समय : कल्पना जड़ेजा

मोहब्बत में चिराग जलाने की क्यों बातें करते हो …
विज्ञान का जमाना है.. बिजली जला लो न ..
प्रदुषण फैलता है ..इतना भी नहीं जानते हो …
भावनाओं का स्थान नहीं है यहाँ ..
यहाँ दिल में दिल नहीं पत्थर है ..
क्यों अपनी भावनाओं को दुखाते हो …
गया वो जमाना भी जब सिने में दिल रहा करते थे .
एक दुसरे के दुःख सुख में रहा करते थे साथ साथ …

अपने लिए भी समय नहीं है अब कहाँ तुम दूसरों की बात करते हो ..
कभी समय निकाल कर तुम दिल से अपनी बात कर लिया करो ..
अपनी भावनाओं को तुम भी सजा लिया करो ..
और समय मिले तब उसे सजा लिया करो …

लोग हँसते है अब भावनाओं को दूर रखा करो ..
मोहब्बत में क्यों अब चिराग जलाने की बात करते हो …
गया वो जमान जब सिने में दिल रहा करता था..
पत्थर की इस नगरी में ..अब पत्थर ही रहा करते है ||

कल्पना जड़ेजा

12 Responses to "समय : कल्पना जड़ेजा"

  1. हा हा बिजली की बात. बहुत बढ़िया.

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  2. प्रवीण पाण्डेय   March 19, 2012 at 3:08 am

    वाह वाह…रोचक

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  3. Sunil Kumar   March 19, 2012 at 4:00 am

    भावनाओं में बह कर कुछ मत करो ,अच्छी लगी पोस्ट

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  4. परी देश की शह्जादी   March 19, 2012 at 6:32 am

    बहुत खूब……..

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  5. संगीता पुरी   March 19, 2012 at 9:09 am

    पत्‍थर की नगरी में .. अब पत्‍थर रहा करते हैं !!

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  6. sayainfotech   March 19, 2012 at 1:01 pm

    बिल्कुल सही लिखा है |

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  7. Rajul shekhawat   March 19, 2012 at 1:22 pm

    ज्ञान दर्पण में आपका स्वागत 🙂
    अपने लिए भी समय नहीं है अब कहाँ तुम दूसरों की बात करते हो.. -बहुत ही बढिया पंक्ति ..
    सच को बयां करती आपकी यह रचना बहुत बढ़िया लगी |

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  8. Pagdandi   March 19, 2012 at 5:04 pm

    Bhut khub sach m hakikat hai ye , … aaj log haste h sach m … kalpna baisa aapko Badhai ho is khubsurat rachna par 🙂

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  9. Vaneet Nagpal   March 20, 2012 at 3:45 pm

    बढ़िया अभिव्यक्ति

    टिप्स हिंदी में

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  10. विष्णु बैरागी   March 20, 2012 at 6:32 pm

    अच्‍छे भावों में वर्तनी की अशुध्दियॉं वैसा ही कष्‍ट देती हैं जैसे कि स्‍वादिष्‍ट, सुवासित बासमती भात में कंकर।

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  11. Ratan Singh Shekhawat   March 21, 2012 at 1:30 am

    @ विष्णु बैरागी जी
    इस रचना में कौनसी वर्तनी अशुद्ध है ? कृपया बताने की कृपा करें ताकि उसे सुधारा जा सके और आगे के लिए भी ध्यान रखा जा सके|

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  12. अविनाश वाचस्पति   April 7, 2012 at 1:56 am

    विष्‍णु जी ने सिने को सीने, दुसरे को दूसरे, प्रदुषण को प्रदूषण, जमान को जमाना – जबकि जब संचार सफल है तो इतनी वर्तनी की अशुद्धियां चलती हैं। ठीक की जा सकती हैं लेकिन इनके बल पर फजीहत करना ठीक नहीं कहा जा सकता है। जब भावनाएं शुद्ध हैं तो वर्तनी चल सकती है। भावनाएं ही अशुद्ध हों तो शुद्ध वर्तनी से भी क्‍या हासिल होने वाला है।

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