सज -धज बैठी गोरड़ी

सज-धज बैठी गोरड़ी, कर सोल्हा सिणगार ।
त र सै घट रो मोर मन, सोच -सोच भरतार ।|

नैण कटारी हिरणी, बाजूबंद री लूम ।
पतली कमर में खणक रही, झालर झम-झम झूम ।|
माथे सोहे राखड़ी, दमके ज्यों रोहिड़ा रो फूल।
कानां बाटा झूल रह्या , सिर सोहे शीशफूल। ||

झीणी-झीणी ओढ़णी,पायल खणका दार ।
बलखाती चोटी कमर, गर्दन सुराहीदार ||
पण पिया बिना न हो सके पूरण यो सिणगार |
पधारोला कद मारुसा , था बिन अधूरी नार ।|

सखी- साथिन में ना आवडे., ना भावे कोई कोर ।
सासरिये में भी ना लगे, यो मन अलबेलो चोर ||
अपणो दुःख किण सूं कहूँ , कुण जाण म्हारी पीर ।
अरज सुण नै बेगा आवो, छोट की नणंद का बीर ||

मरवण था बिन सुख गयी, पिला पड़ ग्याँ गात ।
दिन तो फेर भी बितज्या, या साल्ल बेरण रात ।|

लेखक : गजेन्द्र सिंह ककराना

शब्दार्थ :-1साल्ल = दर्द देना,2. गात = गाल,3. आवडे = चित नहीं लगना,4. अर्ज- पुकार
5.गोरड़ी = गौरी

6 Responses to "सज -धज बैठी गोरड़ी"

  1. बहुत ख़ूब!
    आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि कल दिनांक 03-12-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1082 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

    Reply
  2. Rohitas ghorela   December 3, 2012 at 6:57 am

    इंतजार और श्रंगार रस राजस्थानी में पढ़कर मजा आ गया

    आपके ब्लॉग पर आकर बहुत अच्छा लगा ..अगर आपको भी अच्छा लगे तो मेरे ब्लॉग से भी जुड़े।

    आभार!!

    Reply
  3. Anita   December 3, 2012 at 7:26 am

    राजस्थानी भाषा का अपना अलग ही मज़ा है…! समझने में ज़रा दिक़्क़त हुई… लेकिन आपने अर्थ लिखकर अछा किया !:)
    ~सादर !!!

    Reply
  4. Virendra Kumar Sharma   December 3, 2012 at 5:31 pm

    नारनौल (हरयाना )में नौसाला प्रवास ने राजस्थानी लोग गीतों से रु -ब-रु करवाया .आधा अधूरा यह भी समझ लिया आपका ढोला मारू -रा ….कुछ और लफ्जों के मायने देते ,व्याख्या भी तो क्या कहने हम तो गाने लगते इन जन गीतों को आपके …..

    सज-धज बैठी गोरड़ी, कर सोल्हा सिणगार ।
    त र सै घट रो मोर मन, सोच -सोच भरतार ।|

    नैण कटारी हिरणी, बाजूबंद री लूम ।
    पतली कमर में खणक रही, झालर झम-झम झूम ।|

    माथे सोहे राखड़ी, दमके ज्यों रोहिड़ा रो फूल।
    कानां बाटा झूल रह्या , सिर सोहे शीशफूल। ||

    झीणी-झीणी ओढ़णी,पायल खणका दार ।
    बलखाती चोटी कमर, गर्दन सुराहीदार ||

    पण पिया बिना न हो सके पूरण यो सिणगार |
    पधारोला कद मारुसा , था बिन अधूरी नार ।|

    सखी- साथिन में ना आवडे., ना भावे कोई कोर ।
    सासरिये में भी ना लगे, यो मन अलबेलो चोर ||

    अपणो दुःख किण सूं कहूँ , कुण जाण म्हारी पीर ।
    अरज सुण नै बेगा आवो, छोट की नणंद का बीर ||

    मरवण था बिन सुख गयी, पिला पड़ ग्याँ गात ।
    दिन तो फेर भी बितज्या, या साल्ल बेरण रात ।|

    लेखक : गजेन्द्र सिंह ककराना

    शब्दार्थ :-1साल्ल = दर्द देना,2. गात = गाल,3. आवडे = चित नहीं लगना,4. अर्ज- पुकार
    5.गोरड़ी = गौरी

    Read more: https://www.gyandarpan.com/2012/12/blog-post.html#ixzz2E0kfq0Kc

    Read more: https://www.gyandarpan.com/2012/12/blog-post.html#ixzz2E0kYlhhE

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  5. वाणी गीत   December 4, 2012 at 3:48 am

    वाह !

    Reply

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