स्वतंत्रता समर के योद्धा : महाराज बलवंत सिंह ,गोठड़ा

स्वतंत्रता प्रयासी योद्धाओं में हाडौती क्षेत्र के महाराज बलवंत सिंह हाड़ा गोठड़ा का अविस्मर्णीय योगदान रहा है | राजस्थान के हाडौती भू -भाग के दो राज्य कोटा और बूंदी ब्रिटिश प्रभाव की वारुणी का पान कर अभय स्वापन हो चुके थे | अंग्रेज सत्ता का स्वागत कर दोनों राज्य प्रसन्न थे | किन्तु उसी समय हाडौती क्षेत्र में गोठड़ा स्थान अंग्रेजों के लिए सिर दर्द बना हुआ था | बासुकी के बिल गोठड़ा के पास जाकर बलवंत सिंह का दमन करने का अंग्रेजों का साहस नहीं हो रहा था | महाराज बलवंत सिंह दोनों हाड़ा राज्यों और अंग्रेज सत्ता तीनों की सैन्य शक्तियों के विरुद्ध ध्वज फहरा रहे थे |

गोठड़ा बूंदी राज्य के महाराव राजा उम्मेद सिंह के द्वितीय पुत्र महाराज बहादुर सिंह को पैत्रिक भू-भाग के रूप में मिला था | महाराज बहादुर सिंह के बलवंत सिंह , शेर सिंह ,दलपत सिंह तीन पुत्र थे | क्षत्रिय शासन परम्परा के अनुसार बलवंत सिंह अपने पिता की मृत्यु के बाद गोठड़ा की गद्दी पर बैठा | वह बाल्यवस्था से ही बड़ा मानधनी , दृढ संकल्पी, निर्भीक ,स्वाभिमानी और स्वतंत्रता प्रेमी व्यक्ति था | महाराज बलवंत सिंह के समय में बूंदी के सिंहासन पर उनके बबेरे भाई महाराव राजा बिशन सिंह थे | बिशन सिंह का अंग्रेजों के परम मित्र महाराज राणा जालिम सिंह झाला (झालावाड) की राजकुमारी के साथ विवाह हुआ था | जालिम सिंह बड़ा दूरदर्शी ,कुटिल मति और नीतिनिपुण व्यक्ति था | वह अंग्रेज सत्ता को हाडौती क्षेत्र में पैर ज़माने में सहायता करता था | इस प्रकार उसकी अंग्रेज शासक समर्थक नीति के कारण महाराव राजा बिशन सिंह और महाराज बलवंत सिंह में भी परस्पर मनोमालिन्य उत्पन्न हो गया |

उधर जालिम सिंह झाला के द्वारा अंग्रेज सरकार स्वाधीन चेता बलवंत सिंह का दमन करवाने पर तुली हुई थी | अत: महाराज बलवंत सिंह ने बूंदी नरेश , माधव सिंह झाला और अंग्रेजों के प्रभुत्व को चुनौती देते हुए सम्वत 1867 वि.में बूंदी के नैणवा नगर पर आक्रमण कर अपना अधिकार स्थापित कर लिया और अंग्रेजों के दोनों समर्थक बिशन सिंह और जालिम सिंह का गर्व भंजन कर दिया | तदनन्तर जयपुर राज्य के अर्द्ध स्वतंत्र उणियारा राज्य के नरुका शासक पर आक्रमण कर उसकी सेना को पराजित कर सीमावर्तियों पर अपना आतंक जमा लिया | इन सब घटनाओं से रुष्ट होकर अंग्रेजों ने बलवंत सिंह का दमन करने के लिए योजना तैयार की और महाराज बलवंत सिंह के खिलाफ आक्रमण हेतु सेना सज्जित की |

