हठीलो राजस्थान-31

लोपण पहलां पाल पर,
कोपण पहलां पेख |
रोपण चाल्यो आज थूं ,
मणधर माथै मेख ||१८४||

हे वीर ! तू शत्रु-सेना को देखने से पहले ही क्रुद्ध हो उसे सीमा प्रवेश करने से पूर्व ही ध्वंस करने के चल पड़ | इस प्रकार तू निश्चय ही मणिधर सर्प (शत्रु) के माथे पर (अपने शौर्य या विजय की) मेख रोपने जा रहा है |

जालै झाला, बिस जबर,
किण विध आवै हाथ ?
बल बिन चाल्यो बावला,
नागां घालण नाथ ||१८५||

जला देने वाली लपटें व भयंकर विषधारी सर्प को किस प्रकार पकड़ा जा सकता है ? हे पागल ! तू बिना बल संचय किए ही सांपो को पकड़ने के लिए चल पड़ा है |

दुबकै, भभकै ,फिर डसै,
बंबी पड़ीयां तांण |
हथ देतां जांणी नहीं,
भुजंग री आ बांण ||१८६||

उपरोक्त दोहे के प्रसंग में कहा गया है कि तू बांबी में हाथ डाल रहा है क्या तू सर्प की आदत नहीं जानता | बांबी पर जब आंच आती है तो विषधर पहले कुछ दुबकता है ,फिर फुफकारता है तथा अंत में डस लेता है |

दुसमण ! सुण ले सोचलै,
इण धरती मत झाँख |
खुड्को होतां सिव-धरा,
खुल जासी सिव-आँख |१८७||

हे दुश्मन ! तुम भली भाँती सोचलो और सुनलो | इस धरती की और कभी आँख मत उठाना | यह भूमि भगवान शंकर द्वारा रक्षित है | तुम्हारे आगमन की आहट पाते ही यहाँ शिव का तीसरा नेत्र खुल जायेगा अर्थात यहाँ के वीर प्रलयंकारी आक्रमण करके तुम्हे क्षण भर में ही नष्ट कर देंगे |

झगड़ा टणकी जातियां,
जीवै सदा जहान |
झगड़ो जीवण जगत रो,
विध रो अटल विधान ||१८८||

युद्ध करने वाली वीर जातियां इस संसार में हमेशा जीवित रहती है | संघर्ष ही जीवन है यह जगत का अटल विधान है |

जी सी वाही जातड़ी,
लड़सी झाड़ो झाड़ |
लडै पडै ,पड़ पड़ लडै,
पटकै अंत पछाड़ ||१८९||

संसार में वही जाति जीवित रहेगी जो कदम कदम पर संघर्ष करने को उधत है | जो जाति युद्ध करती है, पराजित होने पर फिर उठ खड़ी होती है , फिर लडती है व अंत में शत्रु पर विजय प्राप्त करती है , वही दीर्घकाल तक जीवित रह सकती है |

स्व.आयुवानसिंह शेखावत

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