सामाजिक संगठनों पर समाज की ठेकेदारी का आरोप कितना उचित ?

सामाजिक संगठनों पर समाज की ठेकेदारी का आरोप कितना उचित ?

सामाजिक संगठनों पर समाज की ठेकेदारी करने का आरोप अक्सर समाज बंधू लगाते रहते हैं | सोशियल मीडिया आने के बाद समाज बंधुओं द्वारा सामाजिक संगठनों के खिलाफ रोष और ठेकेदारी के आरोप बढ़ें हैं, जिनकी जिनकी तादात चुनावों व विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर नजर आती है | पर सामाजिक संगठनों पर इस तरह के समाज की ठेकेदारी करने के आरोप कितने उचित हैं ? कितने अनुचित है ? इस पर विचार करना समाज के हर आयु वर्ग के लोगों के लिए जरुरी भी है|

हाल ही सम्पन्न हुए लोकसभा चुनावों में विभिन्न लोकसभा क्षेत्रों में करणी सेना के विभिन्न धड़ों द्वारा समर्थन देने के बाद, खासकर नागौर में हनुमान बेनीवाल का विरोध करने बाद समाज के विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं से ओतप्रोत बंधुओं ने लोकेन्द्रसिंह कालवी, सुखदेव सिंह गोगामेड़ी, महिपाल सिंह मकराना आदि विभिन्न सामाजिक नेताओं पर समाज की ठेकेदारी के आरोप लगे| दरअसल इन लोगों ने भाजपा समर्थित प्रत्याशी हनुमान बेनीवाल पर राजपूत विरोधी होने का आरोप लगाते हुए उसका विरोध किया और समाज से हनुमान बेनीवाल के खिलाफ वोट देने की अपील की|

यही अपील भाजपा विचारधारा वाले समाज बंधुओं को रास नहीं आई और उन्होंने सोशियल मीडिया पर समाज की ठेकेदारी करने का आरोप लगाया| ठीक इसी तरह इन नेताओं द्वारा जब कहीं कांग्रेस के खिलाफ अपील की जाती है तब कांग्रेसी विचारधारा वाले समाज बंधू आरोप लगाते हैं| पर क्या आरोप लगाने वालों ने कभी सोचा कि किसी भी सामाजिक संगठन द्वारा किसी के पक्ष में, किसी के विरोध में अपील जारी करना, या समाज से अनुरोध करने पर ठेकेदारी कैसे हुई ? यदि करणी सेना के गुटों द्वारा समाज में सन्देश देना ठेकेदारी है तब भाजपा व कांग्रेस के राजपूत नेता किसी मुंह से समाज से वोट मांगते है| क्या यह ठेकेदारी नहीं ?

एक बात और जब कोई सामाजिक मुद्दा होता है कोई संगठन सामने नहीं आता तब यही आरोप लगाने वाले रुदाली करने हुए प्रश्न करते हैं कि कहाँ गए वे समाज के ठेकेदार ? कालवी कहाँ है ? सुखदेव सिंह कहाँ ? और जब सामाजिक संगठन किसी मुद्दे पर उतर आते हैं और मुद्दा अपनी पार्टी के खिलाफ लगने पर वे ही समाज बंधू इन सामाजिक संगठनों पर समाज की ठेकेदारी का आरोप लगाते हैं|

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