यद्दपि अंग्रेज इतिहासकारों ने स्वतंत्रता के प्रयासी भारतीय वीरों के स्वातंत्र्य संघर्षों को अपनी निर्धारित ब्रिटिश सत्ता स्थापन नीति के अनुसार छ्द्दता पूर्वक अंकित किया है | उनके चरणानुयाई भारतीय इतिहास लेखकों ने भी ऐसे युद्धों और स्वातंत्र्य प्रयासों में अपने जीवन को महत्त्व ही नहीं दिया और कहीं कहीं जो थोडा बहुत उल्लेख किया है तो अंग्रेजों और उनके पक्षधर भारतीय शासकों की दुर्नीति के कलंक से बचाकर सामान्य मात्र कर दिया है | किन्तु उस समय कुछ ऐसे विद्वान् और कवि भी थे , जिन्होंने ऐसे देश भक्त वीरों के वीर कार्यों को अपने काव्यों में चित्रित किया है | महाराज बलवंत सिंह ,उनके भ्राताओं ,पुत्रों और उनके सहयोगियों पर रचित समसामयिक काव्यों में उनके बलिदान के ओजस्वी स्वर गुंजित है |

अंग्रेज सरकार ने महाराज बलवंत सिंह को बंदी बनाने के लिए अनेक प्रयत्न किये पर स्वतंत्रता का वह सजग प्रहरी जब उनके पंजे में फंसा नहीं, तो संवत 1818 वि. में एकाएक बूंदी के केशोरायपाटन स्थान पर बलवंत सिंह को जा घेरा | वह अपने अनुज शेर सिंह तथा दो पुत्र धौंकल सिंह और फतह सिंह सहित तीर्थ यात्रा के लिए केशोरायपाटन गया हुआ था | अंग्रेजों ने महाराज राणा माधव सिंह सहित अपनी अश्व , पदाति सेना और तोपखाना को लेकर केशोरायपाटन की नाके बंदी कर बलवंत सिंह को आत्म समर्पण करने के लिए जो सन्देश भेजा उसकी अभिव्यक्ति का स्वर एक वीर गीत की दो पंक्तियों में सुनिए-

भोळा अंगरेज अळी कांई भाखै, इम आखै बलवंत अभंग |
उतबंग लार लगाया आवध , आवध री लारा उतबंग ||

महाराज बलवंत सिंह के अडिग व्रत को देखकर अंग्रेजों का साहस शिथिल पड़ गया | वे मुकाबले के लिए अपनी सेना तैयार कर सुदृढ़ मोर्चा लगाने लगे | युद्ध कोलाहल से धरा आकाश गूंजने लगे | उत्साही वीरों के भालों से आकाश ढक गया | अंग्रेज सेनानायक ने भयभीत स्वर में कहा -देखो सावधान ! नंगी तलवार उठाये वह आया बलवंत सिंह –

सघण थाट फ़ौजां बिखम कोह रचियो, समर छोह भालां डंमर गैण छायो |
करो गाढा जतन बेग साएब कहै , ऊ बढी तेग बळवंत आयो ||

अंत में महाराज बलवंत सिंह ने स्वतंत्रता का किसी भी मूल्य पर विक्रय करना स्वीकार नहीं किया और अंग्रेज सत्ता , उनके समर्थकों और उनकी संयुक्त सेना की तनिक भी परवाह न करते हुए स्पष्ट उत्तर भेजा –

सुण बचन चखां नींद असळाकतौ, अनड खैग हांकतौ जुध अधायौ |
चाव भुज बळां सौणित अजब चाखतौ , आखतौ खळां सिर गजब आयो ||

अंग्रेजों के दूत के मुख से आत्म समर्पण करने का वचन सुनते ही वह स्वतंत्रता -भिलाषी नर शार्दुल क्रुद्ध हो उठा और आलस्य जनित निंद्रा त्याग कर युद्धार्थ अधीर हुआ अपने अश्व को अंग्रेज सेना की दौड़ा चला | उत्कंठा पूर्वक और शोणित का स्वाद चखता हुआ शत्रु सेना पर झपट पड़ा | स्वतंत्रता के पुजारी बलवंत सिंह ने आत्म समर्पण तो अलग रहा पर अंग्रेजों से किसी प्रकार का संधि -समझौता तक स्वीकार नहीं किया | उसने उग्र शब्दों में घोषणा करते हुए कहा – जब तक मैं अपनी तीक्षण तलवार से अंग्रेजों के सिरों का छेदन नहीं करूँ तब तक मुझे जरा भी चैन नहीं पड़ेगा –

