हम किस संस्कृति की और बढ़ रहे है ?

कुँवरानी निशा कँवर
सभ्यता और संस्कृति ,संस्कार और व्यवहार ,खान-पान और रहन-सहन,चाल-ढाल ,बोली-भाषा के आकलन से किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्त्व का या चरित्र का अनुमान लगाया जाता है |लेकिन उक्त चरित्र या व्यक्तित्त्व निर्माण में सर्वाधिक भूमिका यदि होती है तो वो है सभ्यता, संकृति और संस्कार |वैसे यह सभी शब्द सामान अर्थी तो नहीं किन्तु फिरभी है एक दुसरे के पूरक ही इसलिए हम एक शब्द संस्कृति का प्रयोग इस अध्याय में करेंगे | आज चहुँ ओर विकास और प्रगति के नाम पर अपने आपको और अति आधुनिक और ज़माने के साथ चलने के नाम पर हमारी आदर्श और प्रकार से खरी उतरने वाली वैज्ञानिक और लोकाचार की दृष्टि से भी अति उत्तम मान्यताओं को सिर्फ इसलिए छोड़ने का चलन चल पड़ा है |क्योंकि वे प्राचीन-काल से चली आरही है |हमारे महान पूर्वजों का हर प्रकार का अनुभव उसमे छिपा हुआ है और उनके जरिये हमारा मार्ग दर्शन होता है, किन्तु चूँकि वे सनातन(अति-प्राचीन काल से चली आरही) मान्यताएं है इसलिए आज हमने उनसे किनारा कर लिया है |जबकि हमारी हर मान्यता और परंपरा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारन रहा था |
मै यहाँ पूर्व-पतन काल ,या मध्य-काल में पनपी परम्पराओ के नाम पर किसी भी कुरीति ,और ढकोसले को ढ़ोने के लिए समर्थन नहीं कर रही हूँ | निश्चित रूपसे परदा-प्रथा,नारी-अशिक्षा , धर्म के नाम पर अधरम (बलि-प्रथा)बाल विवाह,विधवा के साथ अमानवीय व्यवहार,और हर शुभ कार्य से उन्हें दूर रखना ऐसी ही अनेकों कुरीतियाँ ,क्षत्रिय मान्यताये नहीं कही जासकती और इनका कोई भी राजनैतिक कारण तत्कालीन आवश्यकता होभी सकता है किन्तु आज इन्हें ढ़ोने का अर्थ है कि हमे क्षत्र-धर्म का वास्तविक ज्ञान ही नहीं है |
जिस प्रकार से कोई भी पीली वस्तु स्वर्ण नहीं होसकती इसी प्रकार कोई भी पुरानी बात या मान्यता हर हालत में ही अच्छी हो यह भी जरुरी नहीं है |किन्तु जिस प्रकार स्वर्ण का रंग होता तो पीला ही है उसी प्रकार कोई भी मान्यता सही है यह सिद्ध भी उसके लम्बे समय के अनुभव और सफलता पर ही होता है |आज बहुत से समाज जो कि पतित हो चुके थे उनके पास आधुनिकता और नव-संस्कृति को अपनाने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है क्योंकि उनकी पिछली संस्कृति गौरव शाली नहीं है |उनके लिए यह नव-संस्कृति अपक्षा कृत सुगम और फलदायी है |किन्तु जिनकी पूर्व संस्कृति गौरव-माय ही नहीं बल्कि श्रद्धा योग्य है वो भी यदि अपनी संस्कृति को केवल पुरानी समझ कर त्याग करने लगे तो बताइए कि उनका विकास और प्रगति होरही है या फिर क्षरण ,विनाश ????बहुत से समाजो में अपने पिता को काका ,कक्कू चाचा ,भाया,भाई या एनी ऐसे ही शब्द जोकि वास्तव में पिता के मूल स्थान से उन्हें निम्न बनाते है संबोधित करते थे तब उन्हें नव-संस्कृति ने पापा,डैड,जैसे शब्दों के प्रति आकर्षण नजर आया |
किन्तु जिस समाज में अपने पिता को,पिताश्री, दाताजी (दात्जी) ,बापूजीसा (बापजिसा),कुँवरसा (कौंर्सा), और साथ में हुकुम लगा कर संबोधित किया जाता रहा वो भी यदि इन नव-संस्कृति के शब्दों का इस्तेमाल करे तो निश्चित रूपसे वह समाज पहले की अपेक्षा अपने पिताश्री को निम्न स्थिति में पहुंचा रहा होगा |यह एक उदाहरन मात्र है |केवल इस संबोधन तक ही नहीं अब स्थिति बहुत ही भयावह होचुकी है अब तो वस्त्रों के प्रयोग से लेकर ,खान-पान ,चाल-चलन ,बोली भाषा और रहन -सहन सभी कुछ का तेजी से आधुनिकता ,विकास और प्रगति के नाम पर अन्धानुकरण किया जा रहा है और एक अंधी प्रतियोगिता सी चाल पड़ी है जिसका कोई लक्ष्य नहीं कोई उद्देश्य नहीं और परिणाम शायद किसी शून्य या महा-अन्धकार में लेजाये |आज हम आपस में बात करते समय अपनी मूल क्षत्रिय संस्कृति को छोड़कर हाय ,हेल्लो,बाय ,बाय ,buddy ,dude ,guys फ्रेंड्स और नजाने अनेकों ऐसे ही उलजलूल शब्दों का इस्तेमाल कर अपने को और अधिक प्रगति शील सिद्ध करने में लग गए है |और पहनावा आह हा क्या कहने ,जो पहनावा कभ नतर्कियों,गाने बजाने वालियों के थे वो आज हमारी राजपुत्रियाँ पहन रही है |
फिल्म जगत जिसमे अपने देह के प्रदर्शन को बोल्डनेस ,और गंदे दृश्य जिन्हें देखकर तो शायद गणिका भी शरमा जाये, के बलपर कुख्यात हो जाती है जिसे हम गलती से ख्याति समझने की भूलकर बैठते है |हम आज जिन्हें अपना आदर्श मान रहे है |दरअसल वे किसी भी दृष्टि से इस योग्य नहीं है |प्राचीन काल से लेकर आज तक हमारा इतिहास हमारे अनूठे क्रिया कलापों और शौर्य और दानवीरता की अनुपम उदाहरणों से भरा पढ़ा है ऐसे में हम अपने पूर्वजों और वर्तमान वास्तविक नायकों जैसे कारगिल के नायकों को छोड़ इन कल्पना लोक के अभिनेताओं को अपना आदर्श बनाने की जो भूलकर रहे है वह इस राष्ट्र ,समाज और संस्कृति के लिए बहुत भारी पड़ेगा |हम आत्मिक शांति के बजाये बाहरी सुख जिसे आमोद-प्रमोद के अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जासकता में अपने जीवन और अमूल्य चरित्र का नाश कर रहे है |
हमारी आज वो स्थिति है कि अपने घर की मिठाई(महान संस्कृति) छोड़ हम पडौशी से जूठी और सुखी रोटी(पाश्चात्य संस्कृति) को मांगकर खाने में अपनी इज्जत समझ रहे है |और इस बेवकुपी को नए ज़माने की मांग कह कर येन-केन प्रकारेण सही सिद्ध करने में लग रहे है | किन्तु जब जमाना इस और बढ़ रहा था तब हम अपनी पुराणी कुरीति और दकियानूसी ढकोसलों में फंशे हुए थे और जब आज सारा विश्व भारतीय संस्कृति की महानता का लोहा मान हमारी संस्कृति को अपनाने के लिया लालायित है |तब भी हम उस सर्वत्र असफल हो चुकी पाश्चात्य संस्कृति की गुलामी ढ़ोने और उस भौंडेपन को अपनाने के लिए कमर कसे हुए है जिससे स्वयं पश्चिम भी उब चूका है |क्या यह हमारा सम्यक ज्ञान का अभाव नहीं है | अब तो यही श्रेयष्कर है कि हम अपनी महान संकृति को ही आत्मसात कर वास्तविक प्रगति के क्षेत्र में प्रथम पंक्ति में खड़े हो | क्योंकि आज की इस विषाक्त क्षीण एवं चहूं ओर से पतन पर पहुँची दयनीय व्यवस्था के लिए निश्चित रुप से पतन की पराकाष्ठा को पार कर चुका भ्रष्ट नेतृत्व ही उत्तरदायी है !यह आप सभी से छिपा हुआ नहीं है !वर्तमान परिवेश मे जहाँ मानवीय मूल्यों के साथ आमजन का जीवन दु:भर हो गया है !इस अराजक बेलगाम, झूठ से परिपूर्ण, दुश्चरित्र शक्तियों के व्यवस्था संचालन के अनैतिक, दिशाहीन, कुकृत्यों ने संपूर्ण मानव जाति को विनाश के गहरे गर्त में गोते लगाने के लिए छोड़ दिया है! आज की इस विभत्स परिस्तिथि को यदि तुरंत रोकने का प्रयास नहीं किया गया तो वर्तमान क्षत्रिय शक्तियों का पूर्णत: लोप होने के कड़ुवे सत्य को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचेगा! और हम प्रकृति एवं मानवता पर गहराए इन काले ख़तरे के बादलों को मूकदर्शक बन कर देखते हैं तो हमारे इस क्षात्र- धर्म के विरुद्ध आचरण को निश्चय ही क्षत्रिय इतिहास में काले अक्षरों में लिखा जाएगा! समाजवेत्ता एवं भारतीय मनीषीयों को यह एकमत से स्वीकार्य है कि यदि कभी भी और कहीं पर भी मानवता एवं सृष्टि के अस्तित्व ख़तरे में हो तो इसका अर्थ है कि उस काल एवं स्थान विशेष का क्षत्रित्व सुषुप्त अवस्था में जाचुका है ! अत: आज क्षात्र तत्व की सुषुप्तता को चैतन्य करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं हो सकता !इन विषम हालातों के परिमार्जन का केवल और केवल एक ही उपाय है और वह है “क्षात्र धर्म का पुन: उत्थान” …!क्षात्र तत्व को चेतन्य करके चहुँ ओर हो रहे क्षय (विनाश) का त्राण करना यह ना केवल वर्तमान क्षत्रिय शक्तियों का दायित्व ही है बल्कि अपने पूर्वजों के यश को सुरक्षित रखने एवं आगामी पीढ़ियों के समक्ष क्षत्रिय आदर्शों को धुंधला न पड़ने देने का एकमात्र रास्ता है !
“जय क्षात्र-धर्म”
कुँवरानी निशा कँवर श्री क्षत्रिय वीर ज्योति

4 Responses to "हम किस संस्कृति की और बढ़ रहे है ?"

  1. राज भाटिय़ा   April 21, 2011 at 11:32 am

    हम उस संस्कृति की ओर बढ रहे हे, जहां सिर्फ़ बरवादी के सिवा ओर कुछ नही, अगर हम बच्चो को थोडा बहुत रोके, समझाये तो धीरे३ धीरे अंकुश लग सकता हे, लेकिन हमी नही चाहते… ओर हालात बिगड जाते हे, इसी प्रकार पुरा समाज ही उस अंधकार की ओर जा रहा हे.
    आप ने बहुत अच्छा लेख लिखा, विचारणिया.
    धन्य्वाद

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  2. प्रवीण पाण्डेय   April 21, 2011 at 5:59 pm

    सांस्कृतिक कठिनता का समय है, सब बचा कर रखना होगा।

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  3. Gajendra Singh   June 25, 2012 at 1:11 pm

    आज भी हम लोग अतीत को देख कर खुश होते है की राजपूत जाति ने राज किया था पर वास्तविकता के धरातल पर वर्तमान मे राजपूत जाति कहा पर है उसके बारे मे सोचने की आवश्कता है ? आज युवा परम्परा और संस्कार को तो भूल ही गए है
    कुँवरानी निशा कँवर नरुका जी ने बहुत अछी बात लिखी है

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  4. lakhadhirsinh   August 1, 2014 at 8:33 pm

    आज क्षत्रिय समाज के हर व्यकती अपनी संस्कृति छोड कर पश्चिम की सभ्यता की ओर बढ रहै है! तो मै उनको केहना है कि आज पृथ्वी से यौजन दुर रेहकर भी पुरी पृथ्वी को प्रकाशित करने काजिस सुयॅदेव के पास ईतना तेज होते हुवे भी जब जब सुयॅदेव भी पश्चिम में गया है तो वो भी डुबा ही है ! तो हम क्या पश्चिमीकरण से आज के युग में टिक पायेगें!

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