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सीकर आन्दोलन सन् 1938

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history of sikar in hindi

सीकर आन्दोलन सन् 1938 (  ठाकुर सुरजन सिंह जी-झाझड के संसमरणों से) : सन् 1938 में शेखावाटी में एक इतिहास प्रभावी आंदोलन छिड़ गया था। राव राजा कल्याण सिंह सीकर को बंदी बना कर जयपुर ले जाने के विवाद पर सैनिक युद्ध का सा दृश्य उपस्थित हो गया था। सीकरवाटी के सभी स्वामिभक्त राजपूत और क्यामखानीयों ने सशस्त्र सीकर पंहुच कर गढ़ में तथा शहर में अपनी चौकियां स्थापित कर ली थी। सीकरवाटी के सभी सेठ साहुकारों ने और ब्राह्मणों ने चाहे वे देश में रहें हो या कलकत्ता बॉम्बे आदि दूरस्थ स्थानों पर रहे हों मनसा वाचा कर्मणा आंदोलन को मजबूत बनाने में योगदान दिया था। जाट जाती के अधिकांश मानते नेता भी उस आंदोलन में शामिल होकर सीकर गये थे।

उस कालखंड में अपनी दृढता , स्पष्टवादिता और वीरता के लिए प्रसिद्ध झुंझनूं पंचपाना के अलिसर के ठाकुर चंद्र सिंह भी उस युद्ध के मोरचे में शामिल होने 5-7 राजपूतों के साथ सीकर गढ में विद्रोही बने सीकर वाटी के राजपूतों में मिल गये थे।वृद्धावस्था आ चुकी थी किन्तु ठाकुर चंद्र सिंह जाती के स्वत्व रक्षार्थ कार्यों में बिना बुलाये सहर्ष भाग लेते थे। इसी प्रकार खूड ठिकाने के युवा ठाकुर मंगल सिंह भी सशस्त्र हो कर सीकर गढ़ में पंहुच चुके थे। सीकर शहर में जगह जगह इकठ्ठे हुये आंदोलनकारियों के भोजन का प्रबंध सीकरवाटी के सम्पन्न सेठ साहुकार कर रहे थे। जयपुर महाराजा की तरफ से बिसाऊ के ठाकुर बिशन सिंह , डूडलोद के ठाकुर हरनाथ सिंह व नवलगढ़ के ठाकुर मदन सिंह भी एक दो बार सीकर गये और राव राजाजी को जयपुर जा कर दरबार के पास चले जाने के लिये समझाया था।परंतु आंदोलन कारियों सीकर में स्थापित प्रभाव के सामने रावराजा जाने को तैयार नहीं हुए। जयपुर के पुलिस इंस्पेक्टर जनरल मि.यंग  राज्य पुलिस दल के साथ सीकर पंहुच चुका था। उसकी मदद पर कछवाहा होर्स दल के दस्ते भी भेजे गए थे, जिन्होंने सीकर नगर के दक्षिण पूर्व की कोण की दिशा में खुले टीलों वाले मैदान में कैम्प लगा रखा था। सीकर के व्यक्ति का नगर से बाहर और बाहर का नगर के भीतर आना जाना प्रतिबंधित था। आने जाने में पूर्ण प्रतिरोध था। सीकरवाटी से बाहर के उदयपुरवाटी,अमरसरवाटी आदि के राजपूत जत्थों का सीकर प्रवेश  राज के अश्वारोही सैनिक दल ने बंद कर दिया था। सीकर के बाहर कई स्थानों पर दोनों पक्षों में छुटपुट मुठभेड़ं भी हो रही थी। कई लोग हताहत हो रहे थे। उक्त संदर्भ की एक घटना उल्लेखनीय है-