इम बोलै तोलै खग आचां , अण बोलै चहुआण अनै |
अंग्रेजां धड सीस उतारुं , मारु जद आळगै मनै ||

भारतीय स्वतंत्रता के अपहरण कर्ता अंग्रेजों ने स्वतंत्रता संग्राम के होता महाराज बलवंत सिंह की दृढ प्रतिज्ञा जानकार आक्रमण कर दिया –

अंग्रेजां सुणतां खबर सज फ़ौज सस्सतर |
मिळिया झाला माधवेस छळिया मूंछां कर ||

उसी समय महाराज बलवंतसिंह ने अपने भाई शेरसिंह ,पुत्र धौंकलसिंह तथा फतहसिंह सहित अपने घोड़ों की बांगे उठाई | वे चारों योद्धा रिपु सेना पर यूँ चढ़े ज्यों सघन वन पार्वत्य , उपत्यका में ललकारने पर दहाड़ मार कर सिंह झपटता है –

कढो कढो इम बबकिया , धकिया क्रोधंगर |
जांण अझाड भाखरा दाकळिया दुच्छर ||
हाडा चहूं हकारिया गाढा धमगज्जर |
सुत धुंकळ , फ़तमाल , सेर- बांधव रोसावर ||

गोलों के प्रहारों की झड़ी लग गई , शत्रु सेना का साहस टूटने लगा | विपक्षी सैनिक प्राणों के भय से अपने इष्ट अल्लाह और पैगम्बर का स्मरण करने लगे | गोरांग सैनिकों के मारे जाने से सैन्य बल विचलित होने लगे | हिन्दू योद्धा हर-हर महादेव के घोष करने लगे | कितने ही शत्रु प्राण शून्य रणभूमि पर गिर पड़े और कतिपय घायल मरणासन्न तडफने लगे | अंग्रेज सेना की तत्कालीन कथित अवदशा श्रुत्य है –

सरडक गोळा सकसकै ,अकबक्करै अरिहरर ,
केक मुसल्ला ऊचरै अल्ला पैगम्बर |
फ़ौज हरै गोरा कटै हिन्दू रटै हर-हर ,
तडफ़ै केक तमोगुणी , हडफ़ें कर होफ़र ||

बलवंतसिंह ने बज्राग्नी तुल्य अपनी भयंकर तलवार के प्रहारों से अंग्रेजों को मारकर धराशायी कर दिया | वीर शेरसिंह का शिरस्त्राण कट कर वह भी अपने घोड़े सहित रणभूमि में अंनत नींद सो गया |

बाही खाग बळूंतसिन्घ ,बजराग बरोबर ,
केक मुसल्ला काटियां अंगरेज अथाहर |
कट असवार झिलम टोप घोडा पख्खर ,
जूटो सेरो जोरवर तिम तूटो बजर ||

शेरसिंह ने अपने जीवन की स्वातंत्र्य यज्ञ में आहुति देकर वीरलोक का पथ लिया | वह एकाकी हजारों योद्धाओं से घिर कर महावीर अभिमन्यु की भांति शौर्य प्रदर्शित कर जूझ मरा- इस संबंध में एक कवि का सौरठा-

सेरो जाणे सेर , थाहर सूं उठियो थको |
घण दळ दोयण घेर , साम्यां तैं बहादुर सुतन ||
सेरो सोह संसार , जननी सूर न जनमियो |
हेकण और हजार , हेकण कांनी हेकलो ||
घणचक लीधो घेर अणचक आयर ऊपरां |
सारां पहली सेर , धज्वडियो धारां चढ्यो ||

