्ध में प्रयोग किये अस्त्र- शास्त्रों को लेकर भी भ्रांतियां थी|

ये भ्रांतियां राजस्थान के तत्कालीन यशस्वी मुख्यमंत्री श्री भैरोंसिंह जी शेखावत के संज्ञान में थी| उन्होंने ये बात 27 दिसंबर 1995 में उदयपुर प्रताप शोध संस्थान के राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस के अधिवेशन में व्यक्त की और इतिहासकारों से शोध के माध्यम से इसका निराकरण करने की बात कही, तथा मेवाड़ के उच्चतम व श्रेष्ठ इतिहासकारों के अध्ययन की तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी| भैरोंसिंह जी के आग्रह पर डा. के.एस.गुप्ता की अध्यक्षता में इतिहासकारों की एक कमेटी गठित की गई जिसमें सज्जनसिंह राणावत, ब्रिगेडियर अरुण सहगल, ठाकुर केसरीसिंह रूपवास, डा. राजशेखर व्यास, डा.हुकमसिंह भाटी, डा.देव कोठारी, डा. बी.एम्. जावलिया, डा.देवीलाल शर्मा को शामिल किया गया व डा. गोपीनाथ शर्मा को सलाहकार नियुक्त किया गया|

इन विद्वानों ने हल्दीघाटी युद्ध की तारीख का विभिन्न कलेंडर्स की तारीखों से मिलान कर यह निश्चित किया कि यह युद्ध सोमवार 15 जून 1576 के दिन लड़ा गया था| इसके लिए इतिहास की कई प्राचीन पुस्तकों की सहायता ली गई| इतिहासकारों के अध्ययन में यह बात भी साफ हुई कि इस युद्ध में तलवार, ढाल, भाले, कटार, बरछी, धनुष आदि का ही प्रयोग किया गया था, जिनमें धनुष-बाणों का प्रयोग बाहुल्य से किया गया था| अबुल फजल ने सिर्फ एक हाथी को गोली लगने की बात लिखी है जो साबित करती है कि युद्ध में बन्दूक का प्रयोग भी सिमित संख्या में ही हुआ था| दोनों पक्षों ने तोपों का प्रयोग नहीं किया|

इसी तरह इन इतिहासकारों ने विभिन्न इतिहास पुस्तकों के माध्यम से वो स्थान भी चिन्हित किये जहाँ जहाँ यह युद्ध लड़ा गया| आपको बता दें रक्तताल में हल्दीघाटी के अदम्य योद्धा रामशाह तोमर ने अप्रत्याशित वीरता का प्रदर्शन करते हुए अपने बेटों व निकट सम्बन्धियों सहित अपने प्राणों की आहुति दी थी| इस तरह श्री भैरोंसिंहजी शेखावत की सक्रियता से दुनिया के महत्त्वपूर्ण युद्धों में शुमार हल्दीघाटी युद्ध के इतिहास में फैली भ्रांतियां दूर कर इतिहास का शुद्धिकरण किया गया|

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