‘संस्कृति की डब्बी : कुंवर अमित सिंह

‘संस्कृति की डब्बी : कुंवर अमित सिंह

माता कब की ”ममी” बना दी,
पिता को बना डाला ”डेड”
छोड़ छाड़ के सादी रोटी,
खुश रहते सब खाकर ”ब्रेड”
.

भाई बन गए कब के ”ब्रो”
बहन हो चुकी अब ”सिस”
संस्कारों की तो पूछो ही मत,
जाने कहाँ हो रहे ”मिस”

ताई ,चाची, बुआ, मामी ,
सभी बन गई ”आंटी”
ताऊ, चाचा, फूफा, मामा, के
गले में पड़ी ”अंकल” की घंटी.

यार दोस्त भी अब तो बन बैठे हैं सारे ”ड्यूड”
माँ-बाप अगर टोकें, बालक बोलें होकर ”रयुड”
बच्चों को अब नहीं पसंद पुराना ”पैजामा”
वाट्ज- अप बोलें भूल गए ”रामा-रामा”.

अंग्रेज तो चले गए यहाँ से कब के,
छोड़ गए अपनी संस्कृति की ”डब्बी”
बस अब और सहा नहीं जाता ”अमित”
अच्छे भले पति को जब बोलें ”हब्बी”…….

8 Responses to "‘संस्कृति की डब्बी : कुंवर अमित सिंह"

  1. Vikesh Badola   February 9, 2013 at 1:56 pm

    अंग्रेज चले गए, औलाद छोड़ गए।

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  2. HARSHVARDHAN   February 9, 2013 at 2:53 pm

    अंग्रेज चले गए, लेकिन अपनी दुम छोड़ गए। शानदार व्यंग करती कविता।

    मेरी नई पोस्ट "जन्म दिवस : डॉ. जाकिर हुसैन" को भी पढ़े। धन्यवाद।
    ब्लॉग पता :- gyaan-sansaar.blogspot.com

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  3. पिताजी को डैडी, माँ को मम्मी,
    इंग्लिश के आगे हिंदी निक्कमी
    बहन पुकारा तो मुह तोप जैसा,
    मैडम पुकारा चमत्कार है कैसा!

    चेहरा खिलकर कमल देखता हूँ,,

    RECENT POST: रिश्वत लिए वगैर…

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  4. प्रवीण पाण्डेय   February 10, 2013 at 1:40 am

    सच में, गंध मचा दी है..

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  5. Rajendra Kumar   February 10, 2013 at 8:52 am

    अंग्रेजों के दुम पकड़ कब तक चलते रहेंगे,बहुत ही सार्थक प्रस्तुती।

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  6. dr.mahendrag   February 10, 2013 at 1:36 pm

    शानदार व्यंग,

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  7. Bhagat Singh Panthi   February 11, 2013 at 6:37 am

    वाह उस्ताद वाह !

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  8. धन्यवाद सभी मित्रों का

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