सलवटे


क्या लिखू क्या न लिखू , कलम ये ख़ामोश हे !
गिर गया आंख से आंसू सलवटे हे फिर कागज़ पे !
क्या लिखू क्या न लिखू ………..
लिखने बेठा जो में हाल मेरे दिल का !
रुका न अश्क पलकों से गिरा वो दिल की कब्र पे !
सुलग उठे वो अरमा सोये दिल के महरबान !
किया मुझको परेशा फिर बीती यादों के सायों ने !
क्या लिखू क्या न लिखू ………..
दिल में यादे सजी ह सपने आखों में अब भी हे !
फिर भी तेरी कसम शिकवा कोई लब पे नहीं हे !
ख़ुशी के वो चंद लम्हे अब भी आखों में चुभते हे !
समेटे दर्द मुहबत का पलकों से गिरते हे !
क्या लिखू क्या न लिखू ………..
मत सजाओ पलकों में छलक जायेगे ये सपने !
यादे जब सताएगी अश्क बन के गिर जायेगे !
महज़ पानी की बूंद ह समझो तो मन का सकून हे !
टप टप ये गिरे इनमे कोई शिकवा जरुर हे !
क्या लिखू क्या न लिखू ………..
ना लब ये खुले न आवाज़ ही निकली!
गिरा अल्फाज़ बनके अश्क कागज़ की इन लकीरों पे !
बया कर गया हाल दिल का बेरहम सलवटे बन कर !
क्या लिखू क्या न लिखू ………..

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