शेरसिंह के कट मरते ही वीर धौंकलसिंह और फतहसिंह ने अपने घोड़े अंग्रेज सेना की सुदृढ़ पंक्ति की और बढाए | तलवारों की तीक्षण धाराएं शत्रुओं की पैनी धाराओं से टकराने लगी | गर्व से उभय वीरों के मस्तक मानो आकाश तक जा लगे | बाणों की बौछारों की सनन सनन ध्वनी होने लगी | महादेव रण कौशल देखकर अट्टहास करने लगा –

सुत धूंकळ फ़तौ लडै सिर भिडै अधन्तर |
बाढ झडै बीजूजळां हड-बडै महेसर ||
लोथ-लोथ ऊपरां खड – खडै वडफ़्फ़र |
गाज त्रमाटां गड – गडै सड- सडै सर ||

रणभूमि रक्त प्लावित हो गयी | युद्ध स्थली में वीरों के शवों के अम्बार लग गए | तोपों के गोलों से भूमि छलनी हो गयी –

ललन्भी फ़ौजां हुई जम्मी रातम्बर |
नंद बहादुर नेतबंद , खळखंद खयंकर ||
पाड खळां पडियो पटेत भुज बळां भयंकर |
सह्तो बेटां बांधवां बरियाम बधोतर ||

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के राजस्थान में शुभारम्भ के लिए संवत 1881 वि.की कार्तिक पूर्णिमा का दिवस एक ऐतिहासिक तिथि है | वीर बलवंतसिंह ने उसी दिन एकाकी अपनी व्यक्तिक शक्ति से ब्रिटिश सत्ता को चुनैती देकर अपने प्राणों का बलिदान किया था –

संवत अठार इक्यासिये , मंड जुध कातिक मांय |
बलवंत हाडो वीसम्यौ , पून्यो रवि दिन पाय ||

इस प्रकार आजादी के लिए वीर महाराज बलवंतसिंह ने सन 1857 के प्रथम भारतीय स्वाधीनता समर का बीज संवत 1881 वि. में वपन कर दिया था | अत: प्रथम भारतीय स्वाधीनता संग्राम के योद्धाओं के स्मरण की पुनीत बेला में उस पथ को ससाहस प्रशस्त कर अग्रेसर करने वाले पूर्वर्ती वीरों का स्मरण कर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करना हमारा परम कर्तव्य है | सन 1857 की क्रांति का पौधा बलवंतसिंह जैसे स्वाधीनता प्रेमी वीरों के मज्जा ,मांस ,रक्त और अस्थियों का खाद ,जल पाकर पुष्ट हुआ था | उस अंकुर को उगाने वाले बलवंतसिंह को हमारा बार-बार अभिनन्दन |

लेखक: ठाकुर सोभाग्य सिंह शेखावत,भगतपुरा (राज.)

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9 Responses to "स्वतंत्रता समर के योद्धा : महाराज बलवंत सिंह ,गोठड़ा"

  1. Udan Tashtari   April 20, 2010 at 2:35 am

    बहुत उम्दा आलेख..आभार इसे प्रस्तुत करने का.

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  2. ताऊ रामपुरिया   April 20, 2010 at 5:05 am

    बहुत सुंदर और सशक्त.

    रामराम.

    Reply
  3. Shekhar Kumawat   April 20, 2010 at 6:32 am

    aabhar is janjkari ke liye

    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

    Reply
  4. प्रवीण पाण्डेय   April 20, 2010 at 6:38 am

    राजस्थान के बारे में ज्ञान बढ़ रहा है ।

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  5. आशुतोष दुबे   April 20, 2010 at 9:22 am

    bahut accha lekh hai .jaankaari dene ke liye dhanywaad.
    हिन्दीकुंज

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  6. राज भाटिय़ा   April 20, 2010 at 10:48 am

    बहुत सुंदर जी,धन्यवाद

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  7. नरेश सिह राठौङ   April 20, 2010 at 12:14 pm

    बहुत अच्छी श्रंखला चल रही है | बहुत अच्छा होता यदि ये लेख आप राजपूत वर्ल्ड पर लिखते |

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  8. महाराजा बलबन्त सिंह को श्रद्धांजलि।

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  9. मिहिरभोज   September 23, 2010 at 4:42 am

    नमन

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