सालिम सिंह की हवेली को बनाने वाले की क्रूरता व गद्दारी का इतिहास

आपने जैसलमेर के पर्यटन मानचित्र पर सालिम सिंह की हवेली के चित्र खूब देखे होंगे| आपके जो मित्र जैसलमेर घूमकर आ चुके है उनके मुंह से भी सालिम सिंह की हवेली के बारे में भी खूब सुना होगा, इन्टरनेट पर भी इस हवेली के निर्माण व इसकी खूबसूरती पर आपको ढेरों जानकारियां व सुन्दर चित्र मिल जायेंगे| पर आज हम बताएँगे इस सालिम सिंह की हवेली को बनवाने वाले जैसलमेर रियासत के प्रधान मंत्री महाभ्रष्ट सालिम सिंह का खुनी इतिहास| बहुत कम लोग जानते है कि दुष्ट सालिमसिंह ने इस हवेली में रहते हुए बहुत ही निकृष्ट कार्य किये थे| उसका दिमाग हर वक्त षड्यंत्र रचने में रचने में लगा रहता था| उसके दामन अनगिनत निर्दोषों के खून से रंगा हुआ था| आपको जब सालिम सिंह  माहेश्वरी व उसके पिता स्वरूप सिंह माहेश्वरी के भ्रष्टाचार व षड्यंत्रों का पता चलेगा तो आपके मन में इस सुन्दर सालिम सिंह की हवेली के प्रति नफरत पैदा हो जाएगी|

आपको बता दें सालिम सिंह मेहता माहेश्वरी वैश्य था, उसका पिता स्वरूप सिंह मेहता भी जैसलमेर के रावल मूलराज का प्रधान था| असली भ्रष्टाचार की शुरुआत स्वरूप सिंह ने ही की थी और उसके भ्रष्टाचार व षड्यंत्रों से जैसलमेर के लगभग सभी सामंतों दुखी थे| स्वयं जैसलमेर राज्य का राजकुमार रायसिंह इस भ्रष्ट मंत्री से राज्य को छुटकारा दिलवाना चाहते था और इसी उद्देश्य के लिए एक दिन भरे दरबार में अपने पिता के सामने राजकुमार ने इस नीच और महाभ्रष्ट वैश्य मंत्री की हत्या कर दी| बदली परिस्थितियों में राजकुमार को देश छोड़ना पड़ा और स्वरूप सिंह मेहता का पुत्र सालिम सिंह जैसलमेर का प्रधान बन गया| अपने पिता की हत्या के वक्त सालिम सिंह ग्यारह वर्ष का था और बाल्यकाल से ही उसके मन में अपने पिता की हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों से बदला लेने की भीषण आग भरी हुई थी|

राज्य का प्रधान बनने के बाद सालिम सिंह मेहता ने बिना वीरता प्रदर्शित किये कूटनीति व क्रूर षड्यंत्रों के सहारे अपने एक एक विरोधियों को मारने का  खेल शुरू किया| सालिम सिंह मेहता व्यक्तिगत रूप से औरताना किस्म का, अत्यंत दिखावटी विनम्र, लचीला व शिष्टव्यवहार करने वाला शातिर व्यक्ति था| इन षड्यंत्रों में लालच देकर आपसी झगड़े करवाकर एक दुसरे की हत्या करवाना, विष दिलवाकर हत्याएं कराना शामिल है|  इस व्यक्ति ने जिसका नमक खाया, उसी के साथ गद्दारी करते हुए उसी के परिजनों को एक एक कर बेहरमी से कत्ल करवाया दिया जो इसकी दुष्टता के स्तर को दर्शाता है| इस दुष्ट ने जैसलमेर के रावल मूलराज जिन्होंने इसे अपने राज्य का प्रधान पद दे रखा था, उनके पुत्रों, पौत्रों, पुत्रवधुओं, पौत्र वधुओं को षड्यंत्र कर मरवा डाला जो इसकी नीचता, दुष्टता की पराकाष्ठा थी|

आपको बता दें जैसलमेर के पास एक फलता फूलता कुलधरा नगर आज उजाड़ और वीरान पड़ा है| इस नगर के पालीवाल ब्राह्मण जैसलमेर जैसे सूखे जगह इलाके में भी खेती अन्न पैदा करते थे, पर इस दुष्ट सालिम सिंह मेहता की वजह से उन्होंने रातों-रात गांव खाली कर दिया और दूर चले गए| आज उजड़ा कुलधरा मूक रहकर भी आने वाले हर पर्यटक को इस नीच, गद्दार की दुष्टता भरी कहानी सुना रहा है|

ये दुष्ट एक बार जोधपुर से आते समय रास्ते में विद्रोही राजपूतों द्वारा पकड़ लिया गया| आपको बता दें इन राजपूतों को इसी दुष्ट मंत्री के कारण विद्रोही बनना पड़ा था और जैसलमेर राज्य त्यागना पड़ा था, लेकिन तब इस दुष्ट ने अपनी गर्दन पर तलवार का वार होने से पहले अपनी पगड़ी विद्रोही राजपूतों के पैरों में रख दी व प्राणों की भीख मांगी| तब विद्रोहियों के नेता भाटी प्रमुख ने राजपूती परम्परा का पालन करते हुए इसे छोड़ दिया| एक महादुष्ट व नीच व्यक्ति को इस तरह छोड़ने पर उन राजपूतों के विशिष्ट चरित्र का अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनका चरित्र कितना ऊँचा और महान रहा होगा| हालाँकि इस दुष्ट को छोड़ते समय वहां उपस्थिति कई लोगों ने भविष्यवाणी भी की थी कि यह दुष्ट आज अपनी जान बचाने के लिए कितने ही वादे करे पर जैसलमेर पहुँचते ही अपनी घटिया हरकतों से बाज नहीं आयेगा और हुआ भी यही इस व्यक्ति ने जैसलमेर पहुँचने के बाद अपनी क्रूर व घटिया हरकते मरते दम तक नहीं छोड़ी|

तो ये थी सालिम सिंह की हवेली में रहने वाले दुष्ट, महाभ्रष्ट और नीच व्यक्ति की असली कहानी, जिसने विरोधियों के साथ जैसलमेर राजपरिवार के हर उस व्यक्ति की हत्या करवा दी जिससे उसे भविष्य में चुनौती मिल सकती थी या फिर जो उस नीच की किसी बात से सहमत नहीं होता था| इस व्यक्ति ने जनता के साथ ही नहीं, अपने स्वामी के साथ भी गद्दारी करने का रिकार्ड बना डाला|

नोट : कई व्यक्तियों को अपने जातीय बंधू के कुकृत्य वाली इतिहास की पोस्ट पढ़कर मिर्ची लगती है और वे उल-जलूल टिप्पणियाँ करते है| ऐसे व्यक्ति सालिम सिंह माहेश्वरी के कुकृत्य पढने के लिए कर्नल टॉड द्वारा लिखित व डा. ध्रुव भट्टाचार्य द्वारा अनुवादित “राजस्थान का पुरातत्व एवं इतिहास पुस्तक भाग-2 के पृष्ठ संख्या 574 पर पढ़े सारे सबूत मिल जायेंगे| उक्त पुस्तक राजस्थानी ग्रंथागार पर उपलब्ध है जिसे आप यहाँ से ऑनलाइन मंगवा सकते हैं|

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