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स्त्री हूँ

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क्षणों के कांटे सी हूँ मैं

हर क्षण धुरी पर परिक्रमा मेरी

वक़्त बदल देती हैं मेरी परिक्रमा

क्षण घंटे दिन बदले

साल सदियां गुजर गई

पर मेरी परिक्रमा का अंत नहीं

परिक्रमा नियति हैं मेरी

पर बदलना स्वभाव नहीं

तुम मुझ से बने हो मैं तुम से नहीं

तुम्हारा सम्पूर्ण होना मुझ पर निर्भर हैं

अगर क्षण भर भी रुक जाऊ तो

धकेल दूं तुम्हें उतने वक्त के लिए पीछे

तुम्हारा वजूद मुझ से हैं

और वजूद के बिना तुम कुछ नहीं

स्त्री हूँ परिक्रमा नियति हैं मेरी

बदलना मेरा स्वभाव नहीं.

उषा राठौड़

11 COMMENTS

  1. वाह ! क्या बात है उषा ..नारी से ही जनित यह संसार है ..नारी नहीं तो कुछ नहीं ..सारा संसार बेकार है ….तुम्हारे शब्द बहुत ही उम्दा है…..

  2. और परिक्रमा चलती रहेगी क्योंकि स्त्री ही वो शक्ति है जो सक्षम है परिक्रमा करने के लिए

  3. दो-एक बार मैंने वर्तनी की अशुध्दियों की ओर संकेत किया था तो आपने वे अशुध्दियॉं जाननी चाही थीं। किन्‍तु तब मैं 'कॉपी-पेस्‍ट' नहीं कर पाया था। आज कर पाया हूँ तो बताने का साहस कर रहा हूँ –

    वक़्त 'बदल देती हैं' मेरी परिक्रमा –
    मेरे मतानुसार यह पंक्ति इस तरह होनी चाहिए थी –
    वक्‍त बदल देता है मेरी परिक्रमा
    (मूल पंक्ति में 'हैं' में अनुस्‍वार प्रयुक्‍त किया है जो उचित नहीं है।)

    परिक्रमा नियति 'हैं' मेरी – इस पंक्ति में भी 'हैं' में अनुस्‍वार प्रयुक्‍त किया है जो उचित नहीं है।

    तुम्हारा सम्पूर्ण होना मुझ पर निर्भर 'हैं' – इस पंक्ति में भी 'हैं' में अनुस्‍वार प्रयुक्‍त किया है जो उचित नहीं है।

    अगर क्षण भर भी रुक 'जाऊ' तो – इस पंक्ति में 'जाऊ' पर अनुस्‍वाकर प्रयुक्‍त किया जाना चाहिए था – 'जाऊँ'

    तुम्हारा वजूद मुझ से 'हैं' – इस पंक्ति में भी 'हैं' में अनुस्‍वार प्रयुक्‍त किया है जो उचित नहीं है।

    स्त्री हूँ परिक्रमा नियति 'हैं' मेरी – इस पंक्ति में भी 'हैं' में अनुस्‍वार प्रयुक्‍त किया है जो उचित नहीं है।

    आशा (और प्रार्थना) है – अन्‍यथा नहीं लेंगे। अच्‍छी रचनाओं में ऐसी अशुध्दियॉं, 'केसरिया भात में कंकर' जैसा कष्‍ट देती हैं।

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