अमरसरवाटी के गावों से भोमियों के दल सशस्त्र हो कर सीकर के अपने भाईयों की मदद् हेतु रवाना हुये थे। ये लोग दोराला महरौली, नाथूसर आदि गांवों के उग्रसेणजी शाखा के शेखावत थे। जयपुर से सीकर की तरफ आने वाली रेलगाड़ी में वे स्वयंसेवी रींगस स्टेशन पर सीकर जाने के लिये सवार हुये। वहां पर बड़ी संख्या में उपस्थित जयपुर पुलिस दल ने उन्हें रेल में सवार होने से रोका फिर भी उनमें से अनेक जोशीले राजपूतों ने प्रवेश पा लिया- उन्हें बार-बार घोषणा कर के राजज्ञ्या ऊलंघन न करने की चेतावनी दी गयी। परंतु मरने मारने पर उद्यत उन वीरों ने उन चेतावनियों की तनिक भी परवाह नहीं की। वे तो शस्त्र सज्जित हो कर मरने मारने को ही तो चले थे। रींगस से छूटी रेलगाड़ी के गौरियां रेलवे स्टेशन पहुंचने पर उन्हें फिर चेतावनी दी गयी कि रेल से उतर कर चले जांये। उनमें से एक भी रेल से नहीं उतरा। तब तो इन दो डिब्बों में सवार इन स्वयं सेवको को उन डब्बों में लॉकअप कर दिया गया। सीकर रेलवे स्टेशन के दोनों पार्शवों पर सशस्त्र पुलिस दल तैयार खडा था।प्लेटफॉर्म पर पुलिस तथा कई सैन्य अधिकारीयों के साथ इंस्पेक्टर जनरल मि. यंग स्वयं खड़ा था। रेलवे के उन डिब्बों के प्लेटफार्म पर  पहुचते ही – उन्हें आत्मसमर्पण की चेतावनी दे कर डिब्बों पर बंदूकों के फायर खोल दिये । कई राजपूत तो डिब्बों के अंदर ही मारे गये- कईयों ने डिब्बों से कूदकर बाहर खड़े पुलिस दल का मुकाबला किया और उनकी गोलियों से क्षतविक्षत हो कर मृत्यु को प्राप्त हुये। कलकत्ता से अंग्रेजी में प्रकाशित उस काल के प्रसिद्ध दैनिक अमृतबाजार पत्रिका में एक अंग्रेज विजीटर ने जो उस काल सीकर रेलवे प्लेटफार्म पर उपस्थित था – ने उस घटना का आंखों देखा पुरा चित्रण अपने विवरण में किया है। उसने लिखा –

“उन डिब्बों के अंदर बंद उन राजपूतों ने गोलियों से आहत होने पर भी डिब्बों से बाहर निकल कर उनको मारने को उपस्थित पुलिस दल से ऐसा भंयकर संघर्ष किया जो अद्वितीय था और उल्लेख नीय है।एक दीर्घ काय वृद्ध राजपूत योद्धा का शरीर यद्यपि गोलियों से बिंध गया था- परंतु वह गिरा नहीं और तलवार का वार करता सामने आने वाले को काटता आगे बढता ही चला गया, यहां तक कि वह मि. यंग के पास पंहुच गया – यदि मि. यंग अपनी रिवाल्वर के फायरिंग से उसे धराशायी न करता तो शायद वह स्वयं भी उस योद्धा के हाथों मारा जाता। उन राजपूतों के मृत्यु दृश्य को देखकर मुझे टाॅड के इतिहास में विचित्र राजपूतों की वीरता याद आ गयी। रेलवे प्लेटफार्म पर उपस्थित जयपुर राज्य के पुलिस अधिकारीयों ने उन वीरों की मृत्यु पर आश्चर्य प्रकट किया और उनकी दृढता की सराहना की ।”

अंग्रेजी दैनिक अमृत बाजार पत्रिका कलकत्ता में सीकर रेलवे प्लेटफार्म पर हुये उस गोली काण्ड का विस्तार से वर्णन प्रकाशित हुआ था।

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