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Wednesday, May 25, 2022

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स्वाभिमान एवं अभिमान

अभिमान की लोगो ने जितनी निंदा की है, उतनी ही प्रंशसा स्वाभिमान की गयी है !किन्तु इस स्वाभिमान का स्पष्ट चरित्र-चित्रण नहीं होने के कारन अभिमानी लोग स्वाभिमान की ढाल बना कर अपने अहंकार की रक्षा करने का कुत्सित प्रयत्न करते देखे गए है |इसीलिए स्वाभिमानी लोगो का समाज में अभाव और अभिमानी लोगो का निरंतर विस्तार होता जारहा है |जिससे व्यक्ति ,समाज व राष्ट्र सभी की छवि मलिन होती है साथ ही चारो तरफ अशांति का साम्राज्य स्थापित होता रहता है |

विद्ध्वानो ने अभिमान शब्द का अर्थ किया है ‘अपने लिए अतिशय पूजित होने की भावना “तब स्वाभिमान यानि स्व+अभिमान का अर्थ हुआ अपने लिए +अपने लिए अतिशय पूजित होने की भावना” | यह २ बार अपने लिए ,अपनेलिए शब्द का प्रयोग क्यों हुआ ,इसका रहस्य यदि हम समझने का प्रयास करे तो तो संभव है कि स्वाभिमान शब्द के अभिप्राय के नजदीक हम पहुँच सकें | संसार के सभी लोग किसी न किसी धर्म को स्वीकार करते है है यह सत्य है | और दूसरा सत्य यह है कि ३००० वर्ष पूर्व एक ही धर्म था और उस धर्म पर चलने वालों को उनके गुण ,कर्म,और उनके भाव यानि स्वभाव के अनुसार चार भागों या वर्णों में विभाजित किया गया था |उन लोगों के लिए वर्णित धर्म ,”वर्ण-धर्म”को ही “स्व-धर्म”कहा जाता था |इस प्रकार अपने अपने स्व-धर्म को लोग अपने लिए परम कल्याणकारी व महान समझते थे |उस स्व-धर्म के अभिमान,अहंकार या गौरव के नीचे अपने व्यक्तिगत अहंकार को दबा कर “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” की कल्पना के साथ कार्य-क्षेत्र में उतरते थे |
जैसा कि श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि “चरों वर्णों कि सृष्टि मैंने की है “के अनुसार व्यक्ति इस वर्ण-धर्म (स्वधर्म) को ईश्वर द्वारा प्रदत्त कर्तव्य समझकर हमेशा इसलिए आनंदमग्न रहता था की उसे पूर्ण विश्वास था की वह अपनी मर्जी या इरादे से कोई भी कार्य नहीं कर रहा है अपितु ईश्वर प्रदत्त “सुकर्म ” में प्रवृत है |

इस प्रकार के विचार या भावना का उदय होने साथ ही उसका अपने लिए पूजित होने की भावना अर्थात “अभिमान” स्वतः ही विलुप्त होजाता था ,तब उसके लिए गर्व करने के लिए शेष रह जाता था केवल उसका “स्वधर्म”|और यही अपने स्वधर्म के लिए पूजित होने की भावना ही स्वाभिमान कहलाती है |तब लोग अपने कर्म स्वधर्म को ईश्वर का आदेश मन कर करते थे और बड़े से बड़ा त्याग व बलिदान भी उन्हें स्वधर्म के आगे तुच्छ नजर अत था ,अतः स्व-धर्म के अलावा अभिमान करने लिए उनके पास अपनी कही जाने वाली अन्य कोई महिमायुक्त वास्तु शेष ही नहीं रहती थी |ऐसे लोग स्वाभिमान के साथ जीते थे और गौरव के साथ ही मरते थे |जीवन और मृत्यु दोनों ही उनके लिए न सुखमय थे और न ही दुःख मय,अपितु जीवन और मृत्यु दोनों ही उनके लिए आनंद देने वाले थे क्योंकि उनके विघटनकारी तत्व “अभिमान,अहंकार ” को उन्होंने अपने स्वधर्म के अभिमान में रूपांतरित करदिया था| अतः केवल और केवल मात्र स्वधर्म के अभिमान के लिए जीने वाले लोगो के जीवन को ही “स्वाभिमानी” कहा जासकता है|
(यह विचार श्रद्देय श्री देवी सिंह जी महार की कृति “स्वाभिमान ” से लिए गए है|)

प्रस्तुतिकरण : कुंवरानी निशाकँवर

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26 COMMENTS

  1. अभिमान और स्वाभिमान में बहुत ही बारीक़ फ़र्क होता है, बस उसे ही समझने की ज़रूरत होती है। सुंदर आलेख।

  2. प्रस्तुति अच्छी लगी । मेरे नए पोस्ट पर आप आमंत्रित हैं । नव वर्ष -2012 के लिए हार्दिक शुभकामनाएं । धन्यवाद ।

  3. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति.
    नववर्ष की आपको बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ.

    समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.

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