सलवटे

सलवटे


क्या लिखू क्या न लिखू , कलम ये ख़ामोश हे !
गिर गया आंख से आंसू सलवटे हे फिर कागज़ पे !
क्या लिखू क्या न लिखू ………..
लिखने बेठा जो में हाल मेरे दिल का !
रुका न अश्क पलकों से गिरा वो दिल की कब्र पे !
सुलग उठे वो अरमा सोये दिल के महरबान !
किया मुझको परेशा फिर बीती यादों के सायों ने !
क्या लिखू क्या न लिखू ………..
दिल में यादे सजी ह सपने आखों में अब भी हे !
फिर भी तेरी कसम शिकवा कोई लब पे नहीं हे !
ख़ुशी के वो चंद लम्हे अब भी आखों में चुभते हे !
समेटे दर्द मुहबत का पलकों से गिरते हे !
क्या लिखू क्या न लिखू ………..
मत सजाओ पलकों में छलक जायेगे ये सपने !
यादे जब सताएगी अश्क बन के गिर जायेगे !
महज़ पानी की बूंद ह समझो तो मन का सकून हे !
टप टप ये गिरे इनमे कोई शिकवा जरुर हे !
क्या लिखू क्या न लिखू ………..
ना लब ये खुले न आवाज़ ही निकली!
गिरा अल्फाज़ बनके अश्क कागज़ की इन लकीरों पे !
बया कर गया हाल दिल का बेरहम सलवटे बन कर !
क्या लिखू क्या न लिखू ………..

17 Responses to "सलवटे"

  1. नरेश सिह राठौड़   September 13, 2010 at 6:40 am

    महज़ पानी की बूंद ह समझो तो मन का सकून हे !… बहुत सुंदर पक्तिया है |

    Reply
  2. ओशो रजनीश   September 13, 2010 at 6:50 am

    दिल में यादे सजी ह सपने आखों में अब भी हे !
    फिर भी तेरी कसम शिकवा कोई लब पे नहीं हे !
    ख़ुशी के वो चंद लम्हे अब भी आखों में चुभते हे !
    समेटे दर्द मुहबत का पलकों से गिरते हे !

    अच्छी पंक्तिया लिखी है आपने …

    इसे पढ़कर अपनी राय दे :-
    (आपने कभी सोचा है की यंत्र क्या होता है ….?)
    http://oshotheone.blogspot.com/2010/09/blog-post_13.html

    Reply
  3. Rajul shekhawat   September 13, 2010 at 7:21 am

    मत सजाओ पलकों में छलक जायेगे ये सपने !
    यादे जब सताएगी अश्क बन के गिर जायेगे
    really niceeeeeeeeee………:)

    Reply
  4. POOJA...   September 13, 2010 at 8:02 am

    bohot khoob…

    Reply
  5. Mahavir   September 13, 2010 at 8:19 am

    niceee. rachna

    Reply
  6. Ratan Singh Shekhawat   September 13, 2010 at 8:23 am

    बढ़िया पंक्तियों के साथ शानदार रचना

    Reply
  7. Uncle   September 13, 2010 at 8:25 am

    pichhli baar ki trh is baar bhi Nice

    Reply
  8. राज भाटिय़ा   September 13, 2010 at 8:43 am

    गिरा अल्फाज़ बनके अश्क कागज़ की इन लकीरों पे !
    बया कर गया हाल दिल का बेरहम सलवटे बन कर !
    क्या लिखू क्या न लिखू ………..
    बहुत सुंदर रचना जी

    Reply
  9. मो सम कौन ?   September 13, 2010 at 9:51 am

    बहुत सुन्दर पंक्तियां।

    Reply
  10. sunshine   September 13, 2010 at 9:55 am

    अच्छी है..पंक्तियाँ
    पर
    शिकवा तो जरूर है.;
    " और सुन्दर हो सकती थी –ये कविता.

    Reply
  11. ZEAL   September 13, 2010 at 5:19 pm

    सुन्दर पंक्तियां।

    Reply
  12. प्रवीण पाण्डेय   September 13, 2010 at 5:49 pm

    द्वन्द का काव्य स्वरूप।

    Reply
  13. Pagdandi   September 14, 2010 at 2:56 am

    bhut khubsurat kavita h .bdhai

    Reply
  14. वाणी गीत   September 14, 2010 at 3:17 am

    महज़ पानी की बूँद समझो तो ही मन का सुकून है …
    सुन्दर !

    Reply
  15. Udan Tashtari   September 14, 2010 at 3:50 am

    बहुत उम्दा!

    हिन्दी के प्रचार, प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है. हिन्दी दिवस पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं साधुवाद!!

    Reply
  16. Rambabu Singh   September 14, 2010 at 4:37 pm

    बहुत सुन्दर पंक्तियां।

    Reply
  17. admin   November 17, 2011 at 5:38 am

    thanx all

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published.