हठीलो राजस्थान -2

बहु धिन भाग वसुन्धरा,
धिन धिन इणरो तन्न |
दुरगा लिछमी सुरसती ,
तिन्युं जठै प्रसन्न ||१०||

इस वसुन्धरा(राजस्थान)का भाग्य धन्य है,और इसका शरीर भी धन्य है,क्योंकि इस पर दुर्गा,लक्ष्मी और सरस्वती तीनों देवियाँ प्रसन्न है |(यहाँ पर वीरों की अधिकता से शौर्य की देवी दुर्गा की प्रसन्नता,धनवानों की अधिकता से धन की देवी लक्ष्मी की प्रसन्नता और विद्वानों की अधिकता के कारण विद्या की देवी सरस्वती की प्रसन्नता का भान होता है |

केसर निपजै न अठै,
नह हीरा निकलन्त |
सिर कटिया खग झालणा,
इण धरती उपजंत || ११||

यहाँ केसर नहीं निपजती,और न ही यहाँ हीरे निकलते है | वरन यहाँ तो सिर कटने के बाद भी तलवार चलाने वाले वीर उत्पन्न होते है |

सोनो निसरै नह सखी ,
नाज नहीं निपजन्त |
बटक उडावण बैरियां,
इण धरती उपजंत ||१२||

हे सखी ! यहाँ सोना नहीं निकलता;और न ही यहाँ अनाज उत्पन्न होता है | यहाँ पर तो शत्रुओं के टुकड़े-टुकड़े करने वाले वीर-पुत्र उत्पन्न होते है |

नर बंका,बंकी धरा,
बंका गढ़ , गिर नाल |
अरि बंका,सीधा करै,
ले बंकी करवाल ||१३||

राजस्थान के पुरुष वीर है,यहाँ की धरती भी वीरता से ओत-प्रोत है,दुर्ग,पहाड़ और नदी-नाले भी वीरता प्रेरक है | हाथ में बांकी तलवार धारण कर यहाँ के वीर रण-बाँकुरे शत्रुओं को भी सीधा कर देते है |

जुंझारा हर झूपड़ी,
हर घर सतियाँ आण |
हर वाटी माटी रंगी ,
हर घाटी घमसाण ||१४||

यहाँ पर प्रत्येक झोंपड़ी में झुंझार हो गए है,हर घर सतियों की आन से गौरान्वित है ,प्रत्येक भू-खंड की मिटटी बलिदान के रक्त से रंजित है ,तथा हर घाटी रण-स्थली रही है |

हर ढाणी,हर गांव में ,
बल बंका, रण बंक |
भुजां भरोसै इण धरा,
दिल्ली आज निसंक ||१५||

यहाँ हर ढाणी और हर गांव गांव में बल बांके और रण-बांके वीर निवास करते है | जिनके भुज-बल के भरोसे दिल्ली (देश की राजधानी) निस्शंक (सुरक्षा के प्रति निश्चिन्त )है|

स्व.कु.आयुवानसिंह शेखावत,हुडील

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