हठीलो राजस्थान -1

दीधा निज गुण देवता,
रिखियां दी आसीस |
जिण दिन सिरजी मरुधरा,
सोणी नायो सीस ||१||

जिस दिन विधाता ने इस मरुधरा (राजस्थान)का सृजन किया ,उस दिन देवताओं ने उसे अपने गुण प्रदान किये तथा ऋषियों ने आशीर्वाद दिया एवं पृथ्वी ने अपना शीश झुकाया |

धरमराज दीधो धरम,
भिखम प्रण बलवान |
विष्णु खमा शिव रोस निज ,
सुरसत वाणी दान ||२||

धर्मराज युधिष्टर ने इस राजस्थान में धर्म को व भीष्म पितामह ने दृढ-प्रण-पालन को स्थापित किया | विष्णु ने क्षमा,शिव ने अपना रोष व सरस्वती ने इसे वक्तत्व की क्षमता प्रदान की |

सूरज दीधो तेज सह,
धनपत धन गुणरास |
सतियाँ मिल सतवान की,
रजरूडी रज वास ||३||

सूर्य ने इसे अपना तेज देकर तेजस्वी व धनपति धनकुबेर ने इसे धन व गुणों का भण्डार प्रदान किया | सतियाँ ने मिलकर यहाँ सत्य धर्म की स्थापना की | इन गुणों का विकास व पालन ही इस राजस्थान की परम्परा है |

अरजण दिधि वीरता,
माधव नीती मन्त्र |
पवन तनय बल आपियो ,
द्रोण दियो रण- तंत्र ||४||

अर्जुन ने इस वीर भूमि को वीरता प्रदान की तो श्री कृष्ण ने इसे नीती का मन्त्र दिया | पवन-सुत हनुमान ने इसे अतुल बल-पराक्रम प्रदान किया तो द्रोणाचार्य ने रण नीती का पाठ पढ़ाया |

दीधी करण सुदानता,
दुरजोधन निज आण |
सीतापत सूं सीखली,
कुळ मरजादा कांण ||५||

कर्ण ने इसे अपनी दानशीलता तथा दुर्योधन ने आन पर मर मिटने की शिक्षा दी | सीतापति भगवान राम से इसने अपने कुल की मर्यादा की सीमा का ज्ञान सिख लिया |

जबरन धाड़ो दौड़ता,
दिसै ना कुछ दोस |
सुरबाला रो रूप सह,
लीधो इण धर खोस ||६||

वीर धर्म के अंतर्गत बल-प्रयोग द्वारा बलवान और सम्पन्न पर डाका डालने में एक भी दोष नहीं दिखाई देता है | इसी सिधान्तानुसार इस राजस्थान ने सुर-ललनाओं के समस्त रूप को डाका डालकर छीन लिया |

दीधा न जो देवता,
लुठा पण ही लीन |
इन्दर भाग्यो आंतरै,
अब लग बिरखाहीन ||७||

देवताओं ने जो इसे नहीं दिया ,उसे यहाँ के वीरपुत्रों ने अपने भुज-बल से बलपूर्वक ले लिया | इससे भयभीत होकर देवताओं का राजा इंद्र कहीं दूर भाग गया था | यही कारण है कि इस धरती पर आज तक वर्षा क्षीण होती है |

सुरसत आवै इण धरा ,
हंस भलां असवार |
इक हाथ वीणा बाजणी,
बीजै हथ तरवार ||८||

हे सरस्वती ! आप इस धरा पर अपने वाहन हंस पर आरूढ़ होकर आयें | आपके एक हाथ में भले ही वीणा हो ,परन्तु दुसरे हाथ में तलवार अवश्य होनी चाहिए | (क्योंकि इस वीर भूमि में आपका अवतरण बिना तलवार के शोभा नहीं देगा) |

नम-नम नाऊँ माथ नित,
सुरसत दुरगा माय |
दोन्यू देव्यां मेल इत,
सोनो गंध सुहाय ||९||

मैं नित माँ शारदा और दुर्गा के बारम्बार मस्तक नवाता हूँ | यहाँ इन दोनों ही देवियों में परस्पर अटूट प्रेम रहा है ,जो मानों सोने में सुगंध के समान है | (यहाँ विद्या और वीरता का मणि -कांचन संयोग रहा है)

श्री क्षत्रिय युवक संघ के अग्रणी नेताओं में से एक स्व.आयुवान सिंह जी शेखावत ने अपनी कलम से कई पुस्तकों के साथ “हठीलो राजस्थान ” नामक पुस्तक में ३६० दोहों का एक संग्रह लिखा | हालाँकि उनके दोहों की भाषा कठिन नहीं थी फिर भी आज के पढ़े लिखे लोगों के लिए राजस्थानी भाषा अपनी होते हुए भी परायी सी हो गयी अत: आयुवान सिंह समृति संस्थान ने उनके दोहों का संग्रह डा.नारायण सिंह जी भाटी,डा.शम्भूसिंह जी मनोहर,श्री रघुनाथ सिंह जी कालीपहाड़ी के सहयोग से हिंदी अनुवाद भी साथ में प्रकाशित किया |
हमारी कोशिश रहेगी ज्ञान दर्पण.कॉम पर स्व.आयुवान सिंह जी के इन दोहों के साथ ही उनकी अन्य रचनाओं से भी आपको रूबरू करवाने की |

क्रमश:………

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