हमारी साझा संस्कृति में दलित सम्मान

हमारी साझा संस्कृति में दलित सम्मान

दलित उत्पीडन की ख़बरें अक्सर अख़बारों में सुर्खियाँ बनती है फिल्मो में भी अक्सर दिखाया जाता रहा है कि एक गांव का ठाकुर कैसे गांव के दलितों का उत्पीडन कर शोषण करता है | राजनेता भी अपने चुनावी भाषणों में दलितों को उन पर होने वाला या पूर्व में हुआ कथित उत्पीड़न याद दिलाते रहते है पर सब जगह ऐसा नहीं है गांवों में उच्च जातियों के लोग पहले भी दलितों को सम्मान के साथ संबोधित करते थे और अब भी करते है साथ ही अपने बच्चों को भी संस्कारों में अपने से बड़ी उम्र के लोगों को सम्मान देना सिखाते है चाहे बड़ी उम्र का व्यक्ति दलित हो या उच्च जाति का |

मैंने भी एक उच्च (राजपूत)जाति में जन्म लिया है, राजस्थान के लगभग क्षेत्र में आजादी से पूर्व राजपूत शासकों व जागीरदारों का ही शासन था इसलिए ज्यादातर राजनैतिक पार्टियाँ दलितों के उत्पीड़न का आरोप इस शासक जाति पर ही लगाते रहती है | हमारे गांव में जनसँख्या की दृष्टि से राजपूत ही बहुसंख्यक है | बचपन में हमें बुजुर्गों द्वारा यही समझाया व सिखाया जाता था कि अपने से बड़े चाहे वे दलित हो या अन्य जातियों के लोग तुम्हारे लिए सभी सम्मानीय है अतः हम गांव के किसी भी दलित को जो हमारे पिताजी से बड़ा होता था को बाबा व जो पिताजी से छोटा होता था को काका कहकर ही पुकारते थे | गांव में सबसे नीची जाति मेहतरों की मानी जाति है पर हम तो सोनाराम मेहतर को सोना बाबा ही कहकर पुकारते थे और घर पर झाड़ू के लिए आने वाली मेहतरानी को मेहतरानी जी ही कहकर पुकारा जाता था और अब भी इन्ही संबोधन से पुकारा जाता है |यही नहीं बुजुर्ग मेहतरानी के राजपूत घरों में आने पर उससे सभी छोटी राजपूत महिलाये उसके आगे झुककर हाथ जोड़कर प्रणाम कर आशीर्वाद लेती है | गांव में किसी भी दलित बेटी की शादी के अवसर पर उच्च जाति की महिलाये उसके सुहाग की कामनाओं व सलामती के लिए व्रत रखती है | यही नहीं इस तरह की परम्पराओं का कठोरता से पालन होता रहे इसके लिए बुजुर्ग लोग हमेशा ध्यान रखते है | बच्चो द्वारा किसी दलित के साथ अबे तबे करने की शिकायत पर बुजुर्ग तुरंत संज्ञान लेकर अपने बच्चों को दण्डित भी करते है |

साँझा संस्कृति में दलितों के साथ इस तरह का व्यवहार सिर्फ हमारे गांव में अकेले ही नहीं वरन राजस्थान में हमारे क्षेत्र के सभी गांवों में एक समान है | जब बचपन से ही कोई किसी का सम्मान करता आया हो क्या वो उसका उत्पीड़न कर सकता है ? या जो बुजुर्ग अपने बच्चों में ये संस्कार डालते है क्या वे उन्हें दलितों के उत्पीड़न की छुट दे सकते है ?

फिर भी अक्सर दलित उत्पीड़न की खबरे अख़बारों में पढने को मिल जाया करती है | दरअसल किसी उच्च जाति के व्यक्ति के साथ किसी दलित के व्यक्तिगत झगड़ों को आजकल जातिय रूप दे दिया जाता है | इस तरह के व्यक्तिगत झगड़ों में राजनैतिक लोग अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने के चक्कर में कूद पड़ते है और वह झगड़ा बढ़ जाता है | कई बार राजनैतिक लोग आपसी प्रतिद्वन्दता के चलते किसी को सबक सिखाने के लिए अपने समर्थक किसी दलित को इस्तेमाल कर अपने विरोधी पर उससे मुकदमा ठुकवा देते है और फिर उसकी अख़बारों में ख़बरें छपवाकर मामले को तूल दे देते है | इस तरह के मामले अक्सर पंचायत चुनावो के दौरान अधिक देखने को मिलते है | जो इस साँझा संस्कृति में जहर घोलने का कार्य कर रहें है |

15 Responses to "हमारी साझा संस्कृति में दलित सम्मान"